सबाल पत्रकारिता के जातिगत ताने-बाने का

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कई बार मन प्रश्न करता है कि दबंग फ़ेम सलमान खान यदि चुलबुल पांडे के स्थान पर चुलबुल चमार होते तो क्या तब भी उनकी फ़िल्में इतनी ही सुपरहिट होती? यह सवाल मेरे मन ने उस समय भी किया जब संजीव जायसवाल की फ़िल्म शुद्र द राइजिंग का बिहार में कहीं भी प्रदर्शन नहीं हुआ।

सवाल उस समय भी उठता है जब बिहार सरकार अपने कार्यकाल का वर्षगांठ मनाती है और सूबे के अखबारों में सरकारी उपलब्धियों के मूल्यांकन के बजाय अभिनंदन पत्र प्रकाशित किए जाते हैं। मन पुछता है कि क्या यही पत्रकारिता है?

निस्संदेह पत्रकारिता एक मुकम्मिल विषय है और मुझे इसका दिली अफ़सोस है कि मैं इसका विद्यार्थी कभी नहीं रहा। इस कारण पत्रकारिता शब्द की किताबी परिभाषा से अंजान हूं। कई बार सोचता हूं कि क्या वाकई इसकी कोई परिभाषा हो सकती है?  रेणु जी के रिपोर्ताज को एक पत्रकार की अभिव्यक्ति नहीं कही जा सकती है या फ़िर बाबा नागार्जुन की कवितायें क्या इसकी परिभाषा के दायरे में शामिल नहीं होती हैं। अलबत्ता रामधारी सिंह दिनकर और इनके जैसे अनेक साहित्यकारों-रचनाकारों को पत्रकारिता के दायरे में शामिल किया जाना अनेक सवाल पैदा करेगा। इसकी वजह यह कि उनकी रचनाओं में आम आदमी की भूख, पीड़ा और विपन्नता का अभाव है, जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था की सबसे बड़ी सच्चाई है।

MEDIAइसे मेरी अल्पज्ञता ही कहिए कि जितनी बार पत्रकारिता शब्द के मायने खोजने का प्रयास करता हूं, हर बार यह एक नये स्वरुप में मेरे सामने प्रकट हो जाता है। मसलन मुंशी प्रेमचंद की रचनाधर्मिता पत्रकारिता की पराकाष्ठा थी। गांव के हलकू की दशा और सामाजिक व्यवस्था को उनके शब्दों ने अमर कर दिया। फ़िर ईदगाह कहानी का वह नन्हा बालक हामिद और मेले की दास्तानगोयी पत्रकारिता नहीं तो और क्या थी?

सबसे बड़ी बात यह कि पत्रकारिता विशुद्ध रुप से साहित्य है और साहित्य समाज का दर्पण होता है। जरा सोचिए उस दर्पण के बारे में, जो मुझ जैसे काले व्यक्ति का चेहरा गोरा दिखाये, तो उसे आप क्या कहेंगे? जाहिर तौर पर उसे आप कोई जादू या फ़िर तकनीक का कमाल की संज्ञा देंगे।

मौजूदा दौर में साहित्य और पत्रकारिता दोनों एक-दूसरे से जुदा हो गए हैं। साहित्य अभी भी समाज के वास्तविक दर्पण के रुप में कार्य कर रहा है। वही पत्रकारिता साहित्य से अलग होकर एक ऐसे दर्पण के रुप में बदल गया है, जिसकी छवियां वास्तविकता से मेल नहीं खाती हैं। आम आदमी भी इस दर्पण का इस्तेमाल इसलिए करना पसंद करता है क्योंकि मौजूदा दौर में परेशानियों की कोई कमी नहीं है और वह अब इनसे बेजार हो चुका है। रास्ते बंद हो चुके हैं।

अभी लोग चर्चा कर रहे हैं कि बिहार में मीडिया पर अघोषित रुप से सेंसरशिप लागू है। पत्रकारों को लिखने नहीं दिया जा रहा है। प्रेस की आजादी खतरे में है। पहली बार किसी संवैधानिक संस्था ने इस मुद्दे पर आगे बढकर पुरी स्थिति की समीक्षा की और अपनी रिपोर्ट दी है। एक पत्रकार होने के नाते मैं इस बात को कह सकता हूं कि आज बिहार में पत्रकारिता करना आसान काम नहीं है। हां चाटुकारिता के लिए राह में कोई बाधा नहीं है। आप सरकार के पक्ष में लिखिए, फ़िर चाहे आप दलाली ही क्यों न करें, अखबार अथवा हाऊस के लिए आप एक महत्वपूर्ण अंग हैं।

लेकिन इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह कि बिहार में केवल सरकार द्वारा अघोषित सेंसरशिप  नहीं है। वास्तविकता यह है कि यहां के पत्रकार अपने-अपने जातिगत दायरों में सिमट गये हैं। सबकी अपनी-अपनी जातियां हैं। थोड़ा और खुलकर बात की जाय तो ब्रहमेश्वर मुखिया की शवयात्रा के दौरान पटना को कब्जा में लिये जाने के मामले में मैमन मैथ्यू इस कारण लिख पाये कि उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि अलग थी। किसी भी दूसरे स्थानीय अखबार ने बिहार पुलिस के इस कारनामे पर उंगली नहीं उठायी। इसके विपरीत उस दिन के अखबारों में मुखिया को देवता साबित करने की भरपूर कोशिश की गयी।

मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज के अखबारों में खबर का चयन अल्पसंख्यक सवर्ण समाज के हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है और इसके लिए सरकारी दबाव से बढकर सामाजिक दबाव है। सरकार तो अपनी नाकामयाबी छिपाने के लिए विज्ञापन का डंडा चलाती है, लेकिन बिहार के सवर्ण पत्रकार अधिकांश मामलों में अपने वर्ग की मान मर्यादा बची रहे, इसके लिए अपना कलम चलाते हैं। मेरे इस कथन का एक प्रमाण यह भी कि बिहार सरकार द्वारा सवर्ण आयोग के गठन को अब तीन वर्ष पूरा होने में अब केवल कुछ महीनों का समय शेष रह गया है, लेकिन पिछले तीन वर्षों में किसी भी अखबार ने इस आयोग के बारे में कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं किया है। आज के अखबारों में सवर्ण पत्रकारों का बढता वर्चस्व ही है कि लालू प्रसाद से जुड़ी खबरों को अंदर के पन्नों पर कम से कम शब्दों में निबटा दिया जाता है। बलात्कार और उत्पीड़न की घटनाओं के केंद्र में यदि सवर्ण समाज न हो तो, फ़िर उस मामले को दबाने की हरसंभव कोशिश की जाती है।

बहरहाल, जाति बिहार की सामाजिक व्यवस्था की धुरी है। आज भी सूबे के सभी अखबारों के संपादक सवर्ण हैं। निर्णय लेने की क्षमता वाले सवर्ण पत्रकारों की संख्या 99 फ़ीसदी से भी अधिक है। संभव है कि लोग इसे दलितों और पिछड़ों की योग्यता से जोड़ें, जो न तो न्याय संगत है और न ही तर्क संगत। इन सबके पीछे पूंजी है। अधिकांश मीडिया घरानों में पूंजी सवर्णों की पूंजी है। यह पूंजी ही है जो अधिक से अधिक रिटर्न चाहता है और चुंकि सरकार मेहरबान है, इसलिए पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता भी स्वीकार्य है।

इस स्वीकार्यता की एक और वजह यह कि इन्हें डर है कि कहीं  ‘कुर्मी को ताज, भुमिहार को राज’ वाली स्थिति बदल न जाय। मेरी व्यक्तिगत राय है कि प्रेस काउंसिल आफ़ इन्डिया द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच दल (कल्याण बरूआ, राजीव रंजन नाग और अरूण कुमार ) ने इस पक्ष को नजरअंदाज किया है। अगर ऐसा नहीं होता तब यह तथ्य भी सामने आता कि बिहार के अखबारों और न्यूज चैनलों में दलितों और पिछड़ों से जुड़ी खबरों को क्यों नजरअंदाज कर दिया जाता है।  

…….लेखकः  नवल किशोर  अपनाबिहार. ओआरजी  वेबसाइट के संपादक हैं।

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