गणतंत्रः लेकिन गण पर हावी है तंत्र

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गणतंत्र सबसे पुराने और जांची परखी हुई शासन प्रणाली है। यह प्राचीन होते हुए भी अपनी कई बेजोड़ खूबियों की वजह से आज भी सबसे लोकप्रिय और विश्वसनीय शासन पद्धति मानी जाती है। गणतंत्र दिवस एक बेहतर अवसर है इस शासन प्रणाली की इन विशेषताओं से रू-ब-रू  होने का।

लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की सबसे मुख्य विशेषता यह है कि लोग शासन के लिए अपने प्रतिनिधि का चुनाव खुद ही करते हैं। इसकी दूसरी विशेषता है कि एक तय अवधि के बाद अपने चुने गए जनप्रतिनिधियों को फिर से चुनने का अधिकार। लोकतंत्र के संबंध में अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की परिभाषा सबसे सटीक है लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन है।

गणतंत्र का सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक प्रमाण हमारे देश में ही मिलता है। ईसा से छह शताब्दी पूर्व महात्मा बुद्ध के समय हमें भारत में 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें से कुछ में राजतंत्र था तो कुछ गणतांत्रिक प्रणाली से शासित होते थे। इसके अलावा दस गणतंत्र भी थे। इनमें से वर्तमान बिहार के इलाके में वैशाली गणतंत्र को सबसे प्राचीन गणतंत्रों में से एक माना जाता है। यहां पर लिच्छवी वंश के लोग शासन संभालते थे।

धीरे-धीरे इन 16 महाजनपदों में से वे महाजनपद ज्यादा ताकतवर होते गए जिनमें राजतंत्र था। दूसरे शब्दों में इनकी साम्राज्य विस्तार की नीति ने धीरे-धीरे सैन्य रूप से कम शक्तिशाली गणतांत्रिक प्रणाली के राज्यों को पराजित कर अपने राज्य राज्य में मिला लिया। खासकर मगध महाजनपद ने धीरे-धीरे कर लगभग सभी जनपदों को समाप्त कर भारत के सबसे बड़े साम्राज्य की नींव रखी।

मगध साम्राज्य ने हर्यक वंश तथा नंद वंश के शासनकाल में अपना विस्तार जारी रखा। नंद वंश के समय चाणक्य का सभा में अपमान किया गया था इससे आहत होकर उन्होंने इसे समाप्त करने की शपथ ली थी। चाणक्य ने चंद्रगुप्त को प्रेरित कर नंद वंश को हटा कर मौर्यवंश को शासन में लाया। इसे चरम पर मौर्य वंश के चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक ने पहुंचाया।

अशोक की सेना ने साम्राज्य विस्तार के क्रम में ही कलिंग के युद्ध में जमकर कत्लेआम किया था। इसके बाद ही अशोक बौद्ध धर्म की शरण में गए और साम्राज्य विस्तार को विराम दिया। अशोक इसलिए भी महान शासकों में गिने जाते हैं कि उन्होंने बड़े साम्राज्य निर्माण के साथ ही बौद्ध धर्म का जमकर प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने अपनी प्रजा की खुशहाली के लिए भी काफी काम किया।

अशोक जैसे विश्व के कई महान शासकों ने अपनी प्रजा के हित में अपनी पूरी ताकत लगाकर काम किया। इसकी वजह से उन्हें अपने समय में जनता का प्यार मिला और वो काफी लोकप्रिय रहे। इसके बावजूद राजतंत्र प्रणाली के दुर्गुणों में से एक पैतृक उत्तराधिकार की वजह से महान राजा के बाद कई कमजोर शासकों को शासन का मौका मिल जाता था। इ

सका दुष्परिणाम लोगों को कई दशकों तक भुगतना पड़ता था। राजतंत्र की प्रणाली अपनी तमाम खूबियों और कमजोरियों के बावजूद पूरे विश्व भर में मध्यकाल तक हावी रही।

आधुनिक युग में लोकतांत्रिक प्रणाली के फिर से उभार में अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम महत्वपूर्ण लैंडमार्क है।  4 जुलाई 1776 को अमेरिका वासियों ने ब्रिटेन के शासन के जुए को उतार फेंका। यहां पर लोकतांत्रिक प्रणाली की सरकार चुनी गई। जार्ज वाशिंगटन पहले राष्ट्रपति चुने गए।

इसके बाद से दुनिया भर के अन्य देशों में राजतंत्र के खिलाफ आवाजें बुलंद होने लगीं। खासकर द्वितीय विश्वयुद्ध में जीत हासिल करने के बावजूद मित्र राष्ट्रों के गुट के ब्रिटेन, फ्रांस,पुर्तगाल और स्पेन जैसे यूरोपीय राष्ट्रों के साम्राज्य के पतन की शुरुआत हो गई। एशिया,अफ्रीका, और दक्षिण अमेरिका के अधिकतर राष्ट्रों में लोकतांत्रिक आंदोलनों ने जोर पकड़ लिया और धीरे-धीरे कर वे इनकी गुलामी से आजाद होने लगे।

भारत को भी लंबे स्वतंत्रता संग्राम के बाद 1947 में ब्रिटेन की दासता से आजादी मिली। इसके बाद हमारे देश ने अपना संविधान बनाकर 26 जनवरी 1950 को राष्ट्र को गणतंत्र घोषित किया।

इस पावन दिवस पर एक बार फिर से गणतंत्र की खूबियों को याद करने की जरूरत है और इसे बचाए रखने के लिए हर तरह के संघर्ष का संकल्प लेने की जरूरत है क्योंकि कई बार लोकतांत्रिक प्रणाली में भी शासन संभाल रहा व्यक्ति सत्ता किसी भी कीमत पर अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहता है। वो आपातकाल जैसा घातक हथियार तक प्रयोग कर लेता है जैसा कि हमारे देश में 1975 में इंदिरा गांधी ने किया था।

हमारी इस प्रणाली के सुचारू रूप से परिचालन के मार्ग में वही कार्यपालिका सबसे बड़ी बाधा बन रही है जिस पर इसकी सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। जिन्हें जनता की सेवा की जिम्मेदारी मिली है वो राजा जमीनदारों सा रवैया अख्तियार कर आम आदमी को कोई तवज्जो नहीं देते। वे भूल जाते हैं कि जनता ने उन्हें सेवा करऩे के लिए अवसर दिया है।

खासकर ब्यूरोक्रेसी का रवैया तो और भी निराशाजनक है। आजादी के 70 साल बाद भी अगर सभी गांवों तक पक्की सड़क और बिजली नहीं पहुंची है तो इसकी जिम्मेदारी तो इनको लेनी होगी। स्वच्छ पेयजल, शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाएं आज भी बड़ी आबादी के लिए दूर की कौड़ी है तो इसका साफ मतलब है की कार्यपालिका असफल रही है। इसका कारण भी कोई छुपा नहीं है।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तो साफ कहा कि जनता के लिए दिए गए एक रुपये में से सिर्फ 15 पैसे ही उन तक पहुंच पाता है यानी 85 पैसे ये कार्यपालिका बीच में ही हजम कर जाती है। आज इतने वर्षों के बाद भी हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है। आज भी राजनेता, नौकरशाही व ठीकेदार का खतरनाक गठजोड़ ही गणतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

यह तंत्र भ्रष्टाचार से मिले बेशुमार पैसे और ताकत के मद में इतना मदहोश रहता है कि आम आदमी की परेशानियों और तकलीफो से निकली फरियाद नकारखाने की तूती साबित होती है। ऐसे में प्रबुद्ध लोगों को गणतंत्र की विशेषता को बचाने की पहल करनी चाहिए।

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