भारी पड़ा “राजा” से रंजिश

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raja_dspप्रतापगढ़ में एक कनिष्ठ पुलिस अधिकारी की हत्या के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में जो सियासी तूफान आया है उसके मूल में राजा बनाम प्रजा की लड़ाई से ज्यादा हिन्दू बनाम मुस्लिम की लड़ाई है। यादव बनाम ठाकुर की लड़ाई है। राजनीति बनाम प्रशासन की लड़ाई है। इसलिए इस हत्याकांड के बाद उत्तर प्रदेश में जितना संकट राजा भैया के लिए नहीं खड़ा होगा उससे ज्यादा संकट मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी के लिए पैदा होगा। राजा भैया का इस्तीफा, जांच पड़ताल वह सब अपनी जगह लेकिन इस घटना का जो राजनीतिक संकेत है वह समाजवादी पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित होगा।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी भले ही अपने आपको सेकुलर हिमायती और मुस्लिम संरक्षक मानती हो लेकिन उनकी पार्टी में राजा भैया इन खूबियों के कारण शामिल नहीं है। प्रतापगढ़ में एक छोटी सी रियासत से संबंध रखनेवाले राजा भैया अपने रसूख और बाहुबली चरित्र के कारण समाजवादी पार्टी की पसंद हैं। समाजवादी पार्टी के भीतर राजा भैया के समर्थकों की अच्छी खासी संख्या है जो उन्होंने अपने कद्दावर स्वभाव के कारण अर्जित किया है। व्यक्तिगत रूप से बेहद विनम्र स्वभाव का प्रदर्शन करनेवाले राजा भैया का एक ऐसा समानांतर चरित्र है जो उन्होंने दंबंगई और गुंडई के भरोसे से हासिल किया है।

इस दबंगई और गुंडई की शुरूआत किसी दलित या हिन्दू के खिलाफ नहीं हुई थी। राजा भैया जिस भदरी सियासत से संबंध रखते हैं उसके अघोषित राजा उनके पिता उदय प्रताप सिंह हैं। उदय प्रताप सिंह भले ही बाद के दिनों में 2002 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर राज्यसभा में भेंज दिये गये हों लेकिन स्थानीय स्तर पर हिन्दूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कट्टर समर्थक और मददगारों में शामिल रहे हैं। वे आरएसएस के मानद पदाधिकारी भी रहे हैं। वे जिस कुण्डा तहसील के निवासी हैं वहां मुस्लिम आबादी कमोबेश एक चौथाई है। जाहिर है, उनका आरएसएस के प्रति झुकाव उनकी व्यावहरिक जरूरतों के कारण भी हुआ होगा लेकिन रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की शुरूआती शिक्षा और पालन पोषण ऐसे माहौल में हुआ है जो राजनीतिक रूप से भी निहायत हिन्दूवादी परिवेश था।

इसलिए जब उदय प्रताप सिंह के बेटे रघुराज प्रताप सिंह ने इलाहाबाद से पढ़ाई खत्म करने के बाद राजनीतिक कैरियर बनाने की ओर कदम बढ़ाया तो उसकी पहली पसंद कोई और पार्टी नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी थी। जिन दिनों राजा भैया राजनीति में कदम रख रहे थे उन दिनों भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन के कारण अपने शबाब पर थी। 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में राजा भैया भाजपा के टिकट पर ही चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो वे निर्दलीय लड़े और 26 साल की उम्र में ही विधायक बन गये। राजा भैया भले ही निर्दलीय विधायक बने हों लेकिन उनका झुकाव भाजपा की तरफ ही था और कल्याण सिंह के करीबी लोगों में शुमार थे। लेकिन ठाकुर राजनीति के प्रभाव में आकर राजा भैया ने अपना रुख बदल दिया और राजनाथ सिंह के करीब पहुंच गये जिसका परिणाम यह हुआ कि राजा भैया और कल्याण सिंह में दुश्मनी बढ़ती चली गई। दुश्मनी इतनी बढ़ी कि दोनों के रास्ते अलग अलग हो गये।

सीओ रियाज उल हक की हत्या के बाद भले ही राजा भैया अपनी सफाई में यह बयान दे रहे हों कि अगर उन्हें कोई शिकायत होती तो वे उस सीओ का तबादला करवा देते लेकिन प्रतापगढ़ की पॉवर पॉलिटिक्स को जो जरा भी समझते हैं उन्हें बताने की जरूरत नहीं है कि राजा भैया का राज तबादला कराने की नीति पर नहीं कायम है। बल्कि वह सबक सिखाने की नीति पर काम करता है। रियाज उल हक के मामले में राजा भैया के समर्थकों ने भी यही काम काम किया है।

राजा भैया की मायावती से कभी नहीं पटी जबकि मुलायम सिंह यादव ने उनकी काबिलियत का उन्हें पूरा ईनाम दिया। मायावती के शासन में आतंकवादी तक घोषित कर दिये गये राजा भैया को मुलायम सिंह यादव ने 2003 में सत्ता पाते ही फिर गले लगा लिया और पोटा के तहत दर्ज सभी केस वापस ले लिये। यहां से राजा भैया और मुलायम सिंह का साथ साश्वत हो गया। राज्य स्तर पर भले ही मुलायम सिंह और राजा भैया का अटूट जोड़ बन गया हो लेकिन स्थानीय स्तर पर राजा भैया की प्राथमिकताएं और जरूरतें उन्हें मुसलमानों का विरोधी बनाकर रखने को मजबूर करती रहीं। कुण्डा में जितनी बार भी धार्मिक दंगे भड़के हर बार कथित तौर राजा की सेना ने ही हिन्दुओं का बचाव किया है। ताजा प्रकरण में इसी तरह का एक दंगा ही है जिसमें मुसलमानों के घर जला दिये गये थे।

अस्थान की मुस्लिम आबादी में आगजनी की यह घटना नयी समाजवादी सरकार बनने के बाद घटी थी, लिहाजा कोई बहुत हंगामा न हुआ। राजा भैया मंत्री बनाये जा चुके थे और किसकी मजाल जो राजा भैया के खिलाफ गवाही देता। उनके लोगों की शिनाख्त करता। यह गुस्ताखी किया सीओ जिया-उल-हक ने। बताते हैं कि सीओ जिया-उल-हक द्वारा तैयार रोजनामचे और तस्करा में राजा भैया का नाम दर्ज है जो तबसे उनके समर्थकों को अखर रहा है जब से दंगे हुए थे। जिया-उल-हक की पत्नी परवीन आजाद ने जिस धमकी देने की बात कही है वह धमकियां रोजनामचे में लिखे उसी नाम की वजह से जिया उल हक को मिलती थी कि इसकी इतनी औकात कि इसने राजा भैया का नाम रोजनामचे या तस्करा में लिख दिया है। स्थानीय पुलिस या प्रशासन में किसी की हिम्मत नहीं है जो राजा भैया के खिलाफ कुछ कार्रवाई कर सके। तब तो एकदम नहीं जब राजा भैया खुद कोतवाल बने बैठे हों। लेकिन जिया-उल-हक की इस गलती की सजा उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

जिया उल हक का मुसलमान होना अगर उन्हें भारी पड़ गया तो इस घटना का सीधा असर समाजवादी पार्टी के भीतर होना तय है। पार्टी के मुस्लिम चेहरे आजम खान खुद समाजवादी पार्टी से बहुत खुश नहीं है। प्रदेश में मुसलमानों का एक धड़ा पहले से नेताजी से नाराज चल रहा है। ऐसे में एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी की हत्या का राजनीतिक रंग समाजवादी पार्टी को मुसलमानों को बीच बदरंग कर दे तो कोई बहुत आश्चर्य नहीं।    …… (साभारः विस्फोट.कॉम)

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