ई बाबूलाल मरांडी ही हैं साहब

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देखिये इन्हें। ये झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री और सांसद श्री बाबू लाल मरांडी जी हैं जो पिछले पंद्रह दिनों से पाकुड़ जिले के पनचुवाडा गाँव में डेरा डाल कर विस्थापितों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसी चापाकल पर स्नान और खुले आसमान के नीचे रात्री विश्राम . उन्हें पता है कि गरीबों के हक़ की लड़ाई यूँ ही नहीं लड़ी जाती। उन्हें यह भी पता है कि आंदोलन कैसे किया जाता है। अगर उनके बारे में पिता की विरासत पर गुलछर्रे उड़ने वाला कोई नवसिखुआ कहे कि ” मरांडी जी को आन्दोलन करना सीखना चाहिए” तो आप क्या कहेंगे उसे?

मरांडी जी पेनम कोयला खदान से विस्थापित हुए उनलोगों के मांग का समर्थन कर रहे हैं जिनके साथ पेनम ने धोखा किया है। विस्थापितों की मांग बस इतनी कि कोयला खदान खोलने से पहले स्कूल अस्पताल जैसे जो कल्याणकारी काम 2007 दिसंबर से पहले पूरा कर चालू कर दने का करार पेनम प्रबंधन ने विस्थापितों से किया था वह छह साल बाद भी क्यों नहीं पूरा हुआ। महज कुछ करोड़ रूपये के ये काम नहीं कर गरीबों के साथ विस्वाश्घात क्यों हुआ? जबकि गुजरे छह सालों में पेनम इन्ही विस्थापितों की छाती यानि उनकी धरती का सीना चीर करीब 355 अरब रूपये का कोयला यहाँ से ले गई है।

विस्थापित चाहते हैं कि खदान के मालिक उज्जवल उपाध्याय यहाँ आयें और बताएं कि वह करार कबतक पूरा करंगे जिसे उन्हें छह साल पहले ही पूरा कर देना था। पर बेचारे उज्जवल जी इतने व्यस्त हैं की वे पंद्रह दिनों में उन गरीब दलित आदिवासियों से मिलने आने के लिए समय नहीं निकाल पा रहे, जिनकी छाती चीर कर रोज 36000 टन कोयला ले जाते हैं और इसी की कमाई से वे खरबपति बन गये हैं। । अलबत्ता उनके पास रांची आने और सत्ताधीशों और नौकरशाहों से मिलकर विस्थापितों के हक़ की लाश पर आन्दोलन को तहस नहस करने की योजना पर मंत्रणा करने के लिए पूरा वक़्त है। वाह रे झारखण्ड की सरकार। इसे विस्थापितों का वाजिब हक़ दिलाने से कोई सरोकार नहीं।

सरकार चाहती तो विस्थापितों की मांगे पूरी करा कर दुनिया को यह बताती कि गरीब आदिवासी विस्थापितों को भिखारी बनाकर छोड़ देने का जो काम बिहार के ज़माने में होता था वैसा झारखण्ड के ज़माने में नहीं होगा। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पेनम कोयला खान झारखण्ड राज्य बनने के बाद खुलने वाला पहला प्रोजेक्ट है जिसमे गरीब आदिवासियों का विस्थापन हुआ है। इन विस्थापितों की सुधि झारखण्ड सरकार कब लेगी?

…. सुनील तिवारी की रिपोर्ट

 
 
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