फेसबुक पर यूं बौखलाए कैमरे की जद में आये ईटीवी (न्यूज18) के सीनियर रिपोर्टर!

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रांची (राजनामा संवाददाता)। सेना कैंटीन की सुविधा ग्रहण करते कैमरे की लेंस में कैद हुये ईटीवी (न्यूज़18) के सिनियर रिपोर्टर मनोज कुमार ने वरिष्ठ पत्रकार द्वारा उठाये गये सबाल पर जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है, वह भी काफी मंथन करने पर बल देती है।

उन्होनें लिखा है कि ………   “” Facebook पर यह मेरा पहला पोस्ट है इसे सफाई ना समझा जाए यह एक संवाद है स्वर्गीय कृष्ण बिहारी मिश्रा जी के साथ। कृष्ण बिहारी मिश्रा जी को स्वर्गीय क्यों लिखा मेरे संवाद को पढ़ने के बाद आप खुद समझ जाएंगे

कृष्ण बिहारी मिश्रा जी आभार……. अफसोस …….. आभार इसलिए कि आपको अर्धसैनिक बलों के हक की चिंता है…. और अफसोस इसके कई कारण हैं ……..

मैं जिस कृष्ण बिहारी मिश्रा पत्रकार को जानता था शायद अब वह इस दुनिया में नहीं रहे क्योंकि मुझे भी पत्रकार KB मिश्रा के साथ काम करने का सौभाग्य (दुर्भाग्य) प्राप्त हुआ था। मैंने भी कभी K B मिश्रा से कई बातें सीखी थी उनमें एक यह भी था कि बतौर पत्रकार जब आप किसी पर आरोप पर कुछ लिखते हैं तो सामने वाले का पक्ष जरूर जानना चाहिए ….. पर इस पोस्ट के पहले या बाद में आपने सामने वाले का पक्ष जानने की कोशिश नहीं की ….. क्योंकि आप के बी मिश्रा ऐसा नहीं है बल्कि के भी मिश्रा के नाम का छद्म इस्तेमाल कर रहे हैं ….

अब अगर आप यह कहेंगे कि आपके पास मेरा नंबर नहीं है तो यह गलत होगा क्योंकि, आप को भी याद होगा डेढ दो माह पहले आप से मेरी फोन पर बात हुई थी रेलवे से जुड़ा एक मसला था और आपने उस खबर को चलाने की पैरवी की थी … एक कथित ईमानदार पत्रकार होने के नाते शायद उस पैरवी के बदले आपने मुझे किसी तरह के रिश्वत नहीं दी होगी …..

मिश्रा जी आपने संस्थान का नाम लिया …. क्या जब मैं वहां था जिस जगह की तस्वीर आपने पोस्ट की है तो क्या मेरे हाथ में संस्थान का बूम … कैमरा, कैमरा मैन या फिर संस्थान की गाड़ी या संस्थान से जुड़ा कोई पहचान था …. जवाब आपके पास नहीं होगा ….क्योंकि आपने तथ्यों को जानने की कोशिश नहीं की है……

मेरा सवाल है क्या एक पत्रकार को अपनी व्यक्तिगत जिंदगी जीने का हक नहीं है ?  क्या साप्ताहिक अवकाश में भी उसके संस्थान का साया पत्रकार के साथ लगा होता है ? क्या पत्रकार अपने घर … रिश्तेदार और किसी परिचित के साथ कहीं आ जा नहीं सकता ? क्योंकि वह एक पत्रकार है या फिर किसी अपने जानने वाले के साथ कहीं घूम नहीं सकता .? …उसकी मदद नहीं कर सकता … ? क्योंकि वह एक पत्रकार है …..

जैसा कि मैंने ऊपर आपके साथ काम करने के अपने सौभाग्य और दुर्भाग्य की बात लिखी है इतने दिन साथ काम करने के बाद भी आप मुझे समझ नहीं पाए …..या… मैं आपको पहचान नहीं पाया …..

आपने अगर मुझे पहचाना होता तो गुंजन सर के समय रांची में हुई मीटिंग में अपनी कथित इमानदारी की पैरवी इस बेईमान पत्रकार ( जो आपकी नजर में ) से हरगिज नहीं करवाते हैं …..मुझे आश्चर्य लगता कि आपके साथ काम करने के लंबे समय के बीच में मेरी कोई शिकायत आप तक कैसे नहीं पहुंची और उससे भी ज्यादा आश्चर्य इस बात की है अगर पहुंची होगी तो आपने उसे अपने ऊपर क्यों नहीं पहुंचाया …..क्या तब मैं इमानदार था और अब बेईमान हो गया हूं …. या फिर आप को भी अपनी बेईमानी का हिस्सा पहुंचाता था जिसकी वजह से आप मेरी शिकायत ऊपर नहीं पहुंचाते थे

मिश्रा जी आपने संस्थान का नाम लिखा है संस्थान बेईमान नहीं होती आप हम बेईमान बनाते हैं जिस संस्थान का आपने नाम लिखा है उसी संस्थान ने आपके और आपके बच्चों को कई शाम की रोटी और नमक भी दिया है ….. मिश्रा जी आपने उस रोटी और नमक का भी ख्याल नहीं रखा ….. अगर रखा होता तो उस संस्थान का नाम नहीं लेते क्योंकि जिस वक्त की कहानी आपने गाड़ी है उस वक्त मेरे हाथ में संस्थान का बूम और कैमरा नहीं था . …..खैर । ””

वेशक, ईटीवी ( न्यूज18) के सीनियर रिपोर्टर मनोज कुमार ने जिस तरह की उटपुटांग प्रतिक्रिया दी है, वह किसी के गले नहीं उतरती। सबाल कौन क्या है और वह क्या करता है, इसकी नहीं है। असल सबाल है मीडिया में नैतिकता-अनैतिकता की। कृष्ण बिहारी मिश्र ने उस पर सबाल उठाये थे। लेकिन मनोज कुमार ने उसके जबाव में भटक गये और ऐसी बातें कह गये, जिससे वे अब कहीं अधिक धंसते दिख रहे हैं।

संस्थान से अच्छी खासी सेलरी पाने वाले मनोज कुमार खुद बेहतर बता सकते हैं कि यदि उन्हें ऐसे तस्वीर मीडिया से अलग किसी बंदे के हाथ लग जाती तो वे अपने चैनल पर बतौर ब्रेकिंग-प्लेट ब्रेकिंग-पैकेज नैतिकता और भ्रष्टाचार की कैसी चिघांड़ मारते?

यह भी सही है कि अगर यह सब उनके कैमरे और बूम-लायजनिंग से बेअसर है तो फिर क्या किसी आम को भी रियायती दरों पर सेना कैंटीन की सामग्री इतनी सहजता से मिल जाती है ?

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