पद्मश्री बलबीर दत के सम्मान में पहुंचे मात्र तीन पत्रकार !

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रांची (मुकेश भारतीय)।  झारखंड की पत्रकारिता के भीष्म पितामह बलबीत दत्त को पद्मश्री पुरुस्कार से सम्मानित होने के बाद कल 27 फरवरी की शाम 5 बजे एर्नाकुलम से हटिया स्टेशन पहुँचे। इस स्वागत मौके पर झारखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष शाहनवाज़ हसन, प्रदेश सचिव सुरेंद्र सोरेन एवं रांची एक्स्प्रेस के वरिष्ठ पत्रकार संपूर्णानंद भारती जी ही नजर आये। आलावे रांची का अन्य सारे पत्रकार कहां छुपे रहे, कोई नहीं जानता। जबकि पीठे पीछे बलबीर जी के साथ प्रगाढ़ संबंध के प्रायः पत्रकार चहुओर ढिढोंरे पीटते नजर आये हैं और उन्हें पद्मश्री सम्मान मिलते ही सोशल साइट पर पुराने फोटो चस्पा कर खूब वाहबाहियां समेट रहे हैं ताकि, उनकी ईमेज और धंधा दोनो चमके।

कितनी अजीब स्थिति है। झारखंड विधानसभा में जब मुफ्त के सरकारी विभागीय बैग बंटते हैं तो न जाने कहां से पत्रकारों की भिखारियों की तरह भीड़ उमड़ उठती है और जब झारखंड की पत्रकारिता गौरवान्वित हुई तो मात्र तीन पत्रकार लोग ही दिखे।

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि झारखंड की मीडिया में बलबीर दत जी का कोई सानी नहीं है। उन्होंने विपरित परिस्थितियों में भी पत्रकारिता के उसुल और आदर्श बरकरार रखा है। अपनी कर्मठता और ईमानदारी से उन्होंने सैकड़ों पत्रकार भी गढ़े हैं। लेकिन उनके सबकी लुप्तता काफी खलती है। खासकर उस परिस्थिति में जब झारखंड की मीडिया में अब तक किसी लेखक-संपादक-पत्रकार को शायद हीं सम्मानित किया गया हो।

ऐसे बलबीर दत्त जी का गुणगान करने वालों की फेरहिस्त काफी लंबी है। लेकिन कल हटिया स्टेशन जो नजारा दिखा, उन्हें अब अप्रत्यक्ष से अधिक कुछ माना जा सकता। चाहे वह परापंरागत लीक छोड़ सोशल साईट के माध्यम से कितना भी मेरे गुरुदेव, मार्गदर्शक, पूज्यनीय आदि जैसे संबोधनों के साथ खुद पींगे बजायें। सच तो सच ही होता है।

हो सकता है कि इन सब वजहों के लिये पद्मश्री सम्मान से विभूषित बलबीर दत्त जी स्वंय हो, क्योंकि उन्होंने पढ़ो-पढ़ो और लिखो-लिखो की प्रेरणा दी। उन्होंने वर्तमान दौर में घुमो-चाटो और घुमो-चाटो का कुमंत्र देना भूल गये। अगर वे यह देते तो हटिया रेलवे स्टेशन पर कल का माजरा ही कुछ और होता।

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