3 साल बाद भी CID को नहीं मिला शरतचंद्र हत्या कांड का सुराग, CBI जांच की मांग

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“बालिका विद्यापीठ, लखीसराय के संस्थापक मंत्री थे शरत चंद्र, 2 अगस्त 2014 को विद्यालय कैंपस में ही हुई थी हत्या, सीआईडी कर रही मामले की जांच पर अब तक कोई निष्कर्ष नहीं”

पटना से वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता की खोजपरक रिपोर्ट…..

बिहार ही नहीं बालिकाओं की शिक्षा के लिए कभी देश भर में चर्चित रहा लखीसराय स्थित बालिका विद्यापीठ के संस्थापक मंत्री 75 वर्षीय शरतचंद्र के हत्यारों का सुराग तीन वर्ष बाद भी सीआईडी नहीं लगा सकी।

इस ख्यातिलब्ध विद्यालय में कभी महात्मा गांधी, बिनोवा भावे और पूर्व राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद का भी पदार्पण हुआ था और वर्तमान में गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा इस विद्यापीठ की एक लंबे अर्से से अध्यक्ष हैं।

शरत चंद्र की हत्या 2 अगस्त 2014 को तड़के 6 बजे विद्याालय कैंपस स्थित उनके आवास में तब हुई थी जब वह अपने ड्राइंड रुम में बैठकर चाय की चुस्कियों के बीच अखबार पढ़ रहे थे।

उस वक्त उनकी पत्नी उषा शर्मा और एक नौकरानी रसोईघर में थी। मोटरसाइकिल पर आए दो हत्यारों ने उनके आंख के पास सटाकर उन्हें गोली मार दी थी और फरार हो गए थे।

पत्नी उषा शर्मा के बयान पर तब पुलिस ने आम्रपाली ग्रुप के एमडी और जहानाबाद से जदयू दिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके अनिल शर्मा सहित आठ लोगों को इसमें प्राथमिकी अभियुक्त बनाया था जिनमें अधिकांश शहर के प्रतिष्ठित लोग थे।

पुलिस ने तब इस मामले में लखीसराय निवासी डा. प्रवीण सहित दो लोगों को गिरफ्तार भी किया था। बाद में यह मामला सीआईडी के हैंड ओवर कर दिया गया जो अब तक ठंढे बस्ते में है।

तीन वर्षो से यह मामला सीआईडी के ठंढे बस्ते में पड़ा होने से अब सीआईडी के क्रिया कलापों और इस विभाग की जांच पर सवाल खड़ा होने लगा है। इस मामले की अगर गहराई से छानबीन होती है तो अब भी कई चौकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

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अब एक नजर इस विद्वालय के संस्थापक मंत्री रहे शरतचंद्र के अतीत पर डालें। शरत चंद्र की दो शादियां हुई थीं। सुजाता, सुहिना व अपराजिता नामक तीन पुत्रियों की माता शरत चंद्र की पहली पत्नी कविता विद्यालंकार की 1967 में मौत हो गई।

उनकी मौत के दो वर्ष बाद शरत चंद्र ने 1969 में उषा शर्मा से दूसरा विवाह किया जिनसे उन्हें सुगंधा शर्मा के रुप में एक पुत्री है। शरतचंद्र की पहली पत्नी की सबसे बड़ी पुत्री सुजाता उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने पिता के कामों में स्कूल में ही रहकर हाथ बटाने लगी और कालांतर में वो बालिका विद्यापीठ की प्राचार्य भी बनाई गई।

1989 में इस विद्यालय को सीबीएससी से संबद्ता मिली। सूत्रों के अनुसार सुजाता को प्राचार्य बनाना और विद्यापीठ में हस्तक्षेप उनकी दूसरी मां उषा शर्मा को नहीं सुहाता था और अक्सर दोनों में अनबन होती थी जिससे क्षुब्ध होकर सुजाता काफी दिनों तक देहरादून के एक विद्यालय में शिक्षिका का कार्य किया।

बताया जाता है कि सुजाता जब तक विद्यापीठ में रही विद्वालय में सख्त अनुशासन के साथ पढ़ाई का स्तर भी ठीक रहा। पर उनके विद्यालय से जाते ही इस विद्यापीठ के शिक्षा स्तर में निरंतर गिरावट आने लगी और छात्राओं की भी संख्या कम होने लगी। छात्राओं की संख्या में निरंतर गिरावट और वित्तीय संकट को देखकर विद्यालय प्रबंधन ने बालिकाओं के नाम पर बने और सीबीएससी से संम्बध इस विद्यापीठ में छात्रों का भी नामांकन लेना शुरु कर दिया जो सीबीएससी के नियमो के बिल्कुल प्रतिकूल है।

अपने विद्यालय को वित्तीय संकट से बचाने के लिए शरतचंद्र ने अपनी मौत से कुछ वर्ष पूर्व लगभग 100 एकड़ में बने अपने विद्यापीठ कुछ एकड़ जमीन आम्रपाली ग्रुप के चेयरमैन अनिल शर्मा को इंजिनीयरिंग कॉलेज खोलने के लिए दे दी। इसके बदले शरतचंद्र को भारी-भरकम राशि भी मिली पर बाद के दिनों में बेटी सुगंधा के कारण शरतचंद्र और अनिल शर्मा के संबंध में खटास आ गए। दोनों ओर से मुकदमें भी हुए।

यहां तक कि सीडीपीओ जैसे सरकारी पद पर आसीन उनकी बेटी सुगंधा ने तब अपने एक चचेरे भाई आलोक राज और चालक अरविंद के साथ आम्रपाली इंजिनियरिंग कॉलेज के दफ्तर में तोड़फोड़ भी की थी और कार्यालय में मौजूद एक कर्मचारी मोहित से कॉलेज का चेक और अन्य कागजात छीनकर फाड़ने की कोशिश भी की थी।

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सूत्र बताते हैं कि तब सुगंधा का अपने पिता से आम्रपाली ग्रुप से मिले रुपये के हिसाब को लेकर भी विवाद होता रहता था। शरतचंद्र की हत्या के बाद इस विद्यापीठ की बनी नई कमेटि में सुगन्धा शर्मा द्वारा खुद को स्यवंभू मंत्री और अपने चचेरे और विवादित भाई आलोक राज को प्रशासक नियुक्त कर देना भी बहुत सी शंकाओं को जन्म देता है।

सुगन्धा खुद बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (सीडीपीओ) जैसे सरकारी पद पर हैं। सरकारी पर आसीन कोई भी व्यक्ति या महिला सरकारी अनुदान पाने वाले किसी विद्याापीठ का मंत्री या सचिव कैसे बन सकता है यह भी एक बड़ा सवाल है।

गौरतलब है कि सुगंधा शर्मा की शादी एक बिहार के एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वर्तमान में राज्य सभा सदस्य जिनकी नाम की चर्चा किसी राज्य के राज्यपाल बनाए जाने को लेकर भी है के पुत्र के साथ हुई थी पर शादी के कुछ ही वर्षों बाद दोनों के रिश्ते में खटास आ गए और मामला तलाक तक जा पहुंचा।

बहरहाल लखीसराय के लोग इस पूरे मामले को सुजाता शर्मा, सुगंधा शर्मा और अनिल शर्मा क त्रिकोणीय विवाद के रुप में देखते आ रहें हैं, पर हकीकत में शरतचंद्र का कातिल कौन है? इसकी गंभीरता से जांच सीआईडी को करनी है जिसमें वह अबतक असफल है।

इधर विद्यापीठ की संस्कृति और उसकी अस्मिता को बचाने के उदेश्य से गठित ‘विरासत बचाओ अभियान’ ने विद्यापीठ की अध्यक्ष एवं गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा को पत्र भेजकर सारे मामले में हस्तक्षेप कर मामले की जांच सीबीआई से कराने का आग्रह किया है।

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