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    आखिर शार्प भारत पर क्यूं बौखलाई जमशेदपुर पुलिस !  कैसी विरासत छोड़ जाएंगे एसएसपी ?

    झारखंड
    के जमशेदपुर में मोस्ट वांटेड अपराध कर्मी हरीश सिंह वेश बदलकर कोर्ट पहुंचता है। कड़ी सुरक्षा को धत्ता बताते हुए गवाही देता है और आराम से निकल जाता है। जिसकी तलाश में जमशेदपुर पुलिस खाक छानती रही, वह अपराधी पुलिस की नाक के नीचे से न्याय के मंदिर में हाजिरी लगाकर निकल गया।

    जब अगले दिन अखबारों की सुर्खियों में जमशेदपुर पुलिस के तारीफ में कसीदे गढ़े गए तो खिसियानी बिल्ली खंभा नोचने के मुहावरे को चरितार्थ करते हुए जमशेदपुर के परसुडीह थाना पुलिस ने बीते दो फरवरी के दिन कोरोना वैक्सीन को लेकर हुए ड्राई रन पर शार्प भारत की खबर का केस खुलवाकर शार्प भारत के प्रबंध निदेशक को 7 मार्च को नोटिस जारी करते हुए एक तरह से डराने का प्रयास किया गया।

    इससे जमशेदपुर के मीडियाकर्मियों में काफी नाराजगी व्याप्त है। कुछ एक संगठनों ने जमशेदपुर पुलिस की इस कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और इसे जमशेदपुर के मीडिया और पुलिस के संबंधों का कुठाराघात माना है।

    आखिर ऐसा क्या था दो फरवरी के शार्प भारत के खबर में?

    जमशेदपुर में पिछले कई सालों से पदस्थापित अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी सह जिला सर्विलांस पदाधिकारी डॉक्टर साहिर पॉल ने दिनांक 5 फरवरी को परसुडीह थाने में शार्प भारत के प्रबंध निदेशक सुनील अग्रवाल पर कांड संख्या 3/ 21 दर्ज कराया।

    जिस पर धारा 188/ 269/ 270/ 505 (1) (b) एवं डीएम एक्ट 55 दर्ज करते हुए आईओ दिलीप कुमार बिलुंग ने सुनील अग्रवाल को नोटिस करते हुए उपरोक्त धाराओं के तहत 3 दिनों के अंदर परसुडीह थाना में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया गया।

    इसमें सुनील अग्रवाल को प्राथमिकी अभियुक्त बताते हुए कहा गया, कि आपके द्वारा झारखंड ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल शार्प भारत पर कोविड-19 कोरोना वैक्सीन ड्राई रन के संबंध में भ्रामक एवं तथ्य हीन खबर प्रकाशित की गई है, जिसे शोषल मीडिया पर वायरल होने से लोगों में डर एवं भय पैदा हो गया है।

    जबकि अमूमन ऐसे मामलों में पहले मीडिया हाउस को पक्ष रखने संबंधी नोटिस जारी की जाती है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। पहले एफआईआर दर्ज करते हुए आईपीसी की धाराएं लगाई गई। उसके बाद नोटिस किया गया। जो कहीं से भी न्याय संगत और तार्किक नहीं है। इसे मीडिया की आजादी का हनन क्यों नहीं माना जाए ?

    अब डॉक्टर साहिर पॉल ये बताएं कि शार्प भारत द्वारा कितना जघन्य अपराध किया गया है, जबकि खबर प्रकाशित करने के लेकर खबर के अंत तक कई बार ड्राई रन और नाट्य रूपांतरण का जिक्र किया गया है। फिर इसमे भ्रम की स्थिति कैसे पैदा हो गई।

    वैसे अगले दिन शहर से प्रकाशित होनेवाले अन्य अखबारों ने सचित्र खबरें प्रकाशित की उन्हें पहले स्पष्टीकरण तलब किया गया, फिर शार्प भारत पर बगैर पक्ष रखे सीधे केस दर्ज क्यों किया गया। क्या वे किसी के दबाव में थे ?

    चलिए थोड़ी देर के लिए इसे मान भी लिया जाए, लेकिन वैश्विक महामारी एक्ट के तहत पूरे हिंदुस्तान में इतनी धाराएं किन मीडिया हाउसेस, सरकारी- गैर सरकारी संस्थान अथवा राजनीतिक दल पर लगाए गए ?

    क्या शार्प भारत का अपराध इतना बड़ा था ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की स्वतंत्रता का कोई हनन नहीं कर सकता है। हमने शार्प भारत की खबरों का पूरा पड़ताल किया है। डॉक्टर साहिर पॉल आखिर इतने सालों से आप जमशेदपुर में जमे हैं क्या इसकी जांच नहीं होनी चाहिए ?

    राज्य के मुख्यमंत्री दिल्ली के मीडियाकर्मियों से मिलकर उनका कुशल क्षेम जान रहे हैं और उनके राज्य के अधिकारी और पुलिस मीडिया कर्मियों एवं वेबसाइट संचालकों को परेशान करने पर आमादा हैं, क्या ये सही है।

    प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को ऐसे मामलों पर संज्ञान लेने की जरूरत है। अब एक महीने बाद अचानक हरीश सिंह प्रकरण मामले में शार्प भारत अगर पूछता जमशेदपुर के नाम से खबर बनाकर चलाता है तो जमशेदपुर पुलिस आत्ममंथन के बजाए पुराने केस को चार्ज कराकर शार्प भारत ही नहीं, बल्कि सभी सभी मीडिया कर्मियों और मीडिया संस्थानों को हड़काने का काम कर रही है।

    डॉक्टर साहिर पॉल निश्चित तौर पर जमशेदपुर पुलिस और प्रशासन का मोहरा बने हैं ये हम दावे के साथ कह सकते हैं और साक्ष्यों के आधार पर ये भी दावा कर सकते हैं कि उक्त खबर कहीं से भी तथ्यहीन और भ्रामक नहीं थे।

    एसएसपी के दुर्भवना से ग्रसित होने का प्रमाण यही है कि हरीश सिंह की शार्प भारत में वायरल होने के बाद एसएसपी द्वारा संचालित व्हाट्सएप ग्रुप pol media से शार्प भारत के रिपोर्टर और संपादक को ग्रुप से बाहर कर दिया गया और अगले दिन यानी सात मार्च को परसुडीह थाना से केस का रिमाइंडर शार्प भारत को भेजा गया।

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