बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम चले….

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“कहते हैं न कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होता, लेकिन उसकी अदालत में हिसाब सबको देना पड़ता है। सरायकेला एसपी चंदन कुमार सिन्हा के मामले में भी ऐसा ही कुछ घटना विगत डेढ़ महीने के भीतर हुआ है….”

सरायकेला-खरसावां से हटाए गए एसपी चंदन सिन्हा…

राजनामा.कॉम (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क)। पिछले डेढ़ महीने से जिस तरह से नक्सलियों ने जिले में तांडव मचाया वह तो एक बहाना था। असल में एसपी को इसी कलंक के साथ जिला से विदा होना था। क्योंकि इन्होंने अंधे कानून और पद का जिस तरह से दुरुपयोग करते हुए पत्रकार वीरेंद्र मंडल और उसके पिता राम पद मंडल के साथ उसके पूरे परिवार पर अत्याचार किया या करवाया था, उसे पूरे झारखंड और बिहार की जनता वाकिफ है।

पूरे घटनाक्रम की पटकथा एक डीएसपी को बचाने के लिए लिखी गई थी। जिसमें डीएसपी स्तर के अधिकारियों ने न्यायलय तक को गुमराह किया है। वैसे न्याय के मंदिर से भी इंसाफ होगा भले देर हो रही है मगर इंसाफ मिलेगा। वीरेंद्र की बूढ़ी मां और मासूम बच्चों का हाय लिया है पूरे घटनाक्रम के नायकों ने। वैसे ऊपरवाले के इंसाफ का सिलसिला शुरू हो चुकी है।

घटना का सूत्रधार और झूठी गवाही देनेवाला नरेराम महतो का हुआ अकाल मृत्युः सरायकेला खरसावां जिला के राजनगर थाना क्षेत्र का बनकाटी गांव तो आपको याद होगा ही… जहां एक आंचलिक पत्रकार वीरेंद्र मंडल और उसके पिता रामपद मंडल को मुखिया सावित्री मुर्मू ने एक झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भिजवाया था। हालांकि बेगुनाह पत्रकार को निर्दोष बताते हुए पूरा गांव उठ खड़ा हुआ था। यहां तक कि उसकी बूढ़ी मां ने जिले के तमाम वरीय पदाधिकारियों के दर पर निर्दोष बेटे और पति के लिए न्याय की फरियाद लगाई थी।

पत्रकार वीरेंद्र मंडल…………

यहां तक कि पत्रकार की बढ़ी मां ने जमशेदपुर स्थित मुख्यमंत्री कैम्प कार्यालय में भी न्याय की गुहार लगाई थी। हालांकि मुख्यमंत्री कैम्प कार्यालय की ओर से मामले में संज्ञान भी लिया गया था और कोल्हान डीआईजी से मामले की निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई करने को कहा गया था, लेकिन कोल्हान डीआईजी ने मामले में संज्ञान नहीं लिया और सरायकेला- खरसावां पुलिस ने मामले में निर्दोष पत्रकार और उसके पिता को जेल भेज दिया था। 

वैसे पत्रकार और उसके पिता नहीं किए गए अपराध की सजा भुगत कर  जमानत पर  छूट गए।  लेकिन पत्रकार वीरेंद्र मंडल और उसके पिता रामपद मंडल के खिलाफ मामले में झूठी गवाही देने वाले मुखिया प्रतिनिधि  मोमबती महतो के पति नरेराम महतो की की अकाल मृत्यु हो गई। 

पिछले दिनों एक सड़क दुर्घटना में वे बुरी तरह से घायल हो गए थे अस्पताल से छूटकर वे घर भी आ गए थे लेकिन ऊपर वाले को इंसाफ करना ही था एक माह पूर्व उन्हें हर्ट अटैक आया और जमशेदपुर टाटा मुख्य अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। वैसे भले ही अंधा कानून और बहरे लोकतंत्र की वजह से बेगुनाह पत्रकार और उसके पिता ने इंसानों के बनाए  कानून की सजा पाई है।

लेकिन ऊपर वाले के इंसाफ की लड़ाई में कई और प्यादे हैं, जिन्हें वीरेंद्र के बूढ़ी मां और उसके छोटे-छोटे बच्चों के आंसुओं का हिसाब देना बाकी है। हम नरे राम महतो के अकाल मृत्यु पर गहरी संवेदना प्रकट करते हैं, लेकिन यह सीख है उनके लिए जो खुद को भगवान से भी बड़ा मानते हैं। जो इंसान द्वारा बनाए गए कानून का गलत प्रयोग कर किसी बेगुनाह की जिंदगी को तबाह करते हैं।

वैसे आपको यह भी याद दिलाना दूं कि ये वही नरेराम  महतो था, जिसने अपनी नाबालिग भतीजी की शादी राजनगर थाना प्रभारी से मिलकर राजनगर थाना में कराई थी। और इनके सभी गुनाहों में वहां के कुछ स्थानीय पत्रकार भी शामिल रहे हैं। हिसाब तो उन्हें भी देना होगा। इंसाफ उनका भी होगा।

मुखिया को समाज ने किया बहिष्कृतः मुखिया सावित्री मुर्मू आज केवल नाम की मुखिया बनकर रह गई है, उन्हें गांववालों ने समाज से बहिष्कृत कर दिया है। पंचायत भवन में मुखिया के प्रवेश पर रोक लगा दिया है। अपमानित होकर मुखिया सपरिवार जमशेदपुर के सुंदरनगर क्षेत्र में रह रही है। वैसे मुखिया भी अपने गुनाह की आंशिक सजा लगभग 20 दिन टाटा मुख्य अस्पताल में काटकर लौटी है।

ग्राम प्रधान का किडनी फेल्योर हो चुका हैः मुखिया-वीरेंद्र प्रकरण में एक और झूठी गवाही देनेवाला ग्राम प्रधान नीलकंठ महतो का एक किडनी फेल्योर हो चुका है आलम ये है कि वह गवाही देने योग्य ही नहीं बचा। हाल में ही ओडिसा से ईलाज कराकर लौटा है।

आगे और भी कई नायकों को देना है हिसाब, जानिए पूरा घटनाक्रमः  वीरेंद्र मंडल एक साधारण युवक था, एक लूट की घटना में शक के आधार पर तत्कालीन राजनगर थाना प्रभारी विजय प्रकाश सिन्हा ने तत्कालीन डीएसपी हेडक्वार्टर दीपक कुमार के कहने पर उसे घर से उठवाकर चार दिनों तक अलग अलग जगहों पर ले जाकर उल्टा लटकाकर, नंगा कर पिटाई की गई थी।

जब इस युवक ने अपनी संलिप्तता नहीं स्वीकारी तब इसके गुप्तांगों में नमक और मिर्च रगड़ा गया। फिर भी जब इनसे पुलिस के जुल्म के सामने घुटने नहीं टेके और अपना जुर्म स्वीकार नहीं किया तब जाकर पुलिस वीरेंद्र को मरणासन्न अवस्था में उसके घर के बाहर पटककर भाग गई। परिवार वालों ने उसे जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में भर्ती कराया जहां 10 दिनों तक आईसीयू में इलाज कराने के बाद वीरेंद्र मानसिक रूप से

पुलिस के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने का फैसला करते हुए बाहर निकला और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में केस कर दिया। साथ ही हाईकोर्ट में भी याचिका दायर कर दिया। जो डीएसपी दीपक कुमार को नागवार गुजरा हालांकि पत्रकार की पिटाई मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी विजय प्रकाश सिन्हा को निलंबित कर दिया गया था, लेकिन बाद में उनका पदस्थापन एसपी कोठी में हो गया था।

और यहीं से शुरू हुआ वीरेंद्र के कैरियर की तबाही की पटकथा, जिसे साधने में बड़ी ही चतुराई से पुलिस ने स्थानीय पत्रकारों का सहारा लिया और सबकुछ तय स्क्रिप्टिंग के अनुसार किया। वैसे यहां ये भी बताना जरूरी है कि वीरेंद्र को लूटकांड का संदिग्ध बतानेवा कोई और नहीं बल्कि डीएसपी दीपक कुमार का खास माना जानेवाला पत्रकार रासबिहारी मंडल था, जिसने उसे संदिग्ध बताया था।

लेकिन डीएसपी दीपक कुमार रासबिहारी की कूटनीति समझने में चूक कर दिया और इस अपराध को कर बैठे। दरअसल रासबिहारी वीरेंद्र मंडल का रिश्तेदार था और पारिवारिक खुन्नस साधने के लिए पुलिस को उसने गुमराह किया था। जिसे डीएसपी दीपक कुमार समझ नहीं सके। आगे वे खुद को सही साबित करने के लिए गलती पर गलती करते चले गए जिसका धृतराष्ट्र बने एसपी आंख मूंद कर साथ देते चले गए।

यहां तक कि पद के गुरूर में इन्होंने मुख्यमंत्री के सचिव मनिंद्र चौधरी की बात भी नहीं मानी थी, जिसमें उन्होंने अपने लेटर पैड पर मामले की निष्पक्ष जांच करने के बाद ही किसी तरह की कार्रवाई करने की बात कही थी। इस गुरुरी एसपी ने वीरेंद्र के ग्रामीणों की फरियाद को भी नजरअंदाज किया था जिसमें उन्होंने वीरेंद्र मंडल को बेगुनाह बताया था।

कोल्हान डीआईजी ने भी न जाने किसके दबाव में मामले पर जांच नहीं करवाई थी, जबकि स्थानीय जनप्रतिनिधि और पूर्व विधायक अनंत राम टुडू ने डीआईजी से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने के बाद ही किसी प्रकार की कार्रवाई करने की बात कही थी। हालांकि इस पूरे प्रकरण में अभी केसरी गैंग का इंसाफ होना बाकी है, यह पत्रकारों का वह गैंग है, जो पुलिस को गुमराह कर क्षेत्र के भोले भाले लोगों को अपना निशाना बनाता है और उसका भया दोहन करता है।

अगर अब भी जिले के बचे हुए अधिकारियों में मानवता बची हुई है तो मामले में अपनी संलिप्तता और मुखिया प्रकरण में निष्पक्ष जांच करने का काम करे। अन्यथा कानून का हिसाब बाद में होगा, ऊपर वाले का इंसाफ पहले होगा।

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