नीतीश सरकार ने क्यों की अमीरदास आयोग को भंग

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बिहार में तरह-तरह के नरसंहार हुए हैं. यह सूबा जातीय हिंसा की आग में वर्षों इस कदर जलता रहा है कि लंबा अरसा गुजर जाने के बाद भी उसके जख्म नासूर बने हुए हैं. जरा सा छेड़ने पर ही वे फिर से रिसने लगते हैं.

बीती नौ अक्टूबर को फिर से एक नरसंहार के जख्म हरे हो गए. इस रोज पटना उच्च न्यायालय ने लक्ष्मणपुर बाथे में हुए नरसंहार पर फैसला सुनाया. एक दिसंबर, 1997 को जहानाबाद के इस गांव में हुए नरसंहार में 58 लोग मारे गए थे. सभी दलित थे. मरने वालों में 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी थे.

bathe_india_todayअदालत ने इस मामले में उन 26 आरोपितों को बरी कर दिया जिन्हें निचली अदालत ने सजा सुनाई थी. इनमें से 16 को फांसी और दस को आजीवन कारावास की सजा मिली थी. उच्च न्यायालय की संयुक्त पीठ के न्यायाधीश वीएन सिन्हा और एके लाल की खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए गवाह और साक्ष्य विश्वसनीय नहीं हैं इसलिए सभी दोषियों को संदेह का लाभ देते हुए रिहा किया जाता है.

सात अप्रैल, 2010 को जिस हत्याकांड का फैसला सुनाते हुए अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायाधीश ने समाज के चरित्र पर धब्बा और दुर्लभतम हत्याकांड बताया था, उसी हत्याकांड के मामले में उच्च न्यायालय पहुंचते-पहुंचते साक्ष्य इतने कमजोर पड़ गए कि न्यायालय को सभी आरोपितों को बरी करना पड़ा.

फैसले के बाद लक्ष्मणपुर गांव में एक बार फिर वैसा ही मातमी सन्नाटा पसर गया जैसा 16 साल पहले पसरा था. जिनके घर के लोग मारे गए थे, उनके घर खाना नहीं बना.

उच्च न्यायालय के फैसले के बाद राज्य भर में सवाल उठने लगे. कहीं न्यायालय के इस फैसले का सीधा विरोध हुआ तो कुछ ने सीधे राज्य सरकार को निशाने पर लिया.

सवाल उठा कि आखिर पुलिस क्यों ऐसे तथ्य व सबूत नहीं जुटा सकी कि निचली अदालत का फैसला उच्च न्यायालय में भी टिक जाता?

हालांकि बिहार में इस तरह के फैसलों का यह पहला मौका नहीं है. पहले भी सबूत-साक्ष्य ऐसे ही कमजोर पड़ते रहे हैं.

पिछले साल बथानी टोला कांड के फैसले में भी ऐसा ही हुआ था. 1996 में भोजपुर के बथानी टोला में 22 दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को मौत के घाट उतारा गया था. 2012 में उच्च न्यायालय ने इस हत्याकांड के सभी आरोपितों को भी बरी कर दिया था.

जब भी ऐसे नरसंहारों की चर्चा होती है, लोगों को तुरंत लालू-राबड़ी युग की याद आती है. उस दौरान सूबे में नियमित अंतराल पर बड़े नरसंहार होते रहे. इतने वर्षों बाद इन नरसंहारों पर जब भी कोई अटपटा फैसला आता है तो लोगों को तुरंत ही 2005 का वह दिन भी याद आता है जब बिहार की सत्ता से लालू-राबड़ी की विदाई हुई थी और भाजपा के साथ मिलकर नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली थी.

am dasसत्ता संभालने के बाद नीतीश कुमार की सरकार ने सबसे पहला चर्चित फैसला अमीरदास आयोग को भंग करने का ही लिया था. अमीरदास आयोग को इसी लक्ष्मणपुर बाथे कांड के बाद राबड़ी देवी की सरकार ने गठित किया था. अमन-शांति की बहाली के साथ ही इस आयोग के जिम्मे कई अहम दायित्व थे, जिनमें सबसे प्रमुख नरसंहारों की पृष्ठभूमि में बिहार के कुख्यात और चर्चित जातीय संगठन रणवीर सेना की भूमिका की जांच करना भी था.

 बताया जाता है कि जस्टिस अमीरदास आयोग को भंग करके नीतीश कुमार की नई-नई सरकार ने असली गुनाहगारों की परदेदारी की कोशिश की थी. नीतीश सरकार पर लग रहे इस आरोप पर यकीन करने के ठोस आधार भी अब दिखने लगा हैं.

खुद जस्टिस अमीरदास भी कहते हैं, ‘काश ! सरकार बेजा दबाव बनाकर आयोग को भंग नहीं करती तो सच कब का सामने आ चुका होता. एक जातीय सेना के वर्चस्व के पीछे का राजनीतिक खेल सामने आ गया होता. कई सफेदपोश बेपर्दा हो गए होते.’ अमीरदास की बातों से इस निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल नहीं कि बिहार में प्रभावशाली भूमिहार जाति के संरक्षण में रणवीर सेना चल रही थी. वैसे यह कोई छिपी बात भी नहीं. वे जहां अदालती निर्णय पर सवाल उठाने से बचते हैं वहीं दूसरी तरफ यह इशारा भी करते हैं कि जिन लोगों ने नरसंहार किया था उनकी पहचान बहुत मुश्किल नहीं थी, क्योंकि ये लोग वहीं के थे.

जिस भूमिहार जाति के लोगों का संबंध रणवीर सेना से बताया जाता है, उस जाति के कई नेता आज नीतीश कुमार के साथ खड़े हैं. नीतीश को सत्ता में लाने में भी इनकी प्रमुख भूमिका रही है. सरकार बनने के तुरंत बाद इस आयोग को भंग करने को नीतीश कुमार की इसी सियासी मजबूरी से जोड़कर देखा जा रहा है.

उच्च न्यायालय के इस फैसले को ऊपरी अदालत में बेमन से चुनौती देने के फैसले को भी जानकार नीतीश कुमार की सियासी मजबूरी से जोड़कर देख रहे हैं क्योंकि भाजपा से अलग होने के बाद उनमें अपनी सियासी जमीन बचाने की बेचैनी है.   ,,,,,,,,,,,,(तहलका

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