पत्रकारिता नहीं, राजनीति रही हरिवंश जी के रग-रग में !

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राजनामा.कॉम (मुकेश भारतीय)।  वेशक किसी के बारे में मन-मस्तिष्क में बने तिलिस्म धीरे-धीरे बिखरता है। कल तक दैनिक प्रभात खबर के जिस प्रधान संपादक की चर्चा करते समय कहा जाता था कि पत्रकारिता उनके नस-नस में है। आज उनके विष्लेशक कह रहे हैं कि उनको पढ़ते रहनेवाले, करीब से जाननेवाले जानते रहे हैं कि राजनीति उनके रग-रग में रही है।

pressजी हां, हम बात कर रहे हैं, राजनीतिक जोड़-तोड़ और शरणम् गच्छामि की नीति के बल जदयू के राज्यसभा सदस्य बने हरिबंश जी की।  हरिबंश जी के बारे में दैनिक प्रभात खबर के ‘नया सफर, आरंभिक अनुभव’ स्तंभ के जरिये निराला ने अतीत का सच उजागर किया है।

हरिबंश जी को करीब से जानने वाले अन्य भी कहते हैं कि हरिबंश जी जी पत्रकारिता में सदैव राजनीति का घालमेल रहा है। सत्ताशीन दलों की परिधि से वे कभी बाहर नहीं निकल पाये।

देश से किसी भी क्षेत्र से चुनाव लड़ना उनके बूते की बात नहीं रही। वे सदैव लहरदार दल की तलाश में रहे लेकिन कहीं भी उनकी इच्छानुरुप दाल नहीं गली। उन्होने कभी अपनी जातीय गोलबंदी के सहारे लालू जी की भी शरण में गए।

भाजपा में भी अपनी गोटी सेट करते रहे लेकिन अंततः कामयाब हुए नीतिश जी की आरती में। उन्हें जदयू से मनोनित कर राज्यसभा में भेज दिया गया। उनके इस मनोनयन में मीडिया और जातीय राजनीति में क्या डील हुई, यह खुद हरिबंश जी ही बता सकते हैं।

बहरहाल, निराला जी ने उनके बारे में जो कुछ लिखा है, उसमें परत दर परत काफी रहस्य छुपे हैं।

वे अपने स्तंभ लिखते हैं कि….   

haribansh_mp_jduपत्रकार हरिवंश को पढ़ते रहनेवाले, करीब से जाननेवाले जानते रहे हैं कि राजनीति उनके रग-रग में रही है।  झारखंड को केंद्र बनाकर और मूलत: पूरे पूर्वी भारत के इलाके को कर्मक्षेत्र का दायरा बनाकर करीब ढाई दशक तक प्रभात खबर के जरिये पत्रकारिता करते हुए उन्होंने यह काम परोक्ष तौर पर लगातार किया है़। सृजन कर्म के जरिये वे वैकल्पिक राजनीति करते रहे हैं।

प्रभात खबर के पहले रविवार और धर्मयुग  जैसी पत्रिकाओं में पत्रकारिता करते हुए भी उन्होंने राजनीति को केंद्र में रखा, उस पर सबसे ज्यादा लिखा़। राजनीति के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व व्यावहारिक पक्ष पर. सिर्फ लिखा भर नहीं, वैकल्पिक तरीके से राजनीतिक हस्तक्षेप करते भी रहे हैं।

90 के दशक के आरंभिक समय में ही उन्होंने प्रभात खबर अखबार के जरिये आर्थिक रूप से कमजोर बिहार की स्थिति को केंद्र के सामने रखने के लिए दिल्ली में दस्तक दी थी़. एक आयोजन के जरिये। चित्र प्रदर्शनी और फिल्म के जरिये। यह महज पत्रकारिता भर नहीं था, पत्रकारिता का सरोकारी पक्ष था, जिसके जरिये राजनीतिक हस्तक्षेप की कोशिश हरिवंशजी ने की थी़। 

बाद में कई ऐसे अवसर आये, जब वे वैकल्पिक राजनीति के बनते रास्ते में अपनी भूमिका निभाते रहे और राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावनाओं की तलाश कर दस्तक भी देते रहे।

वह बाबा आम्टे के साथ की यात्रा हो, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी के साथ यात्रा हो या फिर झारखंड के सुदूरवर्ती गांवों, जंगल में बसे एकांत इलाके में भी जाकर लोगों को बताते-समझाते रहने की बात हो कि यह लोकतंत्र ही दुनिया में सबसे बेहतर विकल्प है और राजनीति ही है, जो चीजों को बदल सकती है़।

हरिवंशजी का राजनीति से इस तरह का रिश्ता कई वजहों से रहा है। जिसमें एक मजबूत वजह शायद सिताबदियारा जैसे गांव में जनमने और बचपन से लेकर किशोरावस्था तक वहीं गुजारना भी है। वही सिताबदियारा, जहां जेपी का जन्म हुआ था और जो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की कर्मस्थली रहा है़,  अब वही पत्रकार हरिवंश खुद राजनेता भी हैं। राज्यसभा के  सांसद। 

बिहार में सत्तारूढ़ पार्टी जदयू की ओर से राज्यसभा गये हैं। लेकिन वैसे वाले सांसद नहीं, जिनके चलने के पहले जिले से लेकर कस्बे तक में सूचना रहती है, अमला से लेकर माला तक का मुकम्मल इंतजाम रहता है और चमचमाती हुई गाड़ियों का काफिला उम्मीदों-आकांक्षाओं को रौंदते हुए रोज निकलता रहता है।

वे राजनीति में जाकर राजनीति सीखने की कोशिश में लगे हुए हैं। संसद के हर सत्र में जाकर सीखने की कोशिश में हैं।  फिर वहां से लौटने के बाद ग्रासरूट पत्रकार की तरह आमलोगों के बीच, सामान्य तरीके से जाकर नब्ज समझने की कोशिश कर के। एक जिद की तरह कि कोई सांसद विशिष्ट बनने की बजाय आम आदमी की तरह ही क्यों नहीं रह सकता! इस जिद को पूरा करने के लिए सांसद बन जाने के बाद के दिखावे की परंपराओं के निर्वहन और तमाम दबावों को झेलते हुए खुद से लड़ रहे हैं। 

इस लड़ाई में वे जीत जायेंगे या कि हार जायेंगे, अभी कहना मुश्किल है. वे सांसदी फंड को लेकर भी अपने तरीके का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन सबकुछ चुपचाप। बिना किसी शोर के। हरिवंशजी संसद के अनुभवों को बार-बार साझा करते हैं।  राजनीति से निकली हुई चीजें स्थितियां बदलेंगी-राजनीति अब कोई बदलाव नहीं कर सकती जैसी बातों का कोलाज बनता है, उनकी बातों से। उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच, आशा और निराशा का भंवरजाल जैसा बनता है।

उनकी बातों से लेकिन खुद से ही जूझने के बाद आखिरी अंतर्द्वंद्व को खारिज करते हुए, खुद को विजयी करार देते हुए, निष्कर्ष भी सुनाते रहते हैं कि चीजें बदलेंगी, हालात बदलेंगे, स्थितियों  में बदलाव होगा और यह सब राजनीति से ही होगा। धीरे-धीरे ही सही, दूसरे रास्ते से ही सही़  इतने किस्म की बतकही और राजनीतिक अनुभव को सुनने के बाद कई बार आग्रह किया उनसे कि वे सक्रिय राजनीति में भूमिका निभाने की जो आरंभिक प्रक्रिया है, जो आरंभिक अनुभव है और उससे जो राय बनी है, उसे सार्वजनिक तौर पर साझा करें। लेकिन कल-परसों पर वे टालते रहे़।

दरसअल संकोच और दुविधा का आवरण इतना रहा कि कभी-हां-कभी ना करते रहे. उन्हें लगता कि जिस अखबार में काम करते हैं, उसमें क्या अपने अनुभव को लिखें?  वह खुद को ज्ञानी मान उपदेश देने जैसा हो जाएगा और अभी राजनीति के विद्यार्थी युग में ही उपदेशक व मार्गदर्शक की भूमिका निभाने लायक नहीं हैं।

वे ऐसे ही कई तर्क देते रहे. तथ्यों से भरे तर्क को काटना आसान भी नहीं था. लेकिन वे बातों को साझा करते रहे,  फुटकर तौर पर. बिखरे हुए रूपों में। अलग-अलग जगहों पर सफर के दौरान उनसे हुई बतकही का ही लिखे रूप में संक्षिप्त और संपादित अंश यहां प्रस्तुत है़ इस लिखे का कुछ हिस्सा अलग-अलग माध्यमों से अलग-अलग रूप में सार्वजनिक तौर पर साझा हो चुका है़, कुछ हिस्सा तहलका पत्रिका में तो कुछ जानकीपुल जैसे हिंदी के चर्चित वेबसाइट में जो हरिवंश जी को लगातार पढ़ते रहे हैं और उनके नियमित पाठक रहे हैं। बहुत हद तक संभव है, उन्हें इस लेख में वह प्रवाह न मिले लेकिन ताजगी और सरोकारी पक्ष की झलक मिलने की गुंजाइश है़।

आज राजनीति किस रास्ते पर है और संसद भवन, जिसे लोकतंत्र का लैंप हाउस कहते हैं और नीतियों के जरिये नियति तय करने का स्थल भी मानते हैं, वहां क्या हाल हैं, उसे बहुत ही सहजता से और बिना किसी अगर-मगर के बताने की कोशिश है, इस आलेख में।

यह एक पत्रकार के नया सफर पर निकलने का शुरुआती अनुभव भर है, बतकही में हुई फुटकर बातों का सहेजीकरण है, सौंदर्यबोध और शब्दों के साज-सज्जा से भरे संस्मरणों का दस्तावेज नहीं। ………निराला

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