पत्रकारिता के जरिए पहाड़ ढाहने का दंभ भरने वाले भाइयों के लिए -1

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mediaअक्सर जब हम कुछ शुद्धात्म पत्रकारों (ये वे पत्रकार हैं जिन्होंने अपनी सार्थक भूमिका तलाशने की खूब कोशिशें की हैं) के साथ मीडिया पर गंभीर चर्चा पर आगे बढ़ते हैं तो वे बेहद संजीदगी से उस चर्चा पर यह कहकर विराम लगा देते हैं कि यार, बस अब मीडिया के मूल चरित्र पर कोई बात मत करो!! गुस्सा आता है। यह प्रतिक्रिया अनायास ही नहीं होती है।

वे पत्रकार साथी बड़े ही सजग होते हैं कि जब भी कोई ऐसी चर्चा होंगी तो वे उसे रोक देंगे। उनका मंतव्य दूषित नहीं है, उनके भीतर एक किस्म की उदासी आ गई है, वे उस उदासी को उधेड़ना नहीं चाहते हैं, उस पर परतें डाल देन चाहते हैं। अब अखबार संजीदा और गंभीर नहीं होते हैं, वे बड़े होते हैं और बड़े होने का पैमाना बेहद बेतरतीब है- प्रतियों और पाठकों की संख्या, न कि उसका संजीदापन, गंभीरता और प्रभावोत्पादकता। हम उस मीडिया से क्या अपेक्षा रख सकते हैं जिसकी मूल मान्यता आज यह है कि पाठकों के पास अब समय नहीं है।

अखबारी संस्थानों के भीतर अखबार बेचने ( जिसे मार्केटिंग और प्रसार कहा जाता है) वाले विभाग ज्यादातर संपादकों की क्लास लेते हैं और बताते हैं कि मार्केटिंग अध्ययनों के अनुसार अब पाठक ढाई या साढ़े तीन मिनट में अखबार पढ़ने का दायित्व पूरा कर लेना चाहते हैं इसलिये आप भी अपना दायरा उन्हीं साढ़े तीन मिनटों तक सीमित रखें। कुल मिलाकर बात यह होती है कि लोग अखबार देखें, न कि उसे पढ़ें। ऐसा चलन अब चल पड़ा है। विचारों को खत्म कर देने की एक सुनियोजित प्रक्रिया चल रही है।

जब अखबार में काम करने वाला संजीदा पत्रकार एक माह तक किसी गंभीर विषय पर शोध करके, अपनी खबर तैयार करके संपादक को सौंपता है तो उसे बताया जाता है कि आपकी खबर ढाई सौ शब्दों से ज्यादा न हो…खोजपरक खबर के लिये ढाई सौ शब्दों का स्थान! कितने पत्रकार जिन्दा रह पायेंगे इस वातावरण में। पत्रकार आता है अपनी खबर जमा करके आश्वासन पाता है कि अगले दिन के अखबार में उसे बेहतरीन जगह मिलेगी। रात उम्मीदों के सहारे खुशगवार गुजरती है, किन्तु सुबह पूरी दुनिया सूनी हो जाती है और लगता है कि खून का बहाव रुक गया है। बाद में पता चलता है कि विज्ञापन आ गया था, कोई दूसरी खबर आ गई थी या फिर प्रतिस्पर्धा की चैसर में कोई दूसरा अपनी चाल चल गया।

अब तो जनमाध्यमों के भीतर भी हिंसक प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई और यहां तलवारें नहीं बल्कि खबरों पर डीलिट (गायब) बटन से वार किया जाता है। कहीं खून भी नहीं दिखता और दुश्मन लहुलूहान हो जाता है। लोग निराश होते हैं और फिर एक नई कोशिश में जुट जाते हैं परन्तु इस गुत्थी को नही सुलझा पाते हैं कि विज्ञापन के कारण हमेशा खबरें अपना रूप, रंग, आकार और अस्तित्व खोती रही है। कभी भी खबर के कारण विज्ञापनों के सामने बैरिकेट्स लगे क्या? शायद नहीं।

इसका मतलब यह है कि आज खबरों के अपने आप में कोई मायने नहीं हैं। खबरों को केवल विज्ञापन के बदले में बिकने वाली सामग्री माना जाना चाहिये। अब हर रोज जन माध्यमों की मंडी में दुकानें इस खोज के साथ खुलती है कि क्या बिकेगा? ऐसी खबर कौन सी होगी जिसके साथ कोई न कोई प्रायोजक नहीं जुड़ा होगा। इतना ही नहीं अब तो संवेदनाओं का भी व्यापार होता है और एमएमएस के जरिये फायदा कमाया जा रहा है…. 

 rakesh_pra

……. National Union of Journalists (india) से जु़ड़े पत्रकार राकेश प्रवीर अपने फेसबुक वाल पर 

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