मैं ही सबका पूर्वज हूं, मैं आदिवासी हूं।

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adiwasiहम है आदिवासी

मैं पृथ्वी का पहला इंसान,

मैं किसी ॠषि का अवैध संतान नहीं हूँ,

ना महाभारत युद्ध के भगोड़े विधवाओं का पुत्र,

बल्कि मैं ही सबका पूर्वज हूँ,

मैं आदिवासी हूँ।

मैं गंवार नहीं हूँ,

ना ही मैं अनपढ़ हूँ,

प्रकृति की भाषा समझने वाला का मैं एकमात्र हूँ,

मैं आदिवासी हूँ।

ना ही धर्म परिवर्तन के डर से पहाड़ों में छिपा हुआ,

बल्कि निस्वार्थ अपने तीरों के दम से प्रताप और शिवाजी को मैं राज्य दिलाने वाला हूँ,

मैं आदिवासी हूँ।

ना मैंने अंग्रेजों की चमचागिरी की,

ना जांलियावाला में अपनों पर गोलियां बरसाने वाला हूँ,

बल्कि संथाल की पहाड़ियों पर मेरे तीरों ने अंग्रेजों के असंख्य बंदूक तोड़े हैं,

मैं तो जन्म से ही स्वतंत्र रहने वाला हूँ,

मैं आदिवासी हूँ।

ना मैं सिर्फ ब्राह्मण,

ना सिर्फ क्षत्रिय,

ना सिर्फ वैश्य,

शूद्र भी नहीं,

मैं एकमात्र ही चारों गुण रखने वाला हूँ,

मैं आदिवासी हूँ।

न मैं जानता पाप-पुण्य,

न होता कर्मकांड का मुझ पर असर,

न मैं जाता स्वर्ग, न जाता नर्क,

मैं तो प्रकृति का पुत्र हूँ,

मैं पूरखा बन जाता हूँ,

मैं आदिवासी हूँ। (एक अज्ञात आदिवासी की रचना)

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