मौजूदा पत्रकारिता के दौर में खोजी खबरों का खेल

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खोजी पत्रकारिता भी दरअसल पौधा रोपण की पत्रकारिता है। जब इसकी शुरुआत हुई थी, ढूंढ़-ढांढ़ कर जनहित की खबरें लाई जाती थीं, जो आमतौर पर सरकार और शासकों के खिलाफ होती थीं।

investigative-journalismमीडिया को नियंत्रित करने की सरकार की कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि ऐसी खबरों की जगह कम होती गई और फिर पेड न्यूज शुरू हुआ। अब तो ज्यादातर अखबार के लगभग सारे पन्ने पेड न्यूज होते हैं या यूं कहिए कि चाटुकारिता वाले होते हैं। बदले में विज्ञापन मिलता है। नहीं तो विज्ञापन बंद कर देने की धमकी।

अब जब खोजी पत्रकारिता मुख्यधारा की पत्रकारिता से गायब हो चली है तो आइए खोजी पत्रकारिता को याद करें। श्रद्धांजलि दें। वैसे यह भी सच है कि ज्यादातर मामलों में खोजी खबरें भी आखिर कोई नाराज ही ष्लीकष् करता है। उद्देश्य उस गड़बड़ी को ठीक करना होता है।

अब भक्ति पत्रकारिता शुरू हुई है। इसमें बुरी बात यही है कि स्वतंत्र या निष्पक्ष दिखने के लिए एक भी खबर सरकार के खिलाफ गई तो सारी भक्ति बेकार चली जाएगी। जबकि विरोध वाली पत्रकारिता में प्लांटेशन के अलवा अपनी इच्छा से भी खबरें करने की स्वतंत्रता रहती है। इसीलिए वहां पत्रकारिता करने की संभवना ज्यादा है और उसे भक्ति पत्रकारिता की तरह बुरा नहीं माना जाता। अगर आप किसी दबाव या लालच में भक्ति की खबरें देते हैं तो स्वेच्छा से भी भक्ति की ही खबरें देनी होगी। खोजी पत्रकारिता इस मायने में भक्ति से काफी अलग है।

बकौल वरिष्ठ पत्रकार अरुण शौरी, एक्सप्रेस के रीसेप्शन पर लोग पूरी फाइल छोड़ जाते थे और फोन करके बता देते थे कि फाइल रख आया हूं। ऐसे में जब राजीव गांधी के खिलाफ बोफर्स घोटाला चल रहा था और एक्सप्रेस रोज नई-नई खबरें छाप रहा था तो सरकार के खिलाफ उसकी खबरें वैसे ही देखी जाती थीं, जैसे आज सरकार की भक्ति की खबरें देखी जाती हैं। खबर लीक करने वालों का मकसद और लक्ष्य होता है। इसलिए वह चाहता है कि लीक को गंभीरता से लिया जाए।

अब जब एक्सप्रेस ने सर्जिकल स्ट्राइक पर भक्ति वाली रिपोर्टिंग की है तो पुराना जमाना याद आ रहा है। खिलाफ खबरें छापने के लिए भी किसी साख वाले अखबार को चुना गया था। ऐसे में सरकार ने अपने समर्थन में खबर छपवाने के लिए टीवी चैनलों की साख के मद्देनजर एक्सप्रेस की साख का उपयोग किया। यह भी संभव है कि एक्सप्रेस ने अपनी यह निःशुल्क सेवा स्वेच्छा से उपलब्ध कराई हो पर अभी यह चर्चा का विषय नहीं है। और जैसी उम्मीद थी भक्तगण एक्सप्रेस की साख के हवाले से कहने लगे, एक्सप्रेस में छपी है खबर!

कहने का मतलब, खबर सरकार के खिलाफ हो या पक्ष में, उसे छपवाने (फैलाने) वालों के खेल के नियम हैं और वे साख तलाशते हैं या उपयोग करते हैं। मीडिया ने जिस तेजी से अपनी साख कोई है उसमें इस खेल का क्या होगा?

हो सकता है कि कुछ समय में मीडिया की साख बनाने के लिए सरकार के खिलाफ खबरें छापने-छपवाने का खेल शुरू हो। करोड़ों का धंधा करने वाला यह चैथा स्तंभ यूं ही नहीं चलता रहेगा। ताकत है तो उसका उपयोग-प्रदर्शन भी होगा ही। फिलहाल, एक्सप्रेस ने जो क्रांतिकारी खबर छापी है, वह भारत में खोजी पत्रकारिता के इतिहास में श्बेमिसालश् साबित हो सकता है।

दिल्ली डेटलाइन से छपी खबर पढ़ने पर समझ में आता है कि सारा मामला आईडिया का है। किसी सर जी ने एन्क्रिप्टेड चैट सिस्टम से लिखित सवाल भेजकर अनजाने आम निवासियों का इंटरव्यू किया। तमाम हस्तियां सवाल पहले लिखकर मांगती हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने आम आदमी को भी यह सुविधा दी। सुधीर चैधरी को पत्रकारिता के लिए पुरस्कृत करने के बाद इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता में यही बाकी रह गया था।

जहां तक भाजपा की राष्ट्रवादी सरकार के राज में मीडिया की भक्ति की बात है तो  मीडिया ऐसे तमाम मुद्दे उछाल देता है, जो मुद्दा होते ही नहीं हैं। दूसरी ओर, ऐसे तमाम मुद्दों पर चुप्पी साध लेता है जिनपर चर्चा होनी चाहिए।

इसी क्रम में सर्जिकल स्ट्राइक से संबंधित सबूत का मुद्दा भी है। अव्वल तो सर्जिकल स्ट्राइक ही मुद्दा नहीं है। पर हम इसके सबूतों की चर्चा कर रहे हैं। इसमें मीडिया को जो मुद्दे उठाने चाहिए वे छूट जा रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक ढिंढोरा पीटने की चीज नहीं है।

जब सार्वजनिक चर्चा होगी तो सवाल भी उठने शुरू हुए। जब यह दावा सामने आया कि पहले भी स्ट्राइक हुए हैं और पुरानी सरकारों ने इसका श्रेय लेने की कोशिश नहीं की तो यह कहा जाने लगा कि पहले स्ट्राइक हुए थे, इसके क्या सबूत हैं।

ऐसे में अगर एक्सप्रेस ने लीक से हटकर यह साबित करने की कोशिश की कि कुछ तो हुआ था तो आज हिन्दू ने छापा है कि पहले भी कुछ-कुछ होता रहा है।

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