दैनिक भास्कर ने उठाया ‘नो निगेटिव टास्क’ का रिस्क !

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 “ न हत्या। न अपहरण। न लूट। न मारकाट। अब आप विश्व के पहले ऐसे पाठक होगें,जिनके सप्ताह की होगी नो निगेटिव सोमवार से। नो निगेटिव न्यूज़ हर सोमवार। आज से नो निगेटिव न्यूज के साथ करें सप्ताह की पॉजिटिव शुरुआत। ”

जी हां, आज सर्वत्र कायम बाजारवाद के इस दौर में कहीं डूबकी लगाते तो कहीं हिचकोले खाते तो कहीं डूबते पत्रकारिता के बीच यह घोषणा देश के एक बड़े हिन्दी दैनिक भास्कर ने अपने जैकेट पेज में की है।

अखबार ने आगे लिखा है, “अंत भला तो सब भला। यह तो हम सभी मानते हैं। परन्तु यह अखबीर एक नई कहावत को चरितार्थ करने जा रहा है कि शुरुआत भली हो तो अंत भी भला ही होगा। हमने अपने करोड़ों पाठकों के सप्ताह की शुरुआत नो निगेटिव समाचार के साथ करने की पहल की है। विश्व मीडिया में इस तरह का प्रयास करने वाला दैनिक भास्कर शायद पहला अखबार होगा, जिसके सोमवार के अंक में पहले पेज से लेकर अंतिम पेज तक निगेटिव खबरों को चयनित कर अगल कर दिया जायेगा। हमें विश्वास है कि नकारात्मकता को दूर करने का हमारा यह नया प्रयास पाठकों को कामयाबी के पथ पर अग्रसर करने में सहयोगी होगा। ”

bhaskar1हो सकता है कि इसके पहले भी किसी अखबार के प्रबंधन-संपादन ने इस तरह की सोच रखा हो और अपना नजरिया बदलते हुये पाठकों में नई सोच पैदा करने की कोशिश की हो। लेकिन हिन्दी मीडिया के वर्तमान अधकचरे दौर में दैनिक भास्कर की यह अंदाज पाठकों के सामने सूचनाओं को औंधे-पौंधे परोसे जाने की होड़ के बीच नकारात्मकता और सकारात्मकता को लेकर एक रोचक बहस छेड़ दे दिया है।

प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक पंजाब केसरी का हर दिन अपने आमुख पेज पर समाचार से इतर विभिन्न रोचक समसमायिक विषयों पर आलेख देना सकारात्मक शुरुआत ही कही जाती रही है। दैनिक नई दुनिया ने भी अभय छजलानी के दौर में सकारात्मक सोमवार की कल्पना भी देखी थी।

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि सकारात्मक सोच से ही व्यक्ति, समाज, देश और दुनिया में मानवीय बदलाव संभव है। पत्रकारिता की नीति और सिद्धांत भी इस सोच से अलग नहीं है। लेकिन समस्या तब सामने आ जाती है और पत्रकारिता अपने उद्देश्यों से भटक जाता है, जब सूचनाओं के समाचारीकरण में भाषा व तत्थों की प्रस्तुतिकरण पर ध्यान नहीं दिया जाता है और सारी सोच ‘आधी गिलास भरा-आधा गिलास खाली’ के तर्कों के बीच अकुला कर दम तोड़ देती है।

अगर देखा जाये तो सूचना या समाचार किसी भी घटना या विषय से जुड़ी हो, उसका स्वरुप कभी भी नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होता है। उसके संकलन, लेखन, संप्रेषण और संपादन की शैली में बरती गई अनियमियता कहीं अधिक भेद उत्पन्न कर जाती है।

कहने का अर्थ है कि सूचनाओं के संकलन से लेकर उसके प्रकाशन तक जितने भी ‘चेंजब्रेनी’ रचना करते हैं, उनके बीच एक भावना होनी चाहिये। उनकी देखने और परखने की नजरिया एक होनी चाहिये।

आज के मानव को जिस तरह से भौतिकवादी प्रवृति जकड़ता जा रहा है। हत्या, अपहरण, लूट, मारकाट आदि सब उसी की देन है। जनमानस में इससे जुड़ी सूचनाओं की भूख होनी भी लाजमि है। उसके इस भूख के रहते उसमें असुरक्षा या भय की भावना थोड़ी कम भले हो जाये लेकिन, उच्श्रृंखलता काफी बढ़ जाएगी। वे अधिक उन्मादी व्यवहार करने लगेगें।

क्योंकि इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि अपनी छवि से चोर और सिपाही दोनों ही स्नेह रखते हैं। जिसके खंडित होने की चिंता अगर किसी से होती है तो वह है मीडिया। छवि खंडन भी मीडिया के सबसे तेज नाखुन माने जाते हैं।

bhaskar2दिक्कतें तब आती है, जब सूचनाओं को कल्पित ढंग से परोसी जाती है। उसकी भाषा और शैली में भावनाओं का भड़काव या खिलवाड़ छुपा होता है। बिहार के बिहारशरीफ बस स्टैंड के पास एक-दो शरारती तत्वों ने कुछ नक्सली पर्चे रात अंधेरे लगा दिये। अगले दिन पूर्व सीएम नीतिश कुमार की पास में हीं जनसभा थी। मीडिया ने उसे इस कदर पेश किया कि एक बड़े हलके में अफरातरी मच गई। न्यूज चैनलों के साथ अखबारें भी कदमताल मिला ली।

झारखंड में भी कहीं कोई लाल रंग से एक पर्चा साट मारता है और मीडिया वाले उसे इस कदर परोस डालते हैं कि लोग भयभीत होकर घरों सो नहीं निकलते। सड़के सुनसान हो जाती है। इसी का फायदा असमाजिक और उपद्रवी लोग उठा जाते हैं। यहां के उग्रवादी संगठनों के तिलिस्म को बल देने में मीडिया का यही अव्यवहारिक रवैया अधिक जिम्मेवार है।

आम तौर पर यहां सभी अखबारों का हाल है कि पुलिस के बयान या प्राथमिकी के आधार पर ही मोटे-मोटे शीर्षकों से किसी निरीह को भी रंगदार, हत्यारा, बलात्कारी, लुटेरा, बदमाश, अपराधी, उग्रवादी आदि सब घोषित कर डालते हैं। जबकि सूचना संकलन, लेखन, संप्रेषण, संपादन और प्रकाशन के लोग भी भलिभांति जानते हैं कि कितने प्राथमिकी सच दर्ज किये जाते हैं और पुलिस वाले कितने बोलते हैं।

आंकलन करने पर साफ नजर आता है कि प्रायः घटना-विषय को लेकर अखबारों में भाषा और शैली वेपरवाह तो होते ही हैं, उनमें तथ्य भी काफी उलट-पुलट नजर आते हैं।

बहरहाल, दैनिक भास्कर की सोच और पहल पर सबाल उठाना सही नहीं है। अगर उसके इरादे नेक और हौसले बुलंद है तो वह पत्रकारिता की सड़ांध को दूर करने का प्रेरणा और वाहक दोनों बन सकती है। उसके इस मुहिम और आंदोलन को सभी को सहयोग करनी चाहिये, जिसकी वह आकांक्षी और हकदार बन कर मीडिया की बाजारुकरणी दौर  में खड़ा होने की एक अकुलाहट दिखाई  है।

……….मुकेश भारतीय

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