नीतीश के लिए बड़ा मुश्किल रहा है इंजीनियर से सीएम तक का सफर

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nitish-taking-oathजेपी आंदोलन के गर्भ से राजनीति के‌ जो भ्रूण निकले उनमें एक नाम नीतीश कुमार का भी था। पटना इंजीनियरिंग कालेज (अब एनआईटी पटना) से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट नीतीश कुमार का मकसद शायद राजनीति में आना नहीं था लेकिन किस्मत उन्हें इस राह पर ले आई। हालांकि पढ़ाई के दौरान वो छात्रसंघ में सक्रिय रहे और छात्रसंघ पदाधिकारी भी चुने गए थे।

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नीतीश कुमार जब पहली बार विधायक बने

इसी बीच बिहार से जेपी आंदोलन की शुरूआत हुई तो स्वतंत्रता सेनानी के परिवार में जन्मे नीतीश खुद को नहीं रोक पाए और आंदोलन में कूद पड़े। यहां उन्हें साथ मिला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिन्हा का। जेपी आंदोलन के बाद नीतीश ने भी राजनीति को गंभीरता से लिया।

वहीं सिन्हा की सलाह के बाद उन्होंने निर्दलीय विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया और 1985 में हुए चुनावों में विधानसभा की दहलीज तक पहुंच गए। हालांकि इससे पहले वह लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुके थे। ले‌किन इसके बाद नीतीश ने कभी पलटकर नहीं देखा।

इसके बाद 1988 में उन्हें युवा लोकदल का अध्यक्ष और 1989 में उन्हें बिहार जनता दल का सचिव चुना गया। यहां से उन्होंने अपने कदम राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ाए और 1990 में हुए लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज कर सांसद बन गए।

इस दौरान उन्हें केन्द्रीय मंत्रीमंडल में भी जगह मिली और वो कृ‌षि मंत्री बनाए गए।

अपनी मां की शव यात्रा के दौरान बड़े भाई के साथ नीतीश
अपनी मां की शव यात्रा के दौरान बड़े भाई के साथ नीतीश

1991 में हुए लोकसभा चुनावों में वो दोबारा सांसद चुने गए। इसके बाद उन्हें जनता दल का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया।

इसी बीच उनका पुराने साथी लालू से अलगाव बढ़ा तो शरद यादव के साथ मिलकर 1997 में उन्होंने जनता दल यूनाइटेड के नाम से अलग दल बना लिया। भाजपा से गठबंधन कर उन्होंने 1998 और 1999 का लोकसभा चुनाव भी लड़ा।

इस दौरान वह मार्च 1998 से अगस्त 1999 तक और फिर मार्च 2001 से 2004 तक केन्द्रीय रेलमंत्री भी रहे। इसी बीच वह साल 2000 में सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी बैठे लेकिन वह ज्यादा दिन उन्हें रास नहीं आई और इस्तीफा देना पड़ा। नीतीश कुमार को असली पहचान मिली साल 2005 के बिहार विधानसभा चुनावों से।

जहां उनके नेतृत्व में राजग गठबंधन को शानदार सफलता मिली और सत्ता की कमान लालू राबड़ी के हाथों से ‌निकलकर सीधे उनके हाथों में आ गई।

पत्नी मंजू सिन्हा की मौत के बाद बेटे निशांत के साथ नीतीश
पत्नी मंजू सिन्हा की मौत के बाद बेटे निशांत के साथ नीतीश

बहुमत के साथ नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो उन्होंने सफलता की ऐसी इबारत लिखी जिसने दशकों से पिछड़ेपन का दंश झेल रहे बिहार की सूरत ही बदल कर रख दी।

उन्होंने सरकारी मशीनरी और जड़ पड़ चुके सिस्टम को चुस्त दुरुस्त करते हुए विकास की कई बहुआयामी योजनाएं शुरू की। भ्रष्टाचार को रोकने और उसे दूर करने संबंधी उठाए उनके कदमों की हर तरफ सराहना हुई। यही कारण रहा कि बिहार में उनकी छवि सुशासन बाबू की बन गई थी। लेकिन बीते लोकसभा चुनाव से पहले उनके एक कदम ने उनकी छवि को तो नुकसान पहुंचाया ही उनकी पार्टी जेडीयू के लिए भी मुश्किल खड़ी कर दी।

जिस भाजपा के साथ मिलकर नीतीश और उनकी पार्टी बिहार में सत्ता के शिखर तक पहुंची थी उसी भाजपा का हाथ नीतीश ने एक बार में ही झटक दिया।

मोदी जैसे तेज धारा के विपरित नीतीश बने तुफान
मोदी जैसे तेज धारा के विपरित नीतीश बने तुफान

माना जाता है कि नीतीश ने अल्पसंख्यक वोटों को खोने के डर से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार चुनने वाली भाजपा से नाता तोड़ा था लेकिन राजनीति के जानकारों की राय इससे इतर है।

कहा जाता है कि बिहार में अपने शानदार काम के जरिए खुद को सुशासन बाबू और विकास पुरुष के तौर पर स्‍थापित कर चुके नीतीश कुमार के दिल में कहीं न कहीं प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जोर मार रही थी।

वो मानते थे कि चुनाव बाद भाजपा की सरकार बनने पर अगर नरेन्द्र मोदी या भाजपा के किसी अन्य नेता के नाम पर सहमति न बनी तो उनका नाम भी आगे बढ़ाया जा सकता है।

लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया और इसका खामियाजा ये हुआ कि जबरदस्त मोदी लहर पर सवार होकर आए नरेन्द्र मोदी ने नीतीश के गढ़ में ही उन्हें धूल चटा दी।

इसके बाद उन्होंने दूसरी गलती की लोकसभा चुनावों में हार के बाद इस्तीफा देते हुए महा दलित जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर।

उन्हें उम्‍मीद थी कि मांझी रबर स्टैंप बनकर काम करते रहेंगे लेकिन मांझी उनकी उम्‍मीद से ज्यादा चतुर निकले और सत्ता की पूरी कमान अपने हाथ में ले ली। इसके बाद जो हुआ वो बिहार की राजनीति में इतिहास बनकर रह गया।

लालू के साथ गले मिल बिहार पर मजबूत पकड़ के साथ देश की राजनीति को नई दिशा दे डाली
लालू के साथ गले मिल बिहार पर मजबूत पकड़ के साथ देश की राजनीति को नई दिशा दे डाली

नीतीश ने अपने पूरे राजनीतिक जीवन के दौरान कम ही गलतियां की हैं, इसलिए लोग उनकी राजनीतिक सूझबूझ का लोहा मानते हैं। वह गलती करने के बाद तुरंत उसे सुधार कर आगे बढ़ने में यकीन रखते हैं।

आज चुनावों के बाद नीतीश कुमार फिर पांचवी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं तो पूरे देश की निगाहें उन पर टिकी हुई हैं। विरोधियों में उन्हें प्रधानमंत्री मोदी से लड़ने वाले दमदार नेता की झलक दिख रही है तो भाजपा के लिए वो एक बड़ी मुसीबत की तौर पर उभर सकते हैं।

हर सफलता मां के चरणों में समर्पित
हर सफलता मां के चरणों में समर्पित

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