दलालों की रखैल बनी पत्रकारिता

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झारखण्ड में कोई पत्रकार नहीं , कोई संपादक नहीं , कोईब्यूरो चीफ नहीं – संपादक मैनेज़र है , पत्रकार रिपोर्टर है और ब्यूरो चीफ तो मानो कोई ज़गह ही नहीं रखते है , पत्रकार का मतलब हमें सिखाया गया ज़ब मै डेल्ही में मास मीडिया कर रही थी की अपनी दिमाग का भी इस्तेमाल करे , खोज करे , अनुसंधान की बारीकियो को भी समझाने की कोशिश करे सिर्फ खबरे भेज देना रिपोर्टर का काम है,चतरा में नक्सली गठजोड़ के नमूने सामने आए है लेकिन कोई कुछ लिखने को तईयार नहीं है , सब रिपोर्टिंग कर रहे है ।

७अक्तुबर २०१२ को सुधांशु सुमन नामक एक तथाकथित पत्रकार ने सभा करवाया , इसमे सी बी आई के निदेशक भी पधारे , ५० लाख से अधिक का खर्च आया ,लेकिन एक पत्रकार ने इतना रूपया लाया कहा से ? क्या यह सवाल नहीं है , और अगर सवाल है तो मेडिया कहा सोई है ? या फिर मीडिया सुधांशु के हाथो बिक गयी है ? एक वेब साईट ने लिखा है की सुधांशु के आका दीपक मिश्र है , उनकी ज़मीन बिकवाई है , पर यह गलत है , वेब साईट के रिपोर्टरों को यह मालूम नहीं है की सही क्या है , इसलिए वे गलत छाप रहे है, दीपक मिश्र के ज़मीन बिकवाने की बात आई वाश है।

वास्तव में नक्सलियो का पैसा नोएडा में लगाया जा रहा है , करोडो – करोड़ नोएडा में लगा है , हजारीबाग में भी १०० करोड़ की संपती खडी है, सुधांशु सब का लातिज़ेनर है , चतरा में भी खर्च नक्सलियो का ही हूवा है नाम इन साहब का है , दीपक मिश्र भी चुनाव लड़ने का मन बना रहे है सो कही ना कही तो ज़मीन तईयार करना ही होगा , अपने आपको सुधांशु मिश्र कहलानेवाला यह आदमी दीपक जी का मुलाजीम है , अखबार में विज्ञापन निकालकर इसे नौकरी पर रखा गया था – केयर टेकर का , वह दीपक मिश्र का घर और माँ की सेवा करना इसकी ड्यूटी थी , वाही से इनने मैथली सिख ली और भाई बन बैठा , आज यह सख्स अपने माँ – बाप का पैर नहीं छुटा है पर दीपक बाबा का नतमस्तक होने में जरा देर नहीं , लाला जाती का यह आदमी एक हरिजन लड़की के इज्ज़त से खिलवाड़ किया और फिर उसके बाप से पैसा भी वसूला ,आज करोडो की संपती का मालिक है कहा से ? दीपक बाबु का राजदार है सारे मामलो पर क्या मीडिया की नज़र नहीं जानी चाहिए ?

अगर नहीं जाती तो मीडिया को स्वतंत्र की ज़गह क्या कहा जाएगा आप ही बेहतर बता सकते है ; झारखण्ड में पहले बैजनाथ मिश्र थे जो चाहे धुर्ज़ाती के नाम से लिखे या नीलकंठ के नाम से पर बात सामने आ जाती थी , पर ऐसे ही वे सूचना आयुक्त बन गए उनकी प्रतिष्ठा खाक में मिल गयी वे भी झारखंडी दलालों के गिरोह का एक कुनबा सम्हालने में लग गए , कोई संपादक-पत्रकार है जिनपर थोडा भरोसा था शायद उनके कलम की धार भी कुंद हो गयी है , वे भी बड़े बातो में ध्यान लगा रहे लेकिन वे भी अपने नाक के नीचे की सड़ांध से बेखबर है , और अब मै किसी को पत्रकार मानती ही नहीं सभी एक ही थैली के चट्टे- बट्टे है,इसलिए मै कहती हूँ की पत्रकार कहलानेवाले चुल्लू भर पानी में डूब मरे ;क्युकी झारखण्ड की पत्रकारिता दलालों की रखैल बनकर साँस ले रही है ।

  ………..Manoj pathak  द्वारा सूचित  avantika bhargav की हुबहु पोस्ट

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