13 अक्टूबर से अपना अखबार निकालेगें हरिनारायण जी

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झारखंड की पत्रकारिता में नामचीन संपादकों में शुमार वरिष्ठ पत्रकार हरिनायण सिंह आगामी 13 सितबंर से आजाद सिपाही नामक खुद का हिंदी अखबार निकालने जा रहे हैं।

स्टेट बेस इस अखबार की एक बड़ी विशेषता यह रहेगी कि यह समूचे प्रदेश का एक ही संस्करण प्रकाशित होगा। इस संदर्भ में श्री हरिनारायण सिंह ने बताया कि वर्तमान दौर में दैनिक अखबारों का जो स्वरुप सामने है, उसकी सूचनाएं जिला स्तर पर बंट कर रह गई है। दुमका में क्या हो रहा है,  धनबाद में क्या हो रहा है, बड़ी से बड़ी घटनाएं भी छोटी बन कर रह जाती है और जब वह सामने आती है तो एक बिकराल समस्या का रुप ले लेती है।

उन्होंने अपने अखबार ‘आजाद सिपाही ‘ को जनता के लिए जनता का अखबार  का संकल्प बनाते हुए कहा कि उनका प्रयास जनोपयोगी सूचनाओं के जरिए उस खाई को पाटना होगा, जिसे बड़े-बड़े समूह के अखबारों ने प्रदेश में छोटे स्तर पर क्रिएट कर रखा है।

harinarayan singh उल्लेखनीय है कि अक्टूबर,1989 में हरिनारयण सिंह ने नई दिल्ली से रांची की पत्रकारिता में दैनिक प्रभात खबर के जरिए दस्तक दी थी और 11 साल बाद उन्होंने अखबार की मातृ कंपनी उषा मार्टिन और संपादक हरिवंश सिंह के साथ उभरे मतभेद को लेकर  दैनिक हिन्दुस्तान का दामन थाम लिया था। वे करीब नौ साल तक दैनिक हिन्दुस्तान में  रहे।

उसके बाद उन्होंने न्यूज11 चैनल और दैनिक सन्मार्ग में काम किया। फिर उन्होंने बिल्डर अभय सिंह के लिए हिन्दी दैनिक खबर मंत्र लांच किया। इधर 16 नवंबर,2014 को उन्होंने प्रबंधन के साथ तल्ख होते रिश्तों से अजीज होकर खबर मंत्र छोड़ दिया। उन्होंने खबर मंत्र को 1 जुलाई, 2012 को ज्वाइन किया था।

श्री सिंह ने खुद का अपना अखबार निकालने की घोषणा करते हुए आजाद सिपाही वेब पोर्टल की संपादकीय में  लिखा है कि तमाम जगहों पर काम करते हुए कई दफा, किसी न किसी स्तर पर जाकर कुछ ऐसी मजबूरियों का सामना करना पड़ा, जब उनके भीतर का पत्रकार तड़फड़ाकर रह गया। उनकी कलम की धार कहीं न कहीं अवरोध झेलती रही और एक टीस कहीं न कहीं मौजूद रही उनके भीतर आजाद होने की।

बकौल हरिनायण सिंह, उन्हें संतोष है कि 25 साल के बाद वे उस पड़ाव पर हैं, जब वे खुद को पूरी तरह से आजाद महसूस कर रहे हैं।

उनका मानना है कि इस आजादी के साथ पत्रकारिता की जिस नई राह पर अब उन्होंने अपना कदम बढ़ाया है, वहां न तो पूंजी का दबाव है, न सत्ता के लिए समझौते हैं, न ही कॉरपोरेट की मजबूरियां।

उन्हें यकीन है कि पहली बार उनकी कलम पूरी तरह आजाद होकर बोलेगी। यह न रुकेगी, न झुकेगी। आजाद सिपाही उनकी इसी ललक की अभिव्यक्ति बनेगा, इसका उन्हें पूर्ण विश्वास है।

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