पता नहीं कब हम अर्थ और व्यर्थ का अर्थ समझ पायेंगे!

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आज प्रेमचंद जीवित होते, तो देशद्रोही कहलाते। सोशल मीडिया पर ट्रोल होते और माँ बहन की ऐसी ऐसी गालियाँ खाते कि अपनी रचनाशीलता को कमतर मान लेते….”

प्रसिद्ध सिने-टीवी लेखक धनंजय कुमार अपने फेसबुक वाल पर…

कल खबर पढ़ रहा था, उनके गाँव के घर की बत्ती गुल कर दी है बिजली विभाग ने। बिल नहीं भरा होगा। नियति देखिये, जीवित थे तब भी रोजमर्रा की चीज़ें आसानी से जुटा नहीं पाते थे, सो मरने के बाद बिजली का बिल कैसे और कहाँ से भरते ?

31 जुलाई 1880 को जन्म हुआ था और 8 अक्टूबर 1936 को, लगभग 56 साल की आयु में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। जीवन सदा अभाव और कष्टों में बीता।

लेकिन लेखक के तौर पर अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी से कभी नहीं डिगे। बावजूद इसके ना जीवन में आर्थिक बदहाली से उबर पाए और ना मरने के बाद।

लेखकों को मृत्यु के 60 साल बाद तक अपनी किताबों पर रॉयल्टी पाने का अधिकार मिला है भारतीय कॉपीराइट क़ानून से, लेकिन अब तो उस रॉयल्टी का भी आसरा नहीं है, कि बिजली बिल भर पाते।

हमारे देश में ज़िम्मेदार और ईमानदार लोगों की यही नियति है। कुछ दिनों पहले बीजेपी के एक विधायक ने यूं ही नहीं कहा था, ” गृहमंत्री होता तो बुद्धिजीवियों को गोली मरवा देता।” जिनको अंग्रेज नहीं मार सके, उनको देश के आज के नेता मार देते।

प्रेमचंद साहब, आपके लेखन पर पीएचडी कर पता नहीं कितने लोग प्रोफ़ेसर बन गए होंगे। कई नेता और मंत्री भी बने होंगे, लेकिन आपके घर की बिजली काट दी गयी। इस पर किसी को शर्म नहीं आई! आपको ज़रूर आई होगी, लेकिन आपके शर्मिन्दा होने से किसको फर्क पड़ता है !

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