सिर्फ प्रेस क्लब भवन कब्जाने के लिये चंद मठाधीश लोग चाहते हैं फर्जी संस्था का अवैध चुनाव !

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राजनामा.कॉम। रांची प्रेस क्लब है या द रांची प्रेस क्लब ? इसमें वैध कौन है और अवैध कौन?  रांची की मीडिया और व्यवस्था के सामने एक बड़ा सबाल उभर कर सामने आया है।

तेतरटोली, बरियातु निवासी इन्द्र देव लाल द्वारा मांगी गई आरटीआई पर अवर सचिव सह जन सूचना पदाधिकारी, निबंधन प्रभाग, रांची (झारखंड) की स्तर से जो दस्तावेज उपलब्ध कराये गये हैं, उससे साफ स्पष्ट होता है कि न तो रांची प्रेस क्लब वैध है और न ही द रांची प्रेस क्लब। क्योंकि दोनों में कहीं कोई विभेद नजर नहीं आता जबकि फर्जी तरीके से समान प्रक्रिया अपनाई गई है।

दिनांकः 22.10.2009 को रांची प्रेस क्लब रांची का निबंधन प्रक्रिया के दौरान प्रशाखा पदाधिकारी की विन्दुवार विवरण है कि…

  1. रक्षित प्रेस क्लब रांची का आलोक विहित प्रपत्र में नहीं है।

  2. कार्यकारिणी एवं आकांक्षी सूची संलग्न नहीं है तथा सही नहीं है।

  3. रांची प्रेस क्लब के आलोक के अंत में तीन पदाधिकारी का हस्ताक्षर नहीं है।

  4. कार्यकारिणि के पदाधिकारी का आवासीय प्रमाण पत्र संलग्न नहीं है।

  5. स्मृति पत्र नहीं है।

उपरोक्त विन्दुवार विवरण पर अवर सचिव, निबंधन विभाग ने साफ टिप्पणी की है कि रांची प्रेस क्लब से मिलता जुलता नाम झारखंड प्रेस क्लब रांची तथा प्रेस क्लब निबंधित है।

अब सबाल उठता है कि जिस तिथि को निबंधन विभाग रांची प्रेस क्लब को लेकर सबाल खड़े करती है, उसी तारीख को द रांची प्रेस क्लब, जिसे कथित संस्था के रहनुमा रांची प्रेस क्लब की संज्ञा भी दे रहे हैं, उसका निबंधन कैसे हो गया?

उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यदि हम कथित द रांची प्रेस क्लब नामक संस्था की भी बात करें तो उसके निबंधन में भारी फर्जीबाड़ा बरती गई है। आवेदन के साथ संलग्न फर्जी और भ्रामक दस्तावेजों के आधार पर ही उसी दिन कैसे निबंधित कर दी गई, जिस दिन आवेदन दिया गया।

वेशक रांची प्रेस क्लब हो या द रांची प्रेस क्लब। दोनों फर्जी प्रतीत है। ऐसे कागजी संस्थाओं के मठाधीशों की मंशा के अनुरुप पहले 31 सौ रुपये, उसके बाद 11 सौ रुपये लेकर करीब 884 सदस्य बनाये गये। इस दौरान कहीं भी पार्दशिता नहीं बरती गई। बंद कमरे में सबने अपने लगुए-भगुए को सदस्य बना अपनी मठाधीशी कायम रखने के लिये खुद की नियमावली के विरुद्ध कार्यवाही की।

कथित द रांची प्रेस क्लब की जो वेबसाइट है, उस पर नये सदस्यों की सूची जारी की गई है। एक गहन पड़ताल के अनुसार कुल 884 सदस्यों में आधे से अधिक फर्जी हैं। कथित संस्था की नियमावली को उनके करींदों ने ही बखिया उघेड़ डाली है।

जबकि करीब 250 ऐसे आवेदकों की सदस्यता को पेंडिंग मोड में रखा है, जिसमें प्रायः को पत्रकारिता की श्रेणी में ससम्मान रखा जानी चाहिये।

इसमें मामले में संस्था के सदस्यता कमिटि के लोगों का कहना है कि जिन पत्रकारों को सदस्यता नहीं दी गई है, उसे ‘ होल्ड ‘ पर रखा गया है, चुनाव बाद उनके आवेदन पर विचार किया जायेगा। इससे बड़ी वेशर्मी की हद क्या हो सकती है।

अब सबाल उठता है कि जिस तरह से एक फर्जीबाड़े के तहत संस्था का निबंधन कराया गया और फर्जीबाड़े के तहत सदस्य बनाये गये, उस आलोक में 27 दिसंबर को घोषित संस्था चुनाव को भी फर्जी न कहा जाये तो क्या कहा जाये।

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