जब डॉ. मिश्र ने महज इंदिरा जी को खुश करने के लिए इस बिल से देश में मचा दिया था तूफान

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बिहार में वे कांग्रेस के आखिरी सीएम थे। उनके निधन के बाद  उनके कार्यों की चर्चा हो रही है। शिक्षा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। लेकिन सीएम रहते हुए डॉ. जगन्नाथ मिश्र का एक फैसला ऐसा भी था जिसकी आलोचना देश भर में हुई……………..”

राजनामा.कॉम (जयप्रकाश नवीन)। बिहार के कदावर नेता और तीन बार सीएम रहे मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र हमारे बीच नहीं हैं। इमरजेंसी के दौरान पत्रकारिता पर सेंसरशिप की यादें बिसरी भी नहीं थी कि 1982 में उन्होंने बिहार विधानसभा में बिहार प्रेस बिल लाकर हंगामा मचा दिया था। इस बिल के आने से देश भर के पत्रकारों और बुद्धिजीवीओ में आक्रोश फैल गया। लोग सड़कों पर आ गए।

पटना की सड़कों पर पत्रकारों पर भी जमकर लाठियां चली। सारे अखबारों ने सांकेतिक हड़ताल कर दी थी। देश भर में लगभग दस हजार अखबार बिहार प्रेस बिल के खिलाफ एक दिन बंद रहा।

यह था बिहार प्रेस बिल: बिहार के तब के कदावर नेता और सीएम डॉ जगन्नाथ मिश्र ने 1982 में बिहार विधानसभा में बिहार प्रेस बिल पारित किया था।जिसमें भारतीय दंड संहिता में नई धारा 292 (ए)जोड़ा गया था और दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन किया गया था।

इस बिल के धारा 292 (ए) में कहा गया था कि “कोई घोर अशिष्ट या गंदी अथवा भयादोहन के लिए अशिष्ट तस्वीर अथवा मुद्रित या लिखित दस्तावेज किसी समाचार पत्र में छपाता है अथवा उसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित या वितरित करता है या करवाता है अथवा रखता है या किसी भी रीति से उसे परिचारित करता है तो वह अपराध होगा।”

ऐसा अपराध अनुसंज्ञेय और गैर जमानती अपराध होगा । इसके लिए पहली बार दो वर्ष तक की कैद या अर्थदंड या दोनों हो सकती है। दूसरे बार के अपराध पर अर्थ दंड के साथ पांच वर्ष की कैद या अर्थदंड नहीं देने पर अतिरिक्त कैद का उपबंध इस बिल में किया गया था।

चूकि बिल मूलतः हिंदी में लिखा गया था। इसलिए इसमें उल्लिखित “अशिष्ट और गंदे” शब्दों का अर्थ अंग्रेजी भाषा से ज्यादा व्यापक था। धारा 292(ए) के मामले में अवमानना की परिभाषा को भी दंड प्रक्रिया संहिता(बिहार संशोधन) बिल 1982 के द्वारा व्यापक बना दिया गया था।

इसके तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेटों की भी गिरफ्तारी से लेकर सारी कार्रवाई के अधिकार प्रदान कर दिये गए थे। बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भी भेज दिया गया था।

लेकिन बिहार प्रेस बिल को लेकर मीडिया में उनकी छवि काफी खराब हो रही थी।जिसका आभास स्वयं डॉ मिश्र को भी था। अंततः उन्होंने एक साल के अंदर ही बिल को वापस ले लिया। जबकि बिहार प्रेस बिल राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए लंबित था।

कहा जाता है कि बिहार प्रेस बिल पारित होने को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी काफी खुश थी। लेकिन उन्होंने इस बात का खंडन भी किया था कि प्रेस पर पाबंदी लगाने जैसी बात इस बिल में नहीं है

बिहार प्रेस बिल डॉ जगन्नाथ मिश्र की बड़ी भूल मानी जाती है। इस बिल के पहले मीडिया में डॉ. मिश्र की छवि काफी अच्छी मानी जाती थी। लेकिन डॉ मिश्र ने श्रीमती इंदिरा गाँधी को खुश करने के लिए बिल को लाए थे।

कहा जाता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी और उनकी बहू मेनका गांधी के बीच रिश्ते में खटास बढ़ रही थी। अपने दिल्ली दौरे के दौरान प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से मुलाकात के दौरान मिश्र ने उन्हें उदास देखा तो उन्होंने इस उदासी का कारण जानना चाहा। श्रीमती गांधी अपने और बहू के संबंधों के बारे में प्रकाशित खबरों से आहत थी।

श्रीमती गांधी ने ही डॉ. मिश्र से तमिलनाडु और उड़ीसा जैसे बिल बिहार में भी लाने की बात कह दी। उस समय के सूचना एवं प्रसारण मंत्री वसंत साठे ने इस बिल के बारे में उन्हें पूरी जानकारी दी।

31जूलाई 1982 को डॉ.जगन्नाथ मिश्र ने बिहार विधानसभा में बिहार प्रेस बिल पारित करवाया जिसकी काफी आलोचना हुई। बिहार से लेकर देश भर में इसका विरोध हुआ था।

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