सुशासन बाबू के नालंदा में अराजकता, सिर्फ मीडिया में दिखता है सुशासन !

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राजनामा डेस्क। सुशासन बाबू यानि बिहार के सीएम नीतिश कुमार। लेकिन सबाल यह उठता है कि उन्हें यह तमगा दिया किसने है। मीडिया ने या आम जनता ने। तलवे चाटने वाली मीडिया कुछ भी अर्शनाम देने को स्वतंत्र है लेकिन, आम जनता के लिये कितना सुशासन है, सीएम के घर-जिले नालंदा का आकंलन कर इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

वेशक नालंदा का एसपी कुमार आशीष मीडिया से इतर आम जन में अपराध नियंत्रण के पैमाने पर खरे नहीं उतरते कम दिख पा रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि वे थाना प्रभारियों का बेतलब कसीदे गढ़ते हैं, जो बिल्कुल नकारे हैं। हाल के दिनों के ही घटनाओं का आंकलन करें तो जिले में हत्या, लूट, चोरी, छिनतई की घटनाएं चरम पर है। प्रतिबंधित शराब का कारोबार अत्याधिक इसी जिले में देखने को मिलता है। स्वंय पुलिस भी अवैध शराब की बरामदगी में रिकार्ड तोड़ डाले हैं।

लेकिन आश्चर्य की बात है कि हर बरामदगी में शराब माफिया या उनके गुर्गे बच निकलते रहे हैं। इन मामलों में थाना स्तर की भूमिका हमेशा संदिग्ध दिखती है।

एसपी कुमार आशीष की बड़ी काबिलियत मीडिया मैनेजमेंट की अधिक मानी जाती है। जिसका कुअसर जमीन पर साफ झलकती है। इस एसपी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि ये अपने अधिनस्थ पुलिस महकमें की नाकामियों पर पर्दा डालते हैं और उनकी किसी भी शिकायत पर अपनी कान की रुई नहीं निकालते। वे व्हाट्सअप और सोशल साइट पर भी खूब सक्रिय हैं। लेकिन जो कोई भी उन्हें पुलिस तंत्र का आयना दिखाता है, उसे  लेकर वो तुरंत ब्लॉक-रिमूव का आयडिया अपना लेते हैं। यह फंडा उनकी संवेदनशीलता है या संवेदनहीनता, राम जाने।

बहरहाल, बिहार के सीएम नीतिश जी अगर सूबे में सुशासन के ढिंढोरे पीटते हैं तो उन्हें अपने घर-जिले नालंदा पर एक नजर अवश्य डालनी चाहिये। यहां सबकुछ दिनदहाड़े हो रहा है। हत्या, लूट, चोरी, छिनतई आदि पर कोई लगाम नहीं है। अगर कोई मामला हाई प्रोफाइल हो तो हवा में ही सही, पुलिस हाथ-पैर मारती है लेकिन आम लोगों की पीड़ा पुलिस थानों की फाईलों में दम तोड़ जाती है और अनुसंधान के नाम पर उनकी काली कमाई का धंधा शुरु हो जाता है। इससे असमाजिक तत्वों का मनोबल किस कदर बढ़ता है। इससे कुमार आशीष जैसे एसपी अनभिज्ञ न होगें।

पुलिस थानों में गंभीर से गंभीर अपराध को दबा डालने के साथ उसे अन्यन स्वरुप देने का कुचलन तेजी से बढ़ रहा है। सिर्फ इसलिये कि पुलिस रिकार्ड में अपराध के आकड़े न दिखे और अधिक से अधिक कमाई भी हो। इसमें पुलिस थानों में बाजाप्ता एक गैंग

काम करता है, उसमें चौकीदार, हवलदार,जमादार, एसएसआई और असमाजिक दलालों की अहम भूमिकाएं होती है। जिन पुलिस थानों में अच्छे प्रभारी हैं, सुनियोजित ‘गैंग’ की फीडबैक के आगे ऐसे थाना प्रभारियों का ब्रेन भी हैंग दिखता है। कुछ थाना प्रभारी तो खुद में ऐसे घाघ हैं, जो डीएसपी, एसपी तक को उल्टी पहाड़ा सिखा डालते हैं।

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