वाह री नालंदा पुलिस ! साजिशन हमले के शिकार पत्रकार को ही बना डाला मुख्य आरोपी

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बिहार में फैले दारु-बालू के अवैध कारोबार में पुलिस की संलिप्ता के मामले उजागर होते रहे हैं।  बात जब  पुलिस को किसी पत्रकार द्वारा आयना दिखाने की हो, नालंदा जिले के प्रायः थानों की पुलिस का चेहरा खुल कर सामने आ जाता है। यहां ऐसे अनेक मामले हैं, जिसमें पुलिस की जांच कार्रवाई एकतरफा होती है और शीर्ष स्तर के जिम्मेवार पुलिस अफसर भी कागजी खेल को समझ नहीं पाते ।”

राजनामा.कॉम। बहरहाल, इस एफआईआर को देखें-पढ़ें-समझें। यह एफआईआर में पत्रकार राजीव रंजन समेत 9 लोगों को आरोपी बनाया गया है। जिसमें दो नाबालिग हैं।

यह एफआईआर नालंदा जिला के मानपुर थाना में दर्ज हुई है। जबकि पत्रकार राजीव रंजन 29/04/18 दिन रविवार सुबह 7:30 बजे अपने घर में शादी में आए परिवार को छोड़ने जा रहे थे, तभी बालू माफिया के गुर्गों के द्वारा उन पर जानलेवा हमला किया जाता है।

उस मुसीबत से किसी तरह बच निकले राजीव रंजन अपने घर आ जाते हैं। इसके बाद बालू माफियाओं के गुर्गे लाठी-डंडे, राइफल लेकर घर के पास आ कर गाली-गलौज करते हुये ईट पत्थर फेंकने लगते हैं।  

तत्पश्चात राजीव रंजन ने इस घटना की सूचना मानपुर थाना अध्यक्ष दी। इसके करीब एक घंटा बाद मानपुर थाना एसआई  सुबोध राणा, एसआई अजय चौधरी समेत पुलिस बल का आगमन होता है।

सवाल उठता है कि पुलिस जिस रामप्रवेश सिंह, रवि शंकर कुमार, सुदामा सिंह, भिखारी सिंह, कन्हैया सिंह अपने आप को घायल बता रहा है, वह पुलिस आने तक पूरी तरह सुरक्षित है। इसका प्रमाण एक वीडियो है, जिसमें हमलावर लोग साफ तौर पर एसआई सुबोध राणा के साथ अकेले में बातचीत करते हुए नजर आते हैं।

जब एसआई सुबोध राणा से बातचीत हो ही रही थी,तभी राजीव रंजन के पड़ोसी परमानंद सिंह, जयशंकर सिंह पुलिस को देख कर मामले की जानकारी देने पहुंचते हैं और हमलावरों को समझाने का प्रयास करते हैं कि हर किसी का इज्जत होता है। पत्रकार राजीव रंजन की 2 दिन पहले ही शादी हुई है। सारे नाते-रिश्तेदार आये हुये हैं। इस तरह की हरकत काफी असमाजिक है।

तभी एसआई सुबोध राणा और अन्य पुलिस बल के सामने परमानंद सिंह और जयशंकर सिंह को लोहे की रॉड राइफल के बट तथा ईंट पत्थर  से मारपीट कर घायल कर दिया जाता है।

इसके बाद मामला बेकाबू होता देख पुलिस ने खुद लाठीचार्ज किया, जिसमें रामप्रवेश सिंह, रविशंकर, सुदामा सिंह, भिखारी सिंह को कुछ चोटें आई। तभी एसआई सुबोध राणा ने बुरी तरह घायल परमानंद सिंह को एक अन्य रिकार्डेड वीडियो में एक हाथ से गमछी बांधते दिख रहा हैं और एक हाथ में डंडा लिए हुए।

इसके बाद पुलिस की कार्यशैली पर सीधा सवाल उठता है। पुलिस एफआईआर के समय में उलटफेर करना शुरु कर देती है। राजीव रंजन ने थानाध्यक्ष को सुबह 7:31 बजे कॉल किया। इसकी ऑडियो रिकॉर्डिंग भी मौजूद है। लेकिन एसआई सुबोध राणा द्वारा किए गए एफआईआर में सुबह 8:00 बजे खबर मिलने और सुबह 8:15 बजे पहुंचने तथा पहुंचने के पहले सभी व्यक्ति को आपसी मारपीटमें घायल होने की बात लिखा है।

इतना ही नहीं पूरी तरह घायल व्यक्ति परमानंद सिंह, जयशंकर सिंह को जेल में डाल  दिया। बुरी तरह घायल व्यक्ति परमानंद सिंह को जेल के द्वारा फिर से वापस हॉस्पिटल भेज दिया गया। जिसका इलाज बिहार शरीफ सदर अस्पताल में चला।

सबसे दिलचस्प बात कि इस एफआईआर में जिस कंचन देवी ने सोने का दो भर का चेन छीनने का जिक्र किया है, उसी कंचन देवी ने 2 महीने पूर्व गांव के आशा देवी पर एक भर का चयन छीनने का एफआईआर किया है।

बहरहाल प्रशासन द्वारा चिन्हित बालू माफियाओं की शह पर पत्रकार राजीर रंजन पर जानलेवा हमला होता है। वह सुसमय पुलिस को सूचना देता है। लेकिन पुलिस वेसमय आती है और दो गुटों में झाड़प का मामला बना जाती है।

हालांकि, यह सब निष्पक्ष पुलिस अनुसंधान का विषय है। जैसा कि नालंदा में अमुमन कम देखने को मिलता है। पत्रकारों से जुड़े मामलों में तो बिल्कुल ही नहीं। शायद पुलिस पत्रकार पर हमला जैसे मामले उजागर होने नहीं देती या फिर किसी निर्भिक बेबाक पत्रकार से वे भयभीत होकर अवसर मिलते ही उसे हरसंभव दबाने का प्रयास करती है।  

दुर्भाग्य की बात है कि मानपुर पुलिस पीड़ित पत्रकार की शिकाय भी दर्ज नहीं करती है। राजीव रंजन की बेबाक पत्रकारिता से चिढ़े तथाकथित कुछ मीडियाकर्मी भी इस मामले को उल्टा रंग देने के खेल में शामिल हो जाते हैं। वे पत्रकार को मुख्य आरोपी करार देते हैं।

पत्रकार के स्वस्थ्य पिताजी को दो नामचीन अखबार के गिरी मानसिकता वाले संवाददाता घायल बता कर अस्पताल में भर्ती बता डालता है। संदिग्ध पुलिस की प्रवक्ता बन जाता है। खासकर वैसे संवाददाता लोग, जिस पर खुद पुलिस-प्रशासन के शीर्ष स्तरसे दंगा भड़काने, उसमें शामिल होने जैसे आरोप के तहत मुकदमें दर्ज किये जाते हैं।   

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