मीडिया का यह कौन सा चेहरा है भाय

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गणेश शंकर विद्यार्थी जैसों की आहुति, शहादत क्या इन्हीं दिनों के लिए थी? ऐसा ही समाज रचने के लिए थी? कि काले धन की गोद में बैठ कर अपने सरोकार भूल जाएं? बताइए कि फ़ाइनेंशियल मामलों के दर्जनों चैनल और अखबार हैं। पर कंपनियां देश का कैसे और कितना गुड़-गोबर कर रही हैं है किसी के पास इस का हिसाब या रिपोर्ट? किस लिए छपते हैं यह फ़ाइनेंशियल अखबार और किस लिए चलते हैं यह फ़ाइनेंशियल चैनल? सिर्फ़ कंपनियों का गुड-गुड दिखाने के लिए? गरीब जनता का पैसा कंपनियों के शेयर और म्युचुअल फंड में डुबोने भर के लिए? क्या ये अखबार और चैनल सिर्फ़ चारा हैं इन कंपनियों की तरफ़ से और निवेशक सिर्फ़ फंसने वाली मछली?

बताइए कि सत्यम जैसी कंपनियां रातों-रात डूब जाती हैं दीवालिया हो जाती हैं और इन फ़ाइनेंशियल कहे जाने वाले चैनल और अखबार में इस के पहले एक लाइन की खबर भी नहीं होती? सरकार कुछ नहीं जानती? एयर कंपनियां सरकारी हों या प्राइवेट रोज गोता खा रही हैं, इन अखबारों या चैनलों के पास है कोई रिपोर्ट कि क्यों गोता खा रही हैं? पेट्रोल के करोडों-करोड रुपए बकाया हैं सरकार पर। सरकार के पास है कोई व्हाइट पेपर इस मसले पर? या कोई इस की मांग कर रहा है? तो किस लिए निकल रहे हैं यह अखबार, यह चैनल? समझना बहुत आसान है। पर कोई क्यों नहीं सोचना चाहता?

यह जो एक सेज़ की बीमारी चली है देश में उद्योगपतियों की सेहत को दिन दूना, रात चौगुना बनाने के लिए इस पर कुछ मेधा पाटकर टाइप एक्टिविस्टों को छोड दें तो इस की किसी मीडिया, किसी राजनीतिक दल या सरकार या किसी अदालत को है किसी किसिम की चिंता? नक्सलवादी हिंसा से निपटने में सरकार जितना पैसा खर्च करती है, उस का एक हिस्सा भी जो वहां के विकास पर खर्च कर देती सरकार तो वहां मासूम लोगों की खून की नदियां नहीं बहतीं। लेकिन इस बारे में भी हमारी मीडिया नि:शब्द है। यह और ऐसे तमाम मामलों में मीडिया गांधी के बंदर बन जाती है। न कुछ देखती है, न कुछ सुनती है, न कुछ बोलती है।

हां, इधर एक नए मीडिया का आगमन हुआ है। वेब मीडिया का। जिस की धड़कन में अभी सामाजिक सरोकार की हलकी सी ही सही धड़कन सुनाई देती है। कम से कम दो मामले अभी बिलकुल ताज़े हैं। जिन की लड़ाई लड़ कर इस वेब मीडिया ने फ़तह हासिल की है। वह भी सोशल साइट फ़ेसबुक के ज़रिए। एक अभिषेक मनु सिंघवी के मामले पर और दूसरे, निर्मल बाबा के मामले पर। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने न सिर्फ़ इन मामलों पर गांधी के बंदर की भूमिका निभाई बल्कि निर्मल बाबा को तो चैनलों ने ही पैदा किया। बरास्ता विज्ञापन। जैसे कभी आसाराम बापू और रामदेव या जाने किन-किन बाबाओं को खड़ा किया बरास्ता विज्ञापन। बताइए कि अब विज्ञापन तय कर रहे हैं कि हमारे सेलेब्रेटी कौन होंगे? अखबार और चैनल मालिकों की दलील है कि विज्ञापन ही उन का आक्सीजन हैं। विज्ञापन न हों तो उन का चलना मुश्किल है। यह कुतर्क उन का गले नहीं उतरता। पर उन से अब कोई सरकार या कोई एजेंसी या अदालत यह पूछ्ने वाली नहीं है कि ठीक है अगर विज्ञापन ही इतना ज़रुरी है तो बिना खबर के सिर्फ़ विज्ञापन ही छापें और दिखाएं। औकात मालूम हो जाएगी। हकीकत तो यही है कि लोग अखबार या कोई न्यूज़ चैनल खबर के लिए देखते-पढ़ते हैं, विज्ञापन के लिए नहीं। विज्ञापन भी एक ज़रुरी तत्व है, पर इतना भी ज़रुरी नहीं है कि आप पेड न्यूज़ पर उतर आएं, काले धन की गोद में बैठ जाएं। सरकार के पालतू कुत्ते बन जाएं। यह तो मुर्गी मार कर सोने के अंडे पाने वाली चालाकी हो गई। जो अंतत: मीडिया नाम की कोई चिड़िया भी थी के नाम से इसे इतिहास में दफ़न करने वाली कार्रवाई है। इसे जितनी जल्दी संभव बने सब को मिल कर इस बीमारी से छुट्टी लेनी ही होगी।
वास्तव में यह दौर मज़दूर विरोधी दौर है, लोकतंत्र के नाम पर हिप्पोक्रेसी का दौर है, ट्रेड यूनियन समाप्त हैं, पूंजीपतियों के मनमानेपन की कोई इंतिहा नहीं है। सब को वायस देने वाले पत्रकार अब खुद वायसलेस हैं। बताइए कि इतने सारे हाहाकारी चैनलों और अखबारों के बावजूद घोटालों पर घोटालों की जैसे बरसात है। पर किसी चैनल या अखबार में खबर जब मामला अदालत या सी.बी.आई जैसी किसी एजेंसी के ब्रीफ़िंग के बाद ही आधी-अधूरी सी क्यों आती है? पहले क्यों नहीं आ पाती? सलमान खान की माशूकाओं, उन की मारपीट की सुर्खियां बनाने वाले इस मीडिया जगत में आज भी कोयला घोटाले के बाबत एक भी खोजी खबर क्यों नहीं है?

मुझे याद है कि 1984 में हिंदुस्तान अखबार में बाज़ार भाव के पन्ने पर एक सिंगिल कालम खबर छपी थी सेना में जासूसी को ले कर। खबर दिल्ली के अखबार में छपी थी। पर लारकिंस बंधु की गिरफ़्तारी लखनऊ के लारेंस टैरेस से सुबह सात बजे तक उसी दिन हो गई थी। यह खबर लिखने वाले रिपोर्टर एस.पी. सिंह से इस बारे में जब पूछा गया कि खबर इतनी छोटी सी क्यों लिखी? तो वह तफ़सील में आ गए। और बताया कि पहले तो वह यह खबर लिखने को ही तैयार नहीं थे। पर सेना में उन के एक मित्र ने जब बहुत ज़ोर दिया तब उन्हों ने प्रमाण मांग कर खबर से कतराने की कोशिश की। लेकिन मित्र ने कहा कि चलो प्रमाण देने के लिए मुझे भी देशद्रोह करना पडे़गा, पर एक बडे़ देशद्रोह को रोकने के लिए मैं छोटा देशद्रोह करने को तैयार हूं। मित्र ने उन्हें सारे प्रमाण दे दिए। अब एस.पी. सिंह की आंखें चौधिया गईं। खैर बहुत सोच-समझ कर खबर लिखी। अब समाचार संपादक ने खबर रोक ली। खबर की संवेदनशीलता का तर्क दे कर। पर मित्र के दबाव के चलते वह समाचार संपादक के पीछे पडे़ रहे और बताया कि सारे प्रमाण उन के पास हैं। कोई पंद्रह-बीस दिन तक यह खबर इधर-उधर होती रही। और अंतत: कट-पिट कर वह खबर बाज़ार भाव के पन्ने पर उपेक्षित ढंग से एक पैरा ही छप पाई। पर यह एक पैरे की खबर भी आग लगा गई। और बड़े-बड़े लोग इस में झुलस गए। इंदिरा गांधी के बहुत करीबी रहे मुहम्मद युनूस तक लपेटे में आ गए। और उन्हें कोई राहत अंतत: मिली नहीं।

एस.पी.सिंह को इस का मलाल तो था कि खबर देर से, गलत जगह और बहुत छोटी छपी। पर वह इस बात से भी गदगद थे कि उन की खबर पर समाचार संपादक ने विश्वास किया और कि देश एक बडे़ खतरे से बच गया। मित्र की लाज भी रह गई। अब न एस.पी. सिंह जैसे रिपोर्टर हैं न वैसे अखबार। नहीं इसी हिंदुस्तान टाइम्स में जब खुशवंत सिंह संपादक बन कर आए तो के.के बिरला के साथ पहली मीटिंग में उन्हों ने कुछ मनपसंद लोगों को रखने और कुछ फ़ालतू लोगों को हटाने की बात कही। तो के.के. बिरला ने खुशवंत सिंह से साफ कहा कि रखने को आप चाहे जैसे और जितने लोग रख लीजिए पर हटाया एक नहीं जाएगा। यह बात खुशवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा में बड़ी साफगोई से लिखी है। और अब उसी हिंदुस्तान टाइम्स में क्या-क्या नहीं हो रहा है, लोगों को हटाने के लिए? हिंदुस्तान हो या कोई और जगह, हर कहीं अब एक जैसी स्थिति है। हर कहीं विसात ही बदल गई है। सरोकार ही सूख गए हैं।

एक समय मीडिया को वाच डाग कहा जाता था, अब यह वाच डाग कहां है? क्या सिर्फ़ डाग बन कर ही नहीं रह गया है? इस वाच डाग को आखिर डाग में तब्दील किया किस ने? आखिर डाग बनाया किस ने? स्पष्ट है कि संपादक नाम के प्राणी ने। मालिकों के आगे दुम हिलाने के क्रम में इतना पतन हो गया इस प्राणी का कि अब संपादक नाम की संस्था ही समाप्त हो गई। बताइए कि इंडियन एक्सप्रेस जैसा अखबार एक बे सिर पांव की खबर छाप देता है कि जनरल वी के सिंह दिल्ली पर कब्ज़ा करना चाहते थे और यह सारे चैनल बुद्धि-विवेक ताक पर रख कर दिन भर सेना की गश्त दिखा कर पूरे देश में पेनिक क्रिएट कर देते हैं। पर नीरा राडिया का टेप नहीं दिखा या सुना पाते! उत्तर प्रदेश जैसे कई और प्रदेशों में एनआरएचएम घोटाले के तहत करोड़ों की दवा खरीद कागज़ पर हो जाती है, आपरेशन थिएटर कागज़ पर ही बन जाते हैं, भुगतान हो जाता है, हत्याएं हो जाती हैं, पर इस बारे में कहीं कोई खबर पहले नहीं मिलती। मिलती है, जब सीबीआई या अदालत कुछ बताती या किसी को जेल भेजती है। यह क्या है?

तो जब आप देश की खबरों को, सरोकार की खबरों को व्यवस्था विरोध के खाने में डाल कर व्यवस्था के आगे दुम हिलाएंगे तो कोई एक एक्का-दुक्का खड़ा होगा इस के प्रतिरोध में और कि वह जो आप की तरह दुम नहीं हिलाएगा तो आप उस का गला दबा देंगे? हो तो यही गया है आज की तारीख में। पिछले दस-बारह वर्षों में जो भूत-प्रेत और कुत्तों-बिल्लियों, अंध विश्‍वास और अपराध की बेवकूफ़ी की खबरों से, दलाली की खबरों से समाज को जिस तरह बरगलाया गया है, जिस तरह समाज की प्राथमिकताओं को नष्ट किया गया है, खोखला किया गया है वह हैरतंगेज़ है। यकीन मानिए कि अगर मीडिया इस कदर भड़ुआ और दलाल न हुई होती तो इस कदर मंहगाई और भ्रष्टाचार से कराह नहीं रहा होता यह देश। राजनीतिक पार्टियां इतना पतित नहीं हुई होतीं। मीडिया के बदचलन होने से इस देश के अगुआ और उन का समाज बदचलनी की डगर पर चल पड़ा। जनता कीड़ा-मकोड़ा बन कर यह सब देखने और भुगतने के लिए अभिशप्त हो गई। अब बताइए कि एक औसत सी फ़िल्म आती है और मीडिया को पैसे खिला कर महान फ़िल्म बन जाती है। ऐसा इंद्रधनुष रच दिया जाता है गोया इस से अच्छी फ़िल्म न हुई, न होगी। अब लगभग हर महीने किसी न किसी फ़िल्म को यह तमगा मिल ही जाता है। विज्ञापनों का ऐसा कालाबाज़ार पहले मैं ने नहीं देखा।    …...दयानंद पाण्डेय

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