झारखंड सूचना एंव जन संपर्क विभाग में सिर्फ लूट का खेल

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राज़नामा.कॉम ( मुकेश भारतीय )।  पत्रकारिता झारखंड की। कोई कहता है कि अखबार नहीं,आंदोलन। कोई कहता है कि अब चलेगी आपकी मर्जी। कोई कुछ तो कोई कुछ। लेकिन यहां न तो किसी अखबार का कोई आंदोलन दिखता है और न हीं किसी की मर्जी । इस लूटखंड में कॉरपोरेट मीडिया के लोग भी हर जगह हाथ-पैर दोनों से लुटते नजर आ रहे हैं। अगर किसी भी खबर का गौर से आंकलन कीजिये तो उसमें पेड न्यूज़ की दुर्गंध अधिक आती है।

बहरहाल, हम बात करते हैं झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग में विज्ञापन के नाम पर हो रहे लूट की। पत्रकारिता के एथिक्स पर लंबे-चौड़े भाषण झाड़ने वाले पत्रकारों ने तो इस विभाग की दुर्गति ही कर डाली है। भाजपा नीत झामुमो-आजसू-जदयू की मुंडा सरकार को भी इस विभाग के जनहित के उद्देश्यों से कोई लेना-देना नहीं है। बस उसे मतलब है तो सिर्फ इतना कि पत्रकारों का हुजुम उसके काले कारनामों को देख कर न भौंके। 

पिछले दिन एक ऐसे ही वाक्या झारखंड सरकार के सूचना एंव जन संपर्क विभाग में देखने को मिली।  उसके विज्ञापन वितरण पदाधिकारी (श्री कुजूर) के सामने दैनिक भास्कर के विज्ञापन प्रबंधक ( रवि ) ने  अपने अखबार के लिये 2.30 करोड़ की राशि की जगह मात्र 29 लाख रुपये के भुगतान का लिखित प्रस्ताव दिया। जिसे संबंधित अधिकारी ने पलक झपकते ही अनुशंशित कर दिया। उस अधिकारी के हाव-भाव से लगा कि उस पर उपर का  साफ दबाब है। जाहिर है कि 2.1 करोड़ की अंतर राशि का बंदरबांट होगी नीचे से उपर तक।

यह कोई एक उदाहरण नहीं है। ऐसे गोरखधंधे यहां रोज होते रहते हैं। सैकड़ों ऐसे पत्र-पत्रिकायें हैं,जो सिर्फ 100-200 प्रतियां ही छाप कर लाखों-करोड़ो का वारा-न्यारा खुल्लेआम कर रहे हैं। राम जनता की गाढ़ी कमाई को जनहित को सूचना देने की आड़ में इस लूट पर कब अंकुश लगेगा ?…. (जारी)

 

 

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