बिहार विधानसभा चुनाव: मोदी के खिलाफ़ रेफ़रेंडम का खतरा

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इस बार बिहार विधानसभा का चुनाव सचमुच बहुत खास है। इसके खास होने का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है। लड़ाई अब सीधे-सीधे देश के पीएम और बिहार के सीएम के बीच हो गयी है।

modi-nitishइस चुनाव की विशेषता यह भी है कि इस बार लगभग सभी तरह की विचारधारा एक साथ प्रासंगिक हो उठे हैं। फ़िर चाहे वह सांप्रदायवाद हो या फ़िर मंडलवाद। दलितवाद भी इस रेस में किसी भी मायने में पीछे नहीं है।

सबसे खास बात यह है कि यदि इस बार के चुनाव में भाजपा गठबंधन की हार हुई तो यह सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ रेफ़रेंडम कही जायेगी। वहीं यदि नीतीश कुमार की हार हुई तो इसकी कई वजहें होंगी। एक वजह एंटी इनकम्बेंसी भी होगी। हालांकि अभी तक से विभिन्न सर्वे रिपोर्टों में नीतीश कुमार के खिलाफ़ एंटी इनकम्बेंसी मुखरित नहीं हुआ है। सीएम बनने की योग्यता रखने वालों में वे सबसे आगे हैं।

इस प्रकार यदि पूरे राजनीतिक परिदृश्य का मूल्यांकन करें तो कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस बार का चुनाव न केवल नीतीश कुमार के लिये महत्वपूर्ण है बल्कि यह नरेंद्र मोदी के लिये भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

वजह यह है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को अरविन्द केजरीवाल के हाथों मिली करारी हार को नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने किरण बेदी के माथे पर मढ दिया था, जिन्हें आखिरी वक्त में भाजपा की ओर से सीएम पद का दावेदार बनाया गया था। लेकिन बिहार चुनाव में भाजपा ने आंख मूंदकर नरेंद्र मोदी के मैजिक में विश्वास किया है।

उसका विश्वास है कि पिछले 17 महीने में मोदी सरकार की उपलब्धियों के कारण जनता उन्हें वोट देगी। यानी यह पहली बार होगा कि बिहार की जनता यह सोचकर भी वोट देगी कि केंद्र की मोदी सरकार ने 17 महीने पहले किये गये वायदों में से कौन से वायदे अबतक पूरे किये। फ़िर चाहे वह वायदा काला धन स्वदेश वापस लाने का हो या फ़िर भ्रष्टाचार और महंगाई दूर करने का। संभवतः यही वजह है कि जदयू-राजद-कांग्रेस ने इन मुद्दों को जनता के बीच ले जाने का प्रयास किया है।

कहना अतिश्योक्ति भी नहीं है कि इनके पास नरेंद्र मोदी सरकार की खामियां गिनाने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है। वजह यह है कि नीतीश कुमार के दस वर्षों के शासनकाल में साढे सात वर्षों की हिस्सेदारी भाजपा की भी रही है। लिहाजा नीतीश कुमार अकेले उन सभी कामों का श्रेय नहीं ले सकते हैं जो बिहार में हुआ है और न ही भाजपा अच्छे कामों का अकेले दावा कर सकती है।

हालांकि भाजपा ने लालू प्रसाद के पन्द्रह वर्षों को नीतीश कुमार के दस वर्षों के साथ जोड़कर हमला करने का प्रयास अवश्य किया है। इस बार के चुनाव की खासियत इसका असली चरित्र है। जातिगत जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग से शुरु हुई यह लड़ाई अब सीधे तौर पर बैकवर्ड बनाम फ़ारवर्ड हो गयी है। 

इसका सीधा लाभ राजद-जदयू-कांग्रेस महागठबंधन को मिलता दिख रहा है। खासकर लालू प्रसाद ने यह मोर्चा खोल रखा है। फ़िर चाहे वह उम्मीदवारों का चयन हो या फ़िर भाषण। लालू कहीं भी अपनी इस लड़ाई को कमजोर नहीं होने दे रहे हैं।

जबकि भाजपा के पास लालू के इस प्रहार से बचने का एकमात्र उपाय धर्म है, जिसका इस्तेमाल वह बखूबी कर रही है। खासकर बीफ़ वाले सवाल को लेकर भाजपा ने हिन्दू वोटरों को साधने का प्रयास किया है।

लेकिन अब नीतीश कुमार ने यह खुलासा कर कि नरेंद्र मोदी के राज में बीफ़ के निर्यात में सोलह फ़ीसदी की वृद्धि हुई है, भाजपा के हाथों से यह मुद्दा भी छीन लिया है। इस मामले में यूपी में भाजपा विधायक संगीत सोम का नाम आने के बाद भी भाजपा असहज हो चुकी है। जबकि दादरी कांड को लेकर पहले से ही विश्व स्तर पर भारत आलोचनाएं झेल रहा है।

बहरहाल यह साफ़ है कि इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव एक साथ कई तस्वीरें करेगा। यदि भाजपा की जीत हुई तो आरक्षण की समीक्षा के संबंध में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान को अमल में लाने की अनुकूल स्थिति बनेगी। वहीं लालू-नीतीश की जीत मंडलराज-2 के उनके दावे को पुख्ता करेगा।

फ़िर इसका पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश में होने वाले चुनाव पर भी पड़ेगा, जो नरेंद्र मोदी के लिये भी महत्वपूर्ण होगा और आरक्षण समर्थकों के लिये भी।

वैसे यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं कि यदि बिहार के जंग में भाजपा की हार होगी तो वह नरेंद्र मोदी की हार होगी और जीत हुई तो नरेंद्र मोदी की। वैसे भी बिहार की राजनीति में “ताली सरदार को तो गाली भी सरदार को” खासा लोकप्रिय है।  

nawal

 ……पटना से वरिष्ठ संपादक-पत्रकार नवल किशोर कुमार का विश्लेषण

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