हिंदी पत्रकारिता दिवस: बिहार में साहित्यिक पत्रकारिता का विकास

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“बिहार की हिंदी पत्रकारिता आज भी प्रगतिशील है। पत्रकारिता में पिछले कुछ सालों में ग्लैमर तो आया है मीडिया संस्थानों की बाढ़ सी आ गई है। कुल मिलाकर देखा जाए तो हिंदी पत्रकारिता ने बिहार को बहुत कुछ दिया है। सोशल मीडिया के विकास ने मीडिया को आज फेमस कर दिया है…”

                           -: जयप्रकाश नवीन :-

आलेखकः जयप्रकाश नवीन एक लंबे अरसे से विभिन्न माध्यमों के लिए विविध लेखन करते आ रहे हैं और फिलहाल एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क के बिहार ब्यूरो प्रमुख हैं….

 आज फिर से 30 मई आया है,मतलब हिन्दी पत्रकारिता दिवस। यही वह तारीख थी जब 30 मई 1826 को पंडित युगल किशोर शुक्ल ने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी थी।

पंडित शुक्ल ने कोलकता से पहले हिंदी अखबार ‘उदंड मार्तण्ड’ का प्रकाशन शुरू किया था। तब से आज तक कई झंझावतों और बदलावों से जूझते हुए हिन्दी पत्रकारिता 193 वर्ष पूरे कर चुका है।

अखबारों से शुरू हुई पत्रकारिता आज डिजिटल युग में आ गया है।जिसकी कल्पना शायद पंडित युगल किशोर शुक्ल को भी नहीं रही होंगी कि उनका यह क्रांतिकारी कदम एक हाई प्रोफाइल पेशा बन जाएगा।

जिस पत्रकारिता ने जीवन और समाज के अन्तसूत्रों को जोड़ा, चेतना का संचार किया, आज वहीं पत्रकारिता कुछ हदतक अन्तर्सबंधों को तोड़ने और चेतना के हनन का निर्द्धन्द्ध माध्यम भी बन गई है। पत्रकारिता पहले ‘मिशन’ थी बाद में ‘प्रोफेशन’ और फिर ‘सेंशेसन’ और अब खबरें बेचने का बाजार।

समय और समाज के संदर्भ में सजग रहकर नागरिकों में दायित्व -बोध कराने की कला को पत्रकारिता कहते हैं। गीता में जगह -जगह ‘शुभदृष्टि’ का प्रयोग है।यह ‘शुभदृष्टि’ ही पत्रकारिता है जिसमें गुणों को परखना तथा मंगलकारी तत्वों को प्रकाश में लाना शामिल है।

गांधी जी तो इसमें ‘समदृष्टि’ को महत्व देते थें। समाजहित में सभ्यक् प्रकाशन को पत्रकारिता कहा जाता है। असत्य,अशिव और असुंदर पर ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ की शंखध्वनि ही पत्रकारिता है। लोकतांत्रिक प्रशासन का एक अविभाज्य अंग पत्रकारिता है। बर्के ने प्रेस को ‘चतुर्थ राज्य’ की संज्ञा दी थी।

देश की आजादी के बाद क्रांति का ज्वार भी उतरने लगा। धीरे- धीरे पत्रकारिता का रूप -स्वरूप भी बदलने लगा। पूंजीवादी और बाजार व्यवस्था हावी होने लगी। इसमें कोई शक नहीं कि देश की स्वतंत्रता संग्राम में अखबारों ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया था, लेकिन कभी सामाजिक परिवर्तन को आधार भूमि प्रदान करने वाली पत्रकारिता आज पूंजी के आंगन बंदी है। बदलते तेवर और कलेवर वाली पत्रकारिता के अंदाज समय के साथ बदलने लगें है।

महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रारंभ हुई पत्रकारिता द्वारा सत्यशोधन का प्रयास वर्तमान तक बदस्तूर जारी है,किन्तु पत्रकारिता जगत के मूल्यों में तरलता बड़ी आवृति में परिलक्षित हो रही है।

जहाँ तक बिहार का सवाल है तो यहाँ पत्रकारिता की शुरुआत उर्दू पत्रों से हुई।1810 में  उर्दू का पहला पत्र ‘साप्ताहिक उर्दू अखबार’ मौलवी अकरम अली ने संपादित कर कोलकता से छपवाया।

वही राज्य में अंग्रेजी और हिंदी अखबारों का दौर 1872 में शुरू हुआ। जहाँ ‘द बिहार हेराल्ड’ और ‘बिहार बंधु’ का प्रकाशन शुरू हुआ। तब पंडित मदन मोहन भट्ट और पंडित केशव भट्ट ने मूल सिंद्धांतो को आधार मानकर मुंशी हसन को इसके संपादन का भार दिया था।

नवराष्ट्र और राष्ट्रवाणी जैसे पत्रों ने भी इसी उद्देश्य को अपनाया।बिहार में रामवृक्ष बेनीपुरी ,केशव राव भट्ट और आचार्य शिवपूजन सहाय ने अपनी हड्डियां गलायी और बिहार की पत्रकारिता को एक तेवर दिया, एक विश्वास और एक गति प्रदान की।

कहा जाता है कि सर्वप्रथम हाथ से लिखी ‘पाटलिपुत्र सौरभ’ की शुरुआत हुई थी लेकिन उसकी प्रति उपलब्ध नहीं होने से बिहार का पहला हिंदी दैनिक कहना उचित प्रतीत नहीं होता है।

बिहार का पहला हिंदी दैनिक ‘सर्वहितैषी’ बाबू महावीर प्रसाद के संपादन में शुरू हुआ माना जाता है। 1880 में पटना के बांकीपुर में खड़ग्विलास प्रेस की स्थापना के साथ ही राज्य में पत्रकारिता को एक नई दिशा मिली।जिससे साहित्यिक पत्रकारिता का विकास तेजी से हुआ। इस दौरान “साहित्य”, ‘लक्ष्मी’, श्री शारदा, कमला  गंगा  बिजली  आरती अंवतिका, हिमालय और चित्रेतना आदि कई शुद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ।

1934 में प्रफुल्लचंद ओझा ‘मुक्त’ के संपादन में साहित्यिक मासिक ‘आरती’ का प्रकाशन हुआ।’आरती’ के बंद होने पर उन्होंने एक दूसरी पत्रिका 1935 में ‘बिजली’ शुरू की।हालाँकि यह भी ज्यादा दिन नहीं चल सका।

नालंदा के बिहारशरीफ से 1936 में ‘नालंदा’ और पटना से ‘जन्मभूमि’ प्रकाशित हुई। ‘ नालंदा’एक साल के बाद बंद हो गया।

बिहार से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं में ‘गंगा’,’जागरण’,’माधुरी’,हिमालय का संपादन आचार्य शिवपूजन सहाय ने किया ।1973 में प्रो केसरी कुमार के संपादन में ‘चित्रेतना’ छपी। साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में पटना से पटना से प्रकाशित ‘नई धारा’ का विशेष स्थान है।

इस पत्रिका की शुरुआत 1950 में साहित्यकार राजाराधिका रमण प्रसाद सिंह के पुत्र उदय राज सिंह ने किया था। जो काफी लंबे समय तक चली। तब इसका संपादन विख्यात साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने किया था। उसके बाद इसके संपादकों में उदय राज सिंह, गोविंद मिश्र, कभलेश्वर,विजयमोहन सिंह जैसे चर्चित साहित्यकार रहे।

साहित्यिक पत्रिकाओं के बाद 80 के दशक में पटना में पत्रकारिता का विस्तार हुआ जो पत्रकारिता के बड़े आंदोलन के रूप में देखा जाने लगा। उन दिनों ‘प्रदीप’,’आर्यावर्त’, ‘इंडियन नेशन’,’सर्चलाइट’ का बोलबाला था। उसी दौरान ‘हिंदी दैनिक ‘आज’,पाटलिपुत्र टाइम्स’,नवभारत टाइम्स जैसे नये अखबार नये कलेवर और नये तेवर के साथ आएं।

प्रदीप -सर्चलाइट का भी नया रूप दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ और अंग्रेजी ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के रूप में सामने आया। पाटलिपुत्र टाइम्स ने अपने आप को बिहार के जनआंदोलन से जोड़ लिया। जो पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय भी रहा, लेकिन अपने आंतरिक कारणों की वजह से इसका पराभव हो गया। प्रदीप के युवा धारधार पत्रकारों को हिन्दुस्तान और नवभारत ने अपने यहाँ बुला लिया।

कभी प्रदीप में एक गीत गाया जाता था जो काफी लोकप्रिय था…..

“कागज ओढना,कागज बिछौना, कागज पर ही सोना है।

कागज लिखते-लिखते साथी, कागज में मिल जाना है।”

एक तरफ पत्रकारिता का शानदार उत्कर्ष दिख रहा था तो दूसरी तरफ बाजार की व्यवस्था पत्रकारिता की बुनियाद को खत्म कर रही थी। इसी बाजार बाद की भेंट पाटलिपुत्र और नवभारत टाइम्स जैसे समाचार पत्र चढ़ गए।

लगा बिहार में पत्रकारिता का अंत हो जाएगा।पाठकों की मायूसी साफ झलक रही थी।इसी झंझावतो के बीच दैनिक आज और हिन्दुस्तान ने अपने आपको बचाते हुए उस मंदी भरे तूफान को झेल लिया। फिर पटना में प्रभात खबर ने दस्तक दी। सांध्य दैनिकों का भी दौर चला जिनमें अमृत बर्षा और सांध्य प्रहरी जैसे नाम शामिल थे।

90 के आखिरी दशक में पत्रकारिता में फिर संघर्ष दिखने लगा जब एक और राष्ट्रीय दैनिक ‘दैनिक जागरण’ का उदय हुआ। इसके आगमन से बिहार की पत्रकारिता में एक नया आयाम जुटा।

इसके बाद कई समाचार पत्र आते रहे जाते रहे फिर गाजे बाजे के साथ बिहार में दैनिक भास्कर का उदय होता है।जिसके आते ही कई समाचार पत्रों को अपनी मठाधीशी खतरे दिखी थी लेकिन फिर पता नहीं इसकी भी हवा निकल गई।

फिलहाल व्यावसायिक व्यवस्था के बीच प्रतिस्पर्धा के दौर में पहुँच चुकी हिंदी पत्रकारिता अपने उच्च शिखर पर विराजमान और चुनौतियों से भरी है। ये बात और है कि पहले अखबारों से हिंदी के नये नये शब्द सीखने को मिलते थे। न तो आज पढ़ने वाले और न ही लिखने वाले लोग मिलते है। आज के पत्रकार लेखन, पठन और हिंदी भाषा के ज्ञान से कोसो दूर हैं।

हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है। जो दिलों को दिलों से जोड़ने में सक्षम है,बस जरूरत इस बात की है हम उसके मूल स्वरूप और गरिमा को बनाये रखे, क्योंकि हिंदी पत्रकारिता से उम्मीदें अब भी है।

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