नोटबंदी के पीछे की असलियत अब आ रही है सामने

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महेंद्र मिश्र

अक्टूबर 2013 और नवम्बर 2014 में क्रमशः सहारा और आदित्य बिड़ला के ठिकानों पर इनकम टैक्स के छापे पड़े थे। यहां से आयकर अधिकारियों को दो महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले थे। जिनमें सरकारी पदों पर बैठे कई लोगों को पैसे देने का जिक्र था। इसमें प्रधानमंत्री मोदी का नाम भी शामिल था। बिड़ला के यहां से जब्त दस्तावेज में सीएम गुजरात के नाम के आगे 25 करोड़ रुपये लिखा था। इसमें 12 करोड़ दे दिया गया था। बाकी पैसे देने थे। इसी तरह से सहारा के ठिकानों से हासिल दस्तावेजों में लेनदारों की फेहरिस्त लम्बी थी। जिसमें सीएम एमपी, सीएम छत्तीसगढ़, सीएम दिल्ली और बीजेपी नेता सायना एनसी के अलावा मोदी जी का भी नाम शामिल था।

मोदी जी को 30 अक्टूबर 2013 से 21 फ़रवरी 2014 के बीच 10 बार में 40.10 करोड़ रुपये की पेमेंट की गई थी। खास बात यह है कि तब तक मोदी जी बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके थे। सहारा डायरी की पेज संख्या 89 पर लिखा गया था कि ‘मोदी’ जी को ‘जायसवाल जी’ के जरिये अहमदाबाद में 8 पेमेंट किए गए। डायरी की पेज संख्या 90 पर भी इसी तरह के पेमेंट के बारे में लिखा गया है। बस अंतर केवल इतना है कि वहां ‘मोदी जी’ की जगह ‘गुजरात सीएम’ लिख दिया गया है। जबकि देने वाला शख्स जायसवाल ही है।

मामला तब एकाएक नाटकीय मोड़ ले लिया जब इसकी जांच करने वाले के बी चौधरी को अचानक सीवीसी यानी सेंट्रल विजिलेंस कमीशन का चेयरमैन बना दिया गया। प्रशांत भूषण ने उनकी नियुक्ति को अदालत में चुनौती दी है। इस बीच इस साल 25 अक्टूबर को भूषण ने सीवीसी समेत ब्लैक मनी की जांच करने वाली एसआईटी को सहारा मामले का अपडेट जानने के लिए पत्र लिखा।

ख़ास बात यह है कि उसी के दो दिन बाद यानी 27 अक्टूबर को दैनिक जागरण में 2000 के नोटों के छपने की खबर आयी। बताया जाता है कि के बी चौधरी ने वित्तमंत्री जेटली को इसके बारे में अलर्ट कर दिया था। उसके बाद सहारा ने इनकम टैक्स विभाग के सेटलमेंट कमीशन में अर्जी देकर मामले के एकमुश्त निपटान की अपील की।

जानकारों का मानना है कि कोई भी शख्स इसके जरिये जीवन में एक बार अपने इनकम टैक्स के मामले को हल कर सकता है। और यहां लिए गए फैसले को अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकती है। साथ ही इससे जुड़े अपने दस्तावेज भी उसे मिल सकते हैं। जिसे वह नष्ट कर सकता है। अदालत या किसी दूसरी जगह जाने पर यह लाभ नहीं मिलता। चूंकि मामला पीएम से जुड़ा था इसलिए सहारा इसको प्राथमिकता के आधार पर ले रहा था।

बताया जाता है कि सेटलमेंट कमीशन में भी मामला आखिरी दौर में था। भूषण ने 8 नवम्बर को फिर कमीशन को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने मामले का अपडेट पूछा था। शायद पीएम को आने वाले खतरे की आशंका हो गई थी। इसमें उनके ऊपर सीधे-सीधे 2 मामलों में पैसे लेने के दस्तावेजी सबूत थे। उनके बाहर आने का मतलब था पूरी साख पर बट्टा। मामले का खुलासा हो उससे पहले ही उन्होंने ऐसा कोई कदम उठाने के बारे में सोचा जिसकी आंधी में यह सब कुछ उड़ जाए। नोटबंदी का फैसला उसी का नतीजा था।

इसे अगले साल जनवरी-फ़रवरी तक किया जाना था। लेकिन उससे पहले ही कर दिया गया। यही वजह है कि सब कुछ आनन-फानन में किया गया। न कोई तैयारी हुई और न ही उसका मौका मिला। यह भले ही 6 महीने पहले कहा जा रहा हो लेकिन ऐसा लगता है उर्जित पटेल के गवर्नर बनने के बाद ही हुआ है क्योंकि नोटों पर हस्ताक्षर उन्हीं के हैं। छपाई से लेकर उसकी गुणवत्ता में कमी पूरी जल्दबाजी की तरफ इशारा कर रही है। यह बात सही है कि मोदी जी तात्कालिक तौर पर इस मामले को डाइवर्ट करने में कामयाब रहे हैं। लेकिन यह कितने दिनों तक रह पाएगा उसके बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है।

…..लेखकः  महेन्द्र मिश्रा कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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