जलना चाहता हूँ मैं तो बनकर इक दिया,देखो अँधेरा जग में कहीं अब रह न जाये

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PRIZEनई ज्योति के संग झिलमिल करके
दिल में अपने उम्मीदों के रंग भरके,
करूँ रौशनी मैं तो झम झम यार
निशा की गली में यूँ तम खो जाये
जैसे तिमिर को कोई जुगनू खा जाये

हो बाती का मुझसे प्यार ऐसा
मेरे प्यार में झूमे संसार ऐसा
रौशनी संसार को इतनी दूंगा मैं
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाये
मुझ दिए को कोई भुला ना पाये

जलना चाहता हूँ मैं तो बनकर इक दिया
देखो अँधेरा जग में कहीं अब रह न जाये

अगर संसार में हैं कही मुझ बिन उदासी
कोई तो होगी कही मेरी दर्श की प्यासी
पूणर्तया नहीं मुझमे मैं तुम बिन अधूरा हूँ
जल रहा हूँ मैं विरहा आग से मैं सन्यासी
सदा नाश हो इस जग से अंधेरो का यार
मैं हूँ दीपक धरा का सबसे मुझसे हैं प्यार

रोज इस जग में चाहे दीपावाली बनवालो
पर मुझसे तो इस जग का गम मिटवालो

जलना चाहता हूँ मैं तो बनकर इक दिया
देखो अँधेरा जग में कहीं अब रह न जाये

अगर मुझे जलाने से मिटता हो जग में,
मेरे इस संसार की धरा का अँधियारा
नयन दर्श को ऐसे प्यासे जगत में यार
जैसे कर दूंगा हर हृदय में मैं उजियारा
कटेगे तभी कही कही से यह अंधियार
जब जुगनू सा बन मैं उड़ चलु ये संसार

जलना चाहता हूँ मैं तो बनकर इक दिया
देखो अँधेरा जग में कही रह ना जाये

कैसे कहूँ किससे कहूँ कौन सुनेगा मेरी बात
कांटे से कटती नहीं प्रिये बिन तेरे मेरी रात

एक बहन के आगे एक बहन बोनी हो गई
बिन गलती के सज़ा मुझको मिली मेरे साथ कैसी अनहोनी हो गई

उठी थी मेरे भी अरमानों की होली
जलाई गई मेरे भी अरमानों की होली

सबने देखा था उसकी अग्निपरीक्षा को
किसी ने ना देखा मेरी पति की प्रतीक्षा को

रात वो काली अंधियारी वो मुझ पर अति भारी थी
जब इंद्रजीत ने मेरे प्राण प्रिये को बरछी मारी थी

बुझ रहे थे मेरे भी इस आंधी तूफ़ान में मेरे भी दिए
जब जब थे संकट में मेरे प्राण प्रिये

अपने हाथों से एक एक दिया बचाती रही
रात भर सोई नही माताओं के चरण दबाती रही

सीता बहन के दुःख सबने देखा
मेरा पति मेरे पास नहीं था किसी ने ना देखा

वैदेही तो एक आग में जली थी
पर उर्मिला पिया मिलन आग में रोज रोज जली थी

pp………..अशोक सपड़ा (दिल्ली ) की कलम से

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