सर्च, सीजर और रेड का पावर चाहिये :झारखंड लोकायुक्त

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राजनामा.कॉम के संपादक मुकेश भारतीय ने झारखंड के  लोकायुक्त जस्टिस अमरेश्वर सहाय से उनके कार्यालय में कई ज्वलंत मुद्दों पर बात-चीत की। प्रस्तुत है उसके मुख्य अंशः-

अगल राज्य बनने के बाद आप झारखंड को आप कहां देखते हैं ?

लोकायुक्तः पिछले बारह बर्षों में झारखंड को कम से कम बारह पायदान उपर चढ़ जाना चाहिये था। लेकिन यह काफी दुर्भाग्य की बात है कि मेरी राय में यह दो पायदान ही उपर चढ़ पाया है और अभी दस पायदान नीचे है। जिस तरह से इसका विकास होला चाहिये था, वह नहीं हो पाया है। यहां संसाधनों की कमी भी नहीं है लेकिन,यहां जमीन की कमी है। यहां सीएनटी एक्ट लागु है।यह एक बड़ी समस्या है। सच पुछिये तो यहां सबसे बड़ा है आदिवासी और गैर आदिवासी का झगड़ा।डोमिसाइल वाला मामला जो हुआ था, वह अब भी कम नहीं हो रहा है।अभी तक लोगों के जेहन में वह बैठा हुआ है।उसका खमियाजा पूरा राज्य भुगत रहा है।कभी कोई राजनेता कुछ स्टेटमेंट देता है तो कभी कोई कुछ बयान देता है।राज्य के बारे में कोई नहीं सोचता।सब अपनी रोटी सेंकते हैं।मेरी समझ में किसी ऐसी पार्टी की सरकार होनी चाहिये ,जिसमें काम करने की इच्छाशक्ति हो।वह यहां की जमीनी हकीकत को समझे।

आप मानते हैं कि इसमें सुधार की गुंजाइश है ?

लोकायुक्तः एकदम कैरेक्ट है भाई। बिल्कुल सुधार की गुंजाइश है। पहले यहां से रेवन्यू बिहार जाता था और काम होता था बिहार में। छोटानागपुर, संथाल परगना जैसे क्षेत्रों में कहीं कोई ध्यान नहीं दिया गया। यहां की गरीबी, अशिक्षा,बेकारी आदि की समस्याओं को कोई देखने वाला नहीं था। झारखंड बनने के बाद लोगों में एक बड़ी उम्मीद जगी कि अब यहां विकास तेजी से होगा। क्योंकि यहां इनकम ऑफ सोर्सेस बहुत था। यहां से रेवन्यू बहुत आता था। और आया भी। लेकिन यहां के जो सुपर नेता थे,वो भी लुटने में मशगुल हो गये।किसी ने विकास की दिशा में कोई रुचि नहीं दिखाई। ऐसे में जब यहां वर्क कल्चर नहीं बनेगा, लूट नहीं रुकेगा तो राज्य विकास की पटरी पर कैसे दैड़ेगी।

आप कहते हैं कि भ्रष्टाचार बहुत बड़ी समस्या है तो अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी है ?

लोकायुक्तः कार्रवाइयां तो हुई है लेकिन अभी तक किसी को कोई सजा नहीं हुई है। और आप देखियेगा कि जब वह जेल जाता हैं तो देखियेगा कि उन लोगों के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं है। पूरी वेशर्मी की हद है।लगता है कि वे कोई बहुत बड़ा काम करके जेल जा रहे हैं।

आप एक लोकायुक्त के रुप में इसे कैसे देखते हैं ?

लोकायुक्तःदेखिये, लोकायुक्त का काम है कि भ्रष्टाचार पर किस तरह से नियंत्रण पाया जाये। अगर कोई  भ्रष्ट तरीका अपनाता है और उसके खिलाफ कोई कंप्लेन करता है तो उसकी इन्क्वायरी करके  कार्रवाई करने के लिये सरकार के पास अनुशंसा भेजना है।अभी यहां कोई ऐसा बड़ा मामला सामने आया नहीं है। शायद लोगों को जानकारी की कमी है। अभी ज्यादातर मामले अफसरों के खिलाफ,कुछ बगलिंग, पेशनादि के आते हैं।सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में गड़बड़ी की शिकायतें भी आती है। हमने ऐसे ढेरों मामले में कार्रवाईयां की है। चूकि हमारे पास ऐसा कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं है। हमें निर्भर होना पड़ता है निगरानी विभाग,सीआईडी विभाग या जेनरल पुलिस पर।

 तो क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि आप जिन जांच एजेंसियों पर निर्भर हैं। पहले से कहीं न कहीं वो सारे लोग भी समस्या की जड़ रहे हैं ?

लोकायुक्तः बिल्कुल। कैरेक्ट बात है यह।

अब क्या आपको नहीं लगता है कि राज्य सरकार कहीं न कहीं आपको अधिकार देने के पक्ष में न हीं संसाधन ?

लोकायुक्तः फिलहाल सीधे मैं ऐसा कहने के पक्ष में नहीं हूं। लेकिन पूरी तरह लोकायुक्त कैसी होनी चाहिये,इसकी जानकारी नहीं मिलपायी है। इस संबंध में बिहार एक्ट था जो,पूरी तरह यहां उसे ही मान लिया गया। लेकिन बिहार भी अपना पुराना एक्ट चेंज कर चुका है लेकिन हम पुराने एक्ट पर ही चल रहे हैं। अगर यहां वो एक्ट में सुधार कर लिया जाये।लोकायुक्त को सीधे जांच कार्रवाई के अधिकार सौंप दिया जाये तो बहुत हद तक यहां भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है।

आपने कहा कि मुख्यमंत्री भी लोकायुक्त के दायरे में आना चाहते हैं। लेकिन सबाल उठता है कि जब तक लोकायुक्त  स्वतंत्र एजेंसी नहीं बनता है तो क्या राज्य के घिसे-पीटे जांच एजेंसियों के बल उनके दायरे में आने का औचित्य रह जाता है ?

लोकायुक्तः इसका अर्थ सरकार ने कुछ पहल किया है कि कुछ एक्ट को समाप्त किया जाये और कुछ नया एक्ट लाया जाये। अब ये सब कब तक आयेगा। कब तक पास होगा। कब तक महौल मिलेगा। यह कहना मुश्किल है। लेकिन मुझे लगता है कि कुछ साल बाद स्थितियां अनुकुल हो जायेगी।

चूकि आप राज्य एजेंसियों की जांच पर निर्भर हैं , जो राज्य सरकार के मातहत काम करती है। तो जब सीधे सरकार के खिलाफ मामले आयेगें तो उस स्थिति से आप कैसे निपटेगें ?

लोकायुक्तः उस मामले में काफी दिक्कत है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़,हिमाचल प्रदेश या फिर बिहार देखिये। वहां की परिस्थितियां लोकायुक्त के पक्ष में है।अब वहां की तुलना झारखंड के लोकायुक्त से करेगें तो काफी बेइमानी होगी एक तरह से। क्योंकि वहां के लोकायुक्त के पास सर्च, सीजर और रेड के पावर हैं। यहां के लोकायुक्त के पास तो नहीं है।और इस स्थिति में कोई भी लोकायुक्त की संस्था सही से काम नहीं कर सकती।

 अगर राज्य सरकार की एजेंसियों से जुड़े लोगों की शिकायते आती है तो आप उससे कैसे निपटेगें ? क्योंकि आप उसी पर निर्भर हैं।

लोकायुक्तः अगर किसी मामले में पहले से जांच चल रही है तो हम पैरलर जांच नहीं कर सकते हैं। जब तक पावर और इंडेपेंडेट नहीं मिल जाती है।नहीं कर सकते हैं। हां अगर राज्य सरकार की किसी एजेंसियों की शिकायत आती कि वह जानबुझ कर मामने को दबाये हुये है। कार्रवाई नहीं कर रही तो शिकायत मिलने पर जांच करा सकता हूं।

 आखिर लोकायुक्त को सरकार द्वारा शक्तियां देने में कोताही-बिलंब क्यों ?

लोकायुक्तः शायद सरकार यह समझती हो कि शक्तियां और संसाधन मिल गये तो लोकायुक्त उसके सिर पर भी बैठ सकती है।

कहीं सरकार लोकायुक्त को लेकर कर्नाटक, मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़,हिमाचल प्रदेश,बिहार जैसे प्रांतो की स्थितियां से डर तो नहीं रही है ?

लोकायुक्तः हो सकता है। जो महौल चारो ओर पहले से बन गया है। यहां भी हो सकता है। शक्ति दो। संसाधन दो। फिर देखो..(मुस्कुराते हुये)….क्या होता है।

 आपने लोकायुक्त की संस्था को आम आदमी को जोड़ने के लिये क्या कदम उठाये हैं ?

लोकायुक्तः इस दिशा में मैंने संस्था की वेबसाइट की शुरुआत करवाई है।उसमें तमाम जानकारियां हैं।लोकायुक्त को लेकर आम आदमी के अधिकार और उनके द्वारा पहल के बारे में पूरी जानकारी है।लेकिन वेबसाईट का प्रसार सीमित है।यह देख कर तब मैंने मोबाइल वैन के जरिये गांव-देहात के बाजारों में लीफलेट,पर्चों के जरिये जागरुकता की पहल की। हिन्दी और नागपुरी भाषा में ऑडियो सीडी बनवाई। लोगों के बीच बंटवाया। जिसमें लोकायुक्त संस्था और लोगों के अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी है।इसके बाद पूरे झारखंड में कैंप लगवाया।मैं खुद कई इलाकों में जाकर कैंप लगाता रहा। इसके कुछ अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं।

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