पत्रकार संतोष ने लिखा- साथियों, आज वीरेंद्र की तो कल तेरी बारी है

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” पत्रकार संतोष कुमार ने अपने फेसबुक वाल पर मीडया-पुलिस गठजोड़ द्वारा पत्रकार वीरेंद्र मंडल को मिली अमानवीय प्रताड़ना को काफी पीड़ा के साथ दो टूक लिखा है…..”

राजनामा.कॉम। जमशेदपुर के पत्रकार संतोष कुमार लिखते हैं…..

“आज वीरेंद्र मंडल और उसके पिता का डिस्ट्रिक कोर्ट ने बेल यह कहते हुए रिजेक्ट कर दिया कि SC/ ST एक्ट के मामले में पीड़ित मुखिया ने बेहद ही संगीन आरोप लगाए हैं। ऐसे में उनके अधिकार क्षेत्र में दोनों पिता-पुत्र को बेल देना संभव नहीं।

आज उन साथियों के लिए जश्न मनाने का दिन है, जिन्होंने बीरेंद्र को फर्जी पत्रकार की संज्ञा देकर उसे झूठे मामले में फंसाकर सलाखों पीछे भेजने में अहम भूमिका निभाई है।

साथियों, भगवान न करें कल कोई और इस तरह के मामले में फसे लेकिन उस वक्त इस बात का जरूर ख्याल रखना कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती।

जिस तरह से बेगुनाह वीरेंद्र को गहरी साजिश के तहत पुलिस ने सलाखों के पीछे भेजा है, ऐसे ही साजिश का शिकार कल कोई और होगा।

आज दुख या तकलीफ झेल कर आप लोग अपने परिवार के बीच सुख चैन से रह रहे हैं, लेकिन जरा सोचिए बीरेंद्र के परिवार पर क्या बीत रहा होगा। कैसे उसके छोटे- छोटे बच्चे रह रहे होंगे ? जबकि घर में एक भी मर्द नहीं है।

क्या बीत रही होगी उस मां पर जिसका बेटा और पति दोनों जेल के काल कोठरी में अपनी रिहाई की आस लगाए बैठा हो। मकर संक्रांति के मौके पर हर घर में खुशियां मनाने की तैयारी चल रही होगी, लेकिन वीरेंद्र के घर मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है।

क्या गलती थी, उसकी जरा सोचिए। 1 साल पहले बगैर किसी गलती के झूठे मामले में पुलिस उसके साथ अमानवीय बर्ताव करती है, उसके विरोध में जब वह लड़ाई छेड़ता है, और उसमें उसकी जीत तय मानी जा रही थी।

इसी बीच पुलिस ने मुखिया और चंद पत्रकारों का सहारा लेकर झूठा मुकदमा दर्ज कराया और उसे सलाखों के पीछे भेज दिया। मुखिया में कहां ताकत था कि उस पर झूठे आरोप सिद्ध कर सके।

आज भी दावे के साथ कह सकता हूं कि मुखिया को इस मामले में मुंह की खानी पड़ेगी। लेकिन जब सरसों में भूत है तो उसमें थोड़ी परेशानी जरूर होगी। लेकिन सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।

मेरे जैसे कुछ लोग और उस गांव के ग्रामीण उसके साथ खड़े हैं ऊपर वाले पर भरोसा है, जीत तो तय है। लेकिन यह भी तय है कि अब वह सभी बेनकाब होंगे जिन्होंने ऐसा घृणित कार्य किया है।

पत्रकारिता में प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए, लेकिन प्रतिस्पर्धा जब प्रतिशोध में बदल जाए तो उस पर गंभीर होना पड़ेगा। आज पाई- पाई जुटाकर उसकी बूढ़ी मां अपने बेटे के लिए वकील का फीस जुटा रही है। पुलिस का क्या गया ?

पत्रकार को क्या मिलता होगा या उसने क्या कमा कर रखा होगा, यह हम और आप बेहतर समझ सकते हैं। आज परिस्थितियां विपरीत हैं, एक कुत्ता भी मुंह चाट कर चला जाए तो कुछ ना कर सके, लेकिन खुद पर भरोसा है, परिस्थितियां अनुकूल होगी।

जिस मामले में सरायकेला के पत्रकार सरायकेला पुलिस प्रशासन के साथ अपने पत्रकार साथी के खिलाफ हुए, आज पूरा सिस्टम चीख- चीख कर साबित कर रहा है कि नाबालिक छात्रा की शादी राजनगर थाना परिसर में ही हुई थी।

जिस वीरेंद्र को अपराधी बताकर पुलिस उसके साथ अमानवीय बर्ताव कर अधमरा कर छोड़ दिया था, क्या वह सही था ? लेकिन वीरेंद्र ने कानूनी लड़ाई छेड़ी और दोषी पुलिस पदाधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

आज के दौर का कोई भी पत्रकार साथी दावे के साथ कह सकता हूं कि या तो ऐसे मामलों में पुलिस प्रशासन के आगे घुटने टेक देगा, या पत्रकारिता छोड़ देगा। लेकिन सेल्यूट करता हूं वीरेंद्र के जज्बे को उसने अकेले पूरे सिस्टम से टकराने की हिमाकत की।

यह अलग बात है कि आज वह अपनों के कारण सलाखों के पीछे है, लेकिन फिर भी दावे के साथ कहता हूं उसकी जीत पक्की है। अपने बारे में सोचिए साथियों। मेरी बातों से आप लोगों को पीड़ा जरूर हुई होगी, लेकिन आज जो दर्द और पीड़ा वीरेंद्र के परिवार का देख कर लौटा हूं, मन व्यथित हो गया। इसलिए आप लोगों के साथ साझा कर रहा हूं।

बुरा मत मानिएगा यही सच्चाई है। इसे स्वीकार करें। जाइये जाकर जरा उस मासूम से पूछिए कि उसके पिता की क्या गलती थी, क्यों आज उसका पिता सलाखों के पीछे है ?

जाइये उस उस पत्नी को पूछिये उसके पति ने क्यों सिस्टम से लड़ने का बीड़ा उठाया ? उस बूढ़ी मां से पूछिए जिसने अपने सामने पुलिस की क्रूरता को देखा, जरा सोचिए कैसे अपने कलेजे पर पत्थर रखकर उस मां ने अपने बेगुनाह पति और बेटे को जेल जाते देखा होगा।

साथियों यह एक ऐसा विवादित जिला है, जहां पुलिस और प्रशासन की लापरवाही के कारण मुख्यमंत्री पर जूता उछाला जाता है। बच्चा चोर की अफवाह फैलाकर निर्दोषों की हत्याएं की जाती है। सब कुछ पुलिस प्रशासन की लापरवाही से होता है।

पुलिस प्रशासन की मिलीभगत से थाने में नाबालिग की शादी कराई जाती है, पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारी मूकदर्शक बनकर अपने अधिकारियों को बचाने का काम करते हैं।

सरकार की नीतियों को यहां के अधिकारी धता बताते हुए अपनी धुन में लगे रहते हैं, और वीरेंद्र जैसे युवक को अपना शिकार बनाते हैं। भगवान ना करे कल वीरेंद्र जेल से निकलने के बाद अपराध का रास्ता अख्तियार कर ले तो उसका जवाब दे कौन देगा।

आज नक्सलवाद के रास्ते पर ग्रामीण क्षेत्र का युवा क्यों जाता है ! इसका जीता जागता उदाहरण वीरेंद्र जैसा युवक हो सकता है। वैसे वीरेंद्र ने अपने ऊपर हुए अत्याचार का लड़ाई खुद लड़ने का बीड़ा उठाया और कानून का सहारा लिया, लेकिन कानून की पेचीदगियों ने उसे इस कदर उलझाया कि आज वह सलाखों के पीछे है।

इसमें सबसे बड़ी भूमिका स्थानीय चाटुकार मीडियाकर्मियों और जिले के कुछ सनकी पुलिस पदाधिकारियों की है। मगर वो शायद ये भूल गए हैं कि “अधिकार दिया जाता है कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए, न कि अपनी मिथ्या सनक पूरा करने के लिए।”

आज वीरेंद्र के समर्थन में पूरा गांव उठ खड़ा हुआ है। ग्रामीणों ने मुखिया के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए मुखिया के गांव में प्रवेश पर रोक लगा दी है। इतना ही नहीं मुखिया फंड से विकास का भी ग्रामीणों ने विरोध कर दिया है।

आगे जैसे-जैसे यह चिंगारी आग का रूप लेगी निश्चित तौर पर हर उस व्यक्ति को जलाकर राख कर देगा। जिसने बेगुनाह पत्रकार को झूठे मामलों के तहत फंसाया है, और जेल भेजने का काम किया है।”

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