गणतंत्र दिवसः गण का तेजी से बदलता “तंत्र”

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ma लीजिये एक और गणतंत्र दिवस आ गया। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश अपने भारत की इस महान राष्ट्रीय  दिवस की सभी को हार्दिक शुभकामनायें। इसके साथ ही याद आ जाता है स्कूली जीवन के वे दिन, जिसकी यादें आज के दौर में आंखे नम कर देती है। क्या वे दिन थे और आज क्या दिन है। वाकई समय के साथ सब कुछ बदल जाता है। सामने के दृश्य बदल जाते हैं। देखने का नजरिया भी बदल जाता है।

यादें अस्सी के दशक के दिनों की है। मेरा बचपन  नालंदा जिले के एक सुदूरवर्ती  गांव में  बीता। प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई वहीं हुई। तब गांवों में एक अलग मजबूत परंपरा  थी।   पठन-पाठन का अपनी एक समृद्ध संस्कृति थी। हम बच्चों के लिये स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस होली-दशहरा-सरस्वती पूजा जैसे पर पर्वों से कम उत्साह जनक नहीं थे। सर्वत्र उल्लास ही उल्लास।

गणतंत्र दिवस की अहले सुबह गांवों वालों की नींद हम बच्चों के गगनभेदी देशभक्तों के नारों की गुंज से खुलती थी। गांव के आदरणीय बड़े-बूढ़े, मातायें-बहनें, सब के सब हम अल्हड़   परींदों के सत्कार-इंतजार में अपने-अपने दरबाजे-गली में आगे गुजरने तक खड़े रहते थे।  “भारत माता की जय, गणतंत्र दिवस अमर रहे, गांधी जी अमर रहें, राजेन्द्र प्रसाद अमर रहें, बाबा अंबेदकर अमर रहें, भगत सिंह जिंदाबाद, वीर सुभाष जिंदाबाद, आधा रोटी खायेगें-गणतंत्र को कभी न भुलायेगें जैसे दर्जनों नारे  कई गांवों तक तरंगती थी। दूरस्थ स्कूलों के बच्चों की आवाज को सुन हम और भी मदमस्त परिंदे होकर चहचहाने लगते थे। 

मुझे अच्छी तरह याद है कि हाथों में तिरंगा लहराते स्कूल क्षेत्र के 8 गांवो में प्रभात फेरी करने के बाद सब बच्चे स्कूल पहुंचते थे। वहां तरह-तरह के फूल-पतियों से सजे प्रांगण में सब इतठ्ठे हो जाते थे। स्कूल के सभी शिक्षकों के बीच प्राधानाध्यापक रेडियों खोल कर बैठ जाते थे और तब दिल्ली के लालकिले पर निर्धारित 8.00 महामहिम राष्ट्रपति के झंडोत्तोलन का इंतजार करते थे। और ज्योहिं रेडियो पर झंडोत्तोलन का “आंखो देखा हाल” शुरु होता, उसी अनुरुप नियमतः स्कूल में भी झंडोत्तोलन कार्यक्रम चलता। ” वंदे मातरम सुजलाम मलियज शीतलाम……जण गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता….हिंद देश का प्यारा झंडा ऊंचा में लहराये…. ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी…..आदि ” जैसे गीत हम सब एक सुर में गाते थे। उसके बाद स्कूल में हम बच्चों को गांव वालों के चंदा-सहयोग से बने बुंदिया-पुरी खिलाई जाती थी।  उसके बाद सूर्यास्त तक झंडा उतरने तक हम सब बच्चे स्कूल में ही दिन भर जमे रहते थे। इस दौरान स्कूल में गीत-संगीत, कढ़ाई-बुनाई, खेती-बारी, खेल-कूद आदि प्रतियोगिता होते थे और सर्वश्रेष्ठ को पुरस्कार मिलते थे। मैं भी एक गीत प्रायः गाया करता था, जो आज भी गुणगुणाता रहता हूं- ” हम होगें कामयाब एक दिन। मन में पूरा है विश्वास हम होगें….. ”

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हम सब बच्चे घरों से गौ-गोबर लाकर अच्छी तरह से पुताई करते थे। स्कूल के प्रांगण के बागबानी को सजाते-संवारते थे। बांस की झाडियों से लंबे-लंबे कनैल ( बांस की टहनी ) काट कर उसमें झंडा सजाते थे। झंडा प्रायः सादे कागज का बना होता था। उसे खुद बनाते थे और रंगते थे। बीच का अशोक चक्र स्टूमेंट बॉक्स के प्रकाल-पेंसिल से कढ़ते थे। उपर केसरिया और नीचे हरा रंग गांव के बगीचों से ढुंढ कर पतों-फूलों के रस से भरते थे। जिसे लहराने के लिये भोर के इंतजार में रात आंखों में ही कट जाती थी।

आज वह सब नजारा दिखाई नहीं देता। सब कुछ बदल गया है। उसकी कल्पना शहरी जीवन में क्या उस ग्रामीण माहौल में भी देखने को नहीं मिलता  है। लगता है कि गण से तंत्र अलग हो गया है या तंत्र से गण। हाईटेक एजुकेशन के बीच वह मजबूत परंपरा और समृद्ध संस्कृति  लुप्त होती जा रही है। हम न वैसे बच्चे तैयार कर पा रहे हैं और न हीं वैसे शिक्षा व्यवस्था को कायम रख पाये हैं। हर तरफ परिस्थितियों में भारी बदलाब आ गया है। लगता है कि अब लोग गणतंत्र दिवस मनाने का मात्र कोरम पूरा कर रहे हैं।

जीवन का अनुभव ज्यों-ज्यों बढ़ता जा रहा है, बदलाव उतनी तेजी से देखने को मिल रहा है। गण के तंत्र को आज मुठ्ठी भर लोगों ने जकड़ लिया है। इसकी जकड़न का अनुभव बीते साल-2012 में प्रत्यक्ष तौर हुआ। जब  संविधान में आम नागरिक को प्राप्त  ” वाक्य औऱ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ” के बदले सत्ता-कॉरपोरेट-मीडिया-ब्यूरोक्रेट्स के तंत्र ने  मुझ जैसे एक आम गण को  जबरन “खास अपराधी” बना कर जेल भेज दिया। इसकी एक मात्र वजह यही है कि ये तंत्र में  गांव के सुसंस्कृत बच्चे बड़े नहीं हुये हैं , अपितु कॉरपोरेट घरानों में पैसों की विस्तर पर जन्में-पले-पढ़े-बढ़े स्टूडेंट हैं और तंत्र में ये सब कुछ  पैसे की आंख से नवधनाठ्यों  ही अधिक  देखते हैं। उनकी नजर में देश-धर्म-नैतिकता आदि कोई मायने नहीं रखते

वेशक जरुरी है आम गण के लिये तंत्र की अकड़न ठीक करने की। वरना गणतंत्र का तेजी से बदलता यह स्वरुप आम लोगों को जल्द ही गुलामी से भी वद्दतर स्थिति में पहुंचा देगा।   फिर भी एक उम्मीद की किरण लिये…    जय मां भारती। तुझे सलाम।

.……………आपका मुकेश भारतीय

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