मेरी आत्मग्लानि का प्रेरक दिन

Share Button

किसी ने सच ही कहा है कि कोई उपर न होता-कोई नीचे न होता, अगर कोई मजबूर न होता तो कोई खुदा न होता। कल जनवरी माह का अंतिम दिन मेरे लिये आत्मग्लानि का दिन रहा। हालांकि मेरा हरसंभव प्रयास होता है हरेक चीजों से प्रेरणा लेने की। कल भले ही मेरी आत्मा पर चोट लगी हो, विश्वास चूर-चूर हुआ हो..एक नई दिशा अवश्य दे गई है।

वेशक अब लोग प्रोफेशनल हो गये हैं। इस  प्रोफेशनल युग में आपको विश्वास ढूंढना बहुत मुश्किल है। आंखों के सामने साथ खड़ा या खड़ा होने के दावा करने वाला व्यक्ति कब फरेब कर जाता है, पता नहीं चलता है। जब पता चलता है ,तब समय आगे सरक जाता है और मुझ जैसा निरा मूर्ख काठ के उल्लू बने रहने के अलावे कुछ नहीं कर सकता।

कल मैं रांची सिविल कोर्ट गया था। राज़नामा.कॉम पर प्रकाशित खबर को लेकर एक स्थानीय बिल्डरिया छाप अंग्रेजी अखबार के कर्ता-धर्ता द्वारा पुलिसिया सांठगांठ से मुझ पर किये गये फर्जी मुकद्दमा की तारीख थी। जमानत मिलने के बाद कई तारीखें गुजरने के पश्चात भी वकील साहब  ने मुझे केस में एपीयर नहीं करवा रहे थे। इस मुद्दे पर जब भी मैंने वकील से बात करता तो दो टूक जबाब मिलता कि ” समझ नही रहे हो यार,सब मिलके तुमको सजा करवा देगा। जज भी…..।  केस में एपीयर मत होवो। दो-तीन साल खिंचवा देते हैं। घर पर नोटिश जाये तो रिसिव मत करना। वारंट हो जाने पर खड़े-खड़े वेल करवा दूंगा। कोई चिंता मत करो। सब कुछ हम पर छोड़ दो ।”

वकील साहब के उक्त झंझावातों के कारण  अंततः मुझे महसूस हो गया कि मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, शायद इसीलिये ये अधिवक्ता महोदय टालमटोल कर रहे हैं। ऐसे लोग सिर्फ मालदार लोगों के केस में ही अधिक रुचि लेते हैं। इसमें मैं कर भी क्या भी सकता हूं। उनका अपना जमा जमाया प्रोफेशन है।  

खैर, कल मैंने यह निश्चित कर घर से कोर्ट निकला था कि अपने केस का डिफेंस खुद करुंगा। भारतीय संविधान भी हरेक भारतीय नागरिक को कहीं भी अपना पक्ष रखने का अधिकार प्रदान करता है।   लेकिन दुर्भाग्यवश  माननीय जज साहब के छूट्टी पर होने के कारण मैं खुद को एपीयर नहीं करा सका और अगली तारीख 22मार्च,2013 मिल गई (अब देखना है कि उस दिन क्या होता है)। इस क्रम में मैंने वहां कार्यरत एक कर्मचारी से चार्जशीट की जेरोक्स कॉपी लेनी चाही तो उसने नहीं दिया। जबकि मेरे सामने अन्य कई लोगों को ” कुछ लेकर ” बहुत कुछ दे रहा था। तब मैं समझ गया कि मेरे पत्रकार होने के कारण ये छोटे साहब कायदे-कानून बतिया रहे हैं। फिर मैंने बाहर के “जुगाड़-तंत्र ” से मिला और 200 रुपये दिये । तब उसने चार्जशीट के साथ संलग्न पुलिस डायरी की जेरोक्स कॉपी एक घंटे के भीतर थमा दिया।

उसके बाद मैं सीबीआई की विशेष अदालत भवन चला गया। वहां सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा एवं उनसे जुड़े लोगों का चर्चित मामला चल रहा है। कल इण्डोनेशिया से ईडी द्वारा रांची लाये गये अनिल वस्तावड़े से जुड़ी एक सुनवाई थी। वहां मीडियाकर्मियों की भारी भीड़ थी। उनमें कई लोगों से मिला। कुछ लोगों से कई तरह की बातें भी हूई।  इस तरह कल मेरे सामने अलावे कई क्षण आये, जिसे याद करते ही आत्मग्लानि महसूस कर रहा हूं।

……………………..  मुकेश भारतीय  

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...