मशहूर सिने-टीवी लेखक धनंजय कुमार की ‘नीरज प्रताड़ना’ पर दो टूकः आत्ममुग्ध नीतीश बाबू के सुशासन में पुलिस-नौकरशाह दोनों अराजक

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नालंदा जिले के मूलतः बिन्द  निवासी एवं वर्तमान में मुबंई फिल्म नगरी के जाने-माने सिने-टीवी लेखक धनंजय कुमार ने राजनामा.कॉम पर रिपोर्टर नीरज संबंधित खबर का लिंक शेयर करते हुए बिहार के सीएम नीतीश कुमार को आयना दिखाया है। उन्होंने दो टूक लिखा कि कि खुद को चाणक्य कहला धन्य होने वाले नीतीश बाबू को ज़रूर पता होगा कि चाणक्य का ही कथन है प्रशंसा विष के सामान है, इसे न्यूनतम मात्रा में ही ग्रहण करना चाहिए…..”

उन्होंने लिखा है कि कोई पत्रकार हो या आम आदमी किसी को भी इस तरह परेशान करना और गिरफ्तार करना मानवीय सम्मान और न्याय के खिलाफ है!

नेता जिस तरह पुलिस और नौकरशाही का हुकुम का पालन करवाने और घूस वसूलने के लिए करते हैं, इससे लाजिम है कि पुलिस और नौकरशाह दोनों अराजक हो जाएँ।

ये दुखद है कि हमारे लोकतंत्र में आम जनता महज शिकार है। बाड़े में बंद बकरे की तरह है, कभी भी उसकी बलि ली जा सकती है।

बिहार में नीतीश कुमार का सुशासन उससे अलग नहीं है। पूरा अमला नीतीश बाबू की हाँ में हाँ मिलाने में लगा है। नीतीश बाबू खुश है कि शासन मस्त चल रहा है!

हालांकि उन्हें पता तो चलता होगा कि उनकी दारुबंदी फ्लॉप है, जिन अफसरों और पुलिस वालों के भरोसे लागू करवाने का ढोल पीटा था, वही सब लोग इसके नाम पर उगाही का धंधा ज़ोरों पर कर रहे हैं !

तमाम पारदर्शिता और समय की पाबंदी डालने के बावजूद ब्लॉक और थाना आम आदमी को दुहने का कार्यालय बना हुआ है। चपरासी से लेकर अधिकारी तक निर्भय हैं और आम आदमी बेदम, गाली खाने, दुरदुराने जाने, टहलाये जाने और रिश्वत देने को मजबूर है।

पत्रकार सरकार और आम आदमी के बीच वो कड़ी है, जो सरकार को आगाह कराता रहता है कि वास्तविक हालात क्या हैं राज्य और राज काज के।

लेकिन विडम्बना की बात है कि लगभग अखबार और चैनल लूट और चमचागिरी में शामिल हो गए हैं। नीतीश बाबू को भी प्रशंसा ही पसंद है।

खुद को चाणक्य कहला धन्य होने वाले नीतीश बाबू को ज़रूर पता होगा कि चाणक्य का ही कथन है प्रशंसा विष के सामान है, इसे न्यूनतम मात्रा में ही ग्रहण करना चाहिए।

लेकिन वास्तविकता अलग है। नीतीश बाबू आत्ममुग्ध हैं। गुणा भाग और कमजोर एवं बदनाम विपक्ष की वजह से नीतीश बाबू की जीत ज़रूर चुनावों में हो जाती है, लेकिन सच यही है कि नीतीश बाबू अपना तेज खो चुके हैं !

सत्ता के पहले भाग में उनका वो तेज़ दिखा भी था, लेकिन धीरे धीरे वह पालकी पर जा बैठे। जहां कहार ले जा रहे हैं नीतीश बाबू जा रहे हैं। नीतीश बाबू तो अब इस बात से भी अनजान हैं कि उनके आस्तीन में अब रत्न नहीं सांप छुपे बैठे हैं।

बिहार में बुखार की वजह से बच्चों की मौत, खेती किसानी से लेकर पानी तक के लिए हाहाकार। ब्लॉक और थानों का फिरौती घर में तब्दील हो जाना, ये सब उनकी असफलता है।

नीतीश बाबू के गृह जिला का होने के बावजूद मेरी उनकी कोई पहचान नहीं है, ना ही फेसबुक पर या किसी अन्य सोशल मीडिया पर मेरा उनसे संवाद है, लेकिन उनके कुछ कुछ करीबी नेता और पत्रकार मेरे फेसबुक मित्र हैं, मैंने उनसे निवेदन करूंगा, कुछ नहीं तो नीरज नाम के इस पत्रकार को न्याय दिलाने में मदद करें।

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