झारखंडी आदिवासी का असली दुश्मन

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झारखंड में आये दिन बाहरी-भीतरी का मुद्दा उठना आम बात हो गई है। हाल ही में राज्य की नौकरियों पर बाहरी लोगों का कब्‍जा बर्दाश्‍त नही होगा,उन्‍हें वापस मार भगाया जायेगा जैसे विरोधी स्वर सड़क तक जोर-शोर से सुनाई दिये।  इस दौरान दूसरे राज्‍यों से नौकरी पर आये युवकों को मारा पीटा भी गया।

सच पुछिये तो बिहार से पृथक झारखंड राज्य गठन के साथ ही यहां का एक समूह जिसमें आदिवासियों की बहुतायत है, वह आज भी झारखंड को एक राज्य के बजाय एक अलग राष्‍ट्र निर्माण के रूप में देखता है। यह समूह सदानों और खास कर बिहार के लोगों के साथ मारपीट करने और उन्‍हें यहां से खदेड़ भगाने में यकीन रखता है।

यह वही समूह है जो राज्‍य गठन के प्रारंभ से ही सरकारी दफ्तर में घुस कर वहां के कर्मचारियों से गाली गलौज मारपीट करता था और उन्‍हें ये धमकी देता था कि आप झारखंड हित में काम नही कर सकते हो। जितना जल्दी हो यहां से भागो, हम लोग खुद सारी व्यवस्था संभाल लेंगे। इस हकीकत को शायद ही लोग भूल पाये होंगे कि प्रथम मुख्‍यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने जिस तरह डोमेसाईल को परिभाषित किया और उसे लेकर व्यापक पैमाने पर दंगे हुये तथा बाहरी-भीतरी मुद्दे पर समूचा प्रदेश गृहयुद्ध की स्थिति में पहुंच गया था। इस आग की उपज बंधु तिर्की, चमरा लिंडा जैसों ने खूब राजनीतिक रोटियां सेंकी ।

      आज झारखंड में सबसे अहम मुद्दा जमीन के कारोबार का है । आज सालखन मूर्मु, दयामनी बारला,चमरा लिंडा, करमा उरांव सरीखे लोग जो आदिवासी हितों के पैरोकार बने हैं और जब- तब बाहरी भीतरी वाले मुद्दे को हवा भी देते  रहते हैं। इन लोगों ने इस बात पर कभी गौर नही किया या करना नहीं चाहते कि आदिवासियों की जमीन को औने पौने दामों में सबसे अधिक हड़पने का काम खुद आदिवासी नेता ही करते चले आ रहे हैं।  जिस प्रकार से आज हमारे देश के बारे में ये बात कही जाती है कि गोरे अंग्रेज चले गये लेकिन काले अंग्रेज यानि भ्रष्‍ट लोग सत्‍ता पर काबिज हैं । वर्तमान स्थिति गुलामी जैसी बरकरार है। सचमुच यही हाल झारखंड में आदिवासियों की है।

वेशक झारखंड राज्‍य बनने से पहले यह आरोप लगता रहा कि यहां के सीधे-सादे आदिवासियों को बाहर के लोगों ने छला है। उनका विकास अवरूद्ध किया है। यहां की संपदा को लूटा है। पर आज झारखंड बनने के 12 साल बाद इसकी हकिकत सामने आ गई है। दरअसल आज झारखंड में अदिवासियों का सबसे बड़ा दुश्‍मन कोई है तो वह खुद आदिवासियों का ही एक तबका है। जो शातिर है, धनलोलूप है, माफिया और दबंग है, आपराधिक सोच रखता है सत्‍ताकांक्षी है या सत्‍ता से एक गठजोड़ बना कर आदिवासियों की जमीन को हीं कब्‍जा कर रहा है। ये दबंग आदिवासी जमीन का दलाल है, पैसे वाले शातिर माफिया लोगों के हाथों में एक हथियार की भांति है।

सबसे बड़ी बात कि अब ये आदिवासी दिन-हीन नही बल्कि नवधनाढ़य बनने के रास्‍ते पर है। ये ब्रांडेड कपड़ों, उच्‍च जीवनशैली, शराब, महंगे कारों , बाईक , फैशनेबल चीजों के पीछे पागल हैं और इन सबके लिये ये अपने ही बंधु बांधवों को बर्बाद करने पर उतारू हैं। आधुनिकता और भौतिक सामानों के पीछे ये पागलपन उन आदिवासियों का है

राजधानी में हीं अगर कहीं भी जमीन बिक रही है तो उसके दलाल के तौर पर ये दंबग और शातिर आदिवासी युवक जरूर शामिल होंगे और इनका गठजोड़ उन्‍हीं कथित दिक्‍कुओं(बाहरी) के साथ है जिसके विरोध की बुनियाद पर झारखंड बना और आज तक राजनीति होती रही है। इन दलाल आदिवासियों को न तो अपनी जमीन खोने का ग़म है और न ही आदिवासियों के अस्मिता की। इन्‍हें चिंता बस इस बात की है कि कैसे अपने ही भाईयों के पीठ पर पैर रख कर आगे बढ़ा जाये।

आज राजधानी के प्रत्‍येक आदिवासी बस्‍ती में इन दलाल दबंगो का एक गैंग मिल जायेगा। इनका मुख्य कार्य किसी कमजोर आदिवासी को जिसके पास कीमती जमीन है उसे डरा-धमका कर या बहला-फुसला कर अपनी जमीन बेचने को मजबूर करना है और इस डील में खुब पैसे बनाना है। विरोध करने वाले आदिवासी को किसी न किसी हथकंडे से शांत कर दिया जाता है।

यहां की मीडिया में झारखंड के सदानों पर इस बाबत जो आरोप बहस में दिखते हैं कि आदिवासियों की जमीन सदानों द्वारा हड़पी जा रही है,उसमें आंशिक सच्‍चाई मात्र है। असली माजरा तो यह है कि आदिवासियों का एक ताकतवर तबका खुद ही उनकी जमीन हथिया कर अच्‍छे कीमत पर बेच रहा है और असली मालिक को कौड़ी भर थमा देता है। ये लोग अपार्टमेंट बनाने वालों या बिल्‍डरों के लिये जमीन कब्‍जा कर उपलब्‍ध कराते हैं । इस गैरकानूनी काम में सत्‍ता वर्ग एक कदम आगे बढ़ कर लिप्‍त रहा है संजीवनी बिल्‍डकॉन जैसे दर्जनों बिल्डरों के मामले में तो सरकार एवं उसके तंत्र की संलिप्‍तता साफ तौर पर दिखती है।  आदिवासी मंत्रियों नेताओं में अधिक से अधिक जमीन हड़पने की होड़ मची हुई है। बानगी के तौर पर देखिये-

  • झारखंड के उपमुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन खुद ही गैरकानूनी तरीके से आदिवासी जमीन कब्‍जा करने के आरोपी हैं।
  • मंत्री मथुरा महतो पर अवैध तरीके से भूखंड खरीदने का आरोप लगा है।
  • दुलाल भुइयां जो सीएनटी एक्‍ट हटाने के धुर विरोधी हैं इन पर आरोप है कि मंत्री रहते खुद ही पद का दुरूपयोग कर करोड़ों रूपये के जमीन हासिल किये 
  • बंधु तिर्की पर आरोप है कि दिल्‍ली के अलावा झारखंड में हीं करोड़ो की जमीन हासिल की।
  • कुछ साल पहले ऐसे ही गैरकानूनी धंधे में देवनीस किड़ो पकड़े गये , जो तब भूमि सुधार उपसमाहर्ता थे। एक आदिवासी होकर आदिवासियों की जमीन को खूब बिकवाया और मालामाल हो गये।
  • स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री हेमलाल मुर्मू 30 से 35 लाख रूपये कट्ठा कीमत की जमीन पर मकान बनवा रहे हैं।

ये कुछ उदाहरण हैं कि कैसे आदिवासी ही आदिवासियों की जमीन का दुश्‍मन बना हुआ है। ऐसे माननीयों की संख्‍या बहुतायत में है। जिनमें राजधानी रांची समेत राज्य के अन्य शहरों एवं उसके आसपास के हलकों में खासतौर से आदिवासी जमीन खरीदने की सतपीढ़िया भूख लगी है। एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में शायद ही  कोई ऐसे आदिवासी नेता-अधिकारी होगें, जिन्होंने सीएटी या सीपीटी एक्ट का उलंघन कर करोड़ों-अरबों की जमीन न हड़पी हो।

अब इसे विडंबना नहीं तो क्या कहेगें कि पृथक राज्य गठन के बाद सारे आदिवासी ही मुख्‍यमंत्री बने और उन्होंने सबसे अधिक नुकसान आदिवासियों का ही किया। पर खेला तो देखिये कि ये सब आज भी आदिवासी हितों की राजनीति करने के ढिढोंरे पिटते फिर रहे है।  झारखंड की राजनीति के दिग्गज झामुमो नेता शिबु सोरेन हर मौके पर आदिवासियों को खुश करने के लिये कथित दिक्कुओं-बाहरी लोगों के खिलाफ आग उगलते रहे। इधर अर्जुन मुंडा सबसे अधिक दिनों तक सत्‍ता में रहे और आज भी हैं। पर इनके किसी भी कार्यकाल में कहीं कोई जमीनी काम का ठोस विजन नही दिखा और नही दिख रहा है। बस ये किसी प्रकार से निष्‍कंटक सत्‍ता में बने रहने का गुर जानते हैं। विकास इनके लिये कोई मतलब नही रखता हैं। इनकी सारी योजनायें जमीन पर आते-आते बीच रास्ते में कहां गायब हो जाती है, पता नहीं चलता।

इधर राजधानी रांची के कांके प्रखंडागंर्त नगडी गांव में सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण का मामला गर्म है। इस मामले को लेकर सरकार खुद भ्रमित है कि वह क्‍या करे। जमीन नगड़ी के ग्रामीणों को दे दी जाये या प्रस्‍तावित लॉ कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज के लिये इस जमीन को जबरन ले लिया जाये। इस मामले को लेकर प्रशासन और ग्रामीणों में कई बार खूनी टकराव भी हो चुके हैं। ग्रामीणों का अभी आंदोलन जारी है। उसके सामने भूमि सुधार मंत्री मथुरा महतो की अध्यक्षता में गठित मुंडा सरकार की कमिटि भी दूम दबाकर भाग जाती है। हालत कितनी अजीब है कि मुंडा सरकार संचालन समिति के अध्यक्ष-झामुमो सुप्रीमों शिबू सोरेन नगड़ी गये और वहां ग्रामीणों के बीच विवादित जमीन पर हल जोत खेती करने का हुक्‍म दे आये। इस पर रांची हाई कोर्ट ने झारखंड सरकार से पूछा कि इस राज्‍य में कानून का राज चलेगा या इस तरह से सड़क पर फैसले होंगे। अब सरकार मुश्किल में है।

जब इस गांव के जमीन के विवाद की  हकिकत जानने का प्रयास किया तो कुछ युवाओं ने बताया कि ये सारा खेल आदिवासी जमीन माफियाओं का है। जो ग्रामीणों को उकसा कर सरकार का विरोध करवा रहे हैं ताकि, सरकार इस जमीन को कब्‍जा करने का खयाल त्‍याग दे और इसके बाद ग्रामीणों से ये जमीन लेकर इसे बिल्‍डरों से मोटी कीमत पर बेची जाये। एक शिक्षित युवा का यहां तक कहना था कि अगर सरकार भविष्य में सिर्फ खेती करने की शर्त पर यह जमीन ग्रामीणों को वापस कर दे तो ग्रामीणों का सारा विरोध काफूर हो जायेगा। यानि यहां भी नेता टाईप आदिवासी जमीन माफियाओं का ही खेल है।

ऐसे आदिवासियों के संस्‍कार में जमीन को बहुत ज्‍यादा अहमियत दी गई है उससे उनका मोह अत्‍यधिक होता है और उसे बेचना उनके लिये दु:खद होता है।

अपने इसी संस्‍कार के चलते ही जो बड़ी-बड़ी कंपनियां झारखंड में आईं उन्‍हें जमीन अधिग्रहण में खासी मुश्किलों को सामना करना पड़ा है। अक्‍सर मीडिया में इस तरह की सुर्खियां आती रहती है कि जमीन नापी करने गये किसी कंपनी के कर्मचारियों को बांध कर पीटा गया, नंगा कर पेड़ से बांध दिया गया, सर पर चप्‍पल रख कर गांव में घुमाया गया इत्यादि। दरअसल इसके पीछे आदिवासियों और गांव वालों के अंतर्मन की यह सोच है कि ये दिक्‍कू (बाहरी)लोग हैं और ये इनका भला नही करेंगे ।

आज आदिवासी युवाओं में जिनमें अमीर बनने कि ललक है, उन्‍हें सबसे आसान रास्‍ता जमीन का कारोबार लगता है। हालांकि इस काम में सभी वर्ग के लोग लिप्‍त हैं पर आदिवासी युवक सभी भौतिक सुख सुविधाओं को जल्‍दी से पा लेना चाहते हैं इन सबके लिये ये प्रायः जमीन को बेचने के धंधे में लगे हुये हैं। इसमें जल्‍दी से ज्‍यादा पैसे कमाने की गुंजाईश होती है और ये गुजांईश ही अपने ही बंधु-बांधवों के साथ दगा करने को उकसाये हुये है। आज हालात यह है कि जिस आदिवासी के पास जैसे तैसे जीवन यापन का साधन था, वह जमीन के अवैध कारोबार से करोड़ो में खेल रहा है। उसके पास धन के साथ ही बल और रसूख भी आ चुका है। ये डरा धमका कर उन कमजोर आदिवासियों के जमीन को बेच रहे हैं, जो प्रतिकार करने में सक्षम नही हैं। आज राजधानी की ही प्रत्‍येक बस्‍ती में आदिवासी युवाओं का एक गैंग मिल जायेगा, जो जमीन का अवैध कारोबार करता है। ये जिस आदिवासी जमीन पर हाथ रख दें, उसे अपनी मनचाही शर्त पर कब्‍जा करके बेच सकते हैं। लब्‍बोलुआब यह कि मीडिया में या राजनीतिक हलकों में कथित भोले भाले आदिवासियों की जमीन को हड़पने की जो बात आती है, वह आधा सच होता है। वास्‍तव में बाहरी या सदान आदिवासी जमीन खरीदने से डरते हैं। इन आदिवासियों की जमीन का असली लुटेरा और कोई नही खुद शातिर और आपराधिक किस्‍म के आदिवासी ही हैं, जो जमीन माफिया और बिल्‍डर लोगों को जमीन उपलब्‍ध करा रहे हैं या फिर आदिवासी नुमाइंदे, नेता है जो अपने मुखौटे से तो बाहरी लोगों को दोष देते हैं पर खुद आदिवासियों को अपनी जमीन से बेदखल करने पर तुले हुये हैं।  .…..मनोज शर्मा

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