‘दुर्ग’ को जमानत, लेकिन ST-SC कोर्ट में यूं दिखा सुशासन का दोहरा चरित्र

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सीएम नीतीश कुमार ने जांच के लिए पटना के आईजी को कहा गया है। तो फिर इस सूरत में ST-SC कोर्ट में सरकार के विरोध का क्‍या औचित्‍य था। मतलब तो साफ है कि सरकार के निर्णयों का संदेशा भी ठीक से नहीं पहुंचता है….

राजनामा. कॉम।  फर्जी मुकदमे में राजस्‍थान के बाड़मेर से झांसा दे गिरफ्तार कर लाए गए पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित को आज 24 अगस्‍त को बेल मिल गई। एससी-एसटी कोर्ट ने जमानत दी।

जपुरोहित शनिवार 25 अगस्‍त को बेऊर जेल से बाहर आयेंगे। निश्चित तौर पर परेशान उनके परिवार वाले कुछ राहत में आये होंगे। लेकिन कोर्ट के बेल आर्डर की कॉपी काफी हैरान करने वाली है।

बाकई बिहार का सिस्‍टम टोटल फेल्‍योर की ओर बढ़ चला है। सवाल नीतीश कुमार के गवर्नेंस का भी है, जो कहते रहे हैं कि उनकी सरकार न किसी को फंसाती है, न बचाती है।

सिस्‍टम के छेद को समझने के लिए बेल आर्डर पढ़ना बहुत जरुरी है। शुक्र मनाइए कि एससी-एसटी कोर्ट के जज ने विवेक से निर्णय लिया। विवेकपूर्ण न होते तो दुर्ग सिंह राजपुरोहित को अभी जेल में ही और सड़ना होता।

कोर्ट में बिहार सरकार की ओर से केस की पैरवी करने को सरकारी वकील होते हैं, जिन्‍हें पीपी कहा जाता है। इस बेल आर्डर में पीपी की भूमिका को देखिए। पहले जेल में बंद दुर्ग सिंह राजपुरोहित के वकील ने बेल के लिए पैरवी की। बहस में अपना पक्ष रखा। केस को फर्जी बताया।

अब इसके बाद केस करने वाले राकेश पासवान के वकील और सरकारी अधिवक्‍ता की बारी आई। दोनों ने विरोध किया। झमेला फिर से कोर्ट में दिखा।

बड़ा सवाल यह कि जब राकेश पासवान ने मीडिया के सामने यह कह दिया है कि उसने कोई केस किया ही नहीं था, तो फिर आज इनकी ओर से वकील किसने खड़ा कर दिया। आज राकेश पासवान के पिता को भी टीवी पर दिखाया था, जो केस को फर्जी बता रहे थे।

मतलब कि इस पूरे खेल को खेलने वाला स्‍ट्राइकर अब भी एक्टिव है और अधिक हैरत की बात रही कि बिहार सरकार के वकील ने भी बेल की मांग का विरोध कर दिया। ज‍बकि दुनिया को यह पता है कि बिहार के पुलिस हेडक्‍वार्टर को राजपुरोहित की गिरफ्तारी में साजिश की बू लगी है।

बाड़मेर के पत्रकार राजपुरोहित के खिलाफ फर्जी मुकदमा कराने में पटना के बड़े भवन का खेला बताया जा रहा है। बड़े भवन के सबसे बड़े साहब बराबर बाड़मेर जाया करते थे। किसी के यहां जाकर ठहरते थे।

राजपुरोहित ने सभी कुछ पब्लिक डोमेन में ला दिया था। यह न तो बाड़मेर में बड़े भवन वाले साहब के होस्‍ट को अच्‍छा लगा और न ही पटना में संविधान वाले साहब को। सो, केस में फांस दिए गए राजपुरोहित।

राजपुरोहित कभी पटना आए ही नहीं हैं। सीधे गिरफ्तार होकर आए। और वह भी दलित एक्‍ट में। इस फर्जी गिरफ्तारी की गूंज अब राजस्‍थान से पटना तक हो रही है। बिहार में क्‍या सब हो सकता है, यह भी पूछा जा रहा है।

राजपुरोहित के बेल आर्डर को एक बार फिर से पढ़ लीजिए। राकेश पासवान का कथित वकील और सरकार का पीपी बेल का विरोध कर रहा था। ऐसे में जज साहब को निर्णय लेना था।

तब उन्‍होंने जरुरी रिकार्ड देखे। पाया कि घटना की तारीख और केस दर्ज कराने की तारीख में बहुत लोचा है। इस अंतर को ही जज साहब ने बेल देने का आधार बनाया और दे दी बेल।

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