केजरीवालः व्यवस्था बदलने की जिद में छोड़ी सत्ता

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भ्रष्टाचार के खात्मे का प्रण लेकर दिल्ली की सियासत का चेहरा बदलने निकले अरविंद केजरीवाल ने जिस धमाकेदार ढंग से सत्ता के गलियारों तक राह बनाई थी, उसी आतिशी अंदाज में केवल सात सप्ताह में  मुख्यमंत्री का ताज उतार दिया।

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जन लोकपाल विधेयक को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा था। उप राज्यपाल नजीब जंग ने दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष से कहा कि वह विधेयक को पेश करने की इजाजत न दें और कांग्रेस एवं भाजपा तो पहले से ही इसके खिलाफ थीं, लिहाजा केजरीवाल अपने कौल पर खरे उतरे और अपनी इस धमकी को हकीकत में बदल दिया कि अगर उनके प्रस्तावित विधेयक को शुरुआती दौर में बाधाओं का सामना करना पड़ा तो वह इस्तीफा दे देंगे।

राजनीति के वैकल्पिक ब्रांड के प्रतीक के रूप में उभरे 45 वर्षीय केजरीवाल ने इंजीनियर से लोकसेवक बनने के बाद राजनीति का रास्ता पकड़ा और आम आदमी पार्टी का गठन करने के एक साल के भीतर दिसंबर के विधानसभा चुनाव में 15 साल से दिल्ली की सत्ता पर डटी कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

 रामलीला मैदान में अपनी केबिनेट के साथ शपथ ग्रहण करके केजरीवाल ने देश में एक नई तरह की राजनीति की आहट का एहसास कराया था और मुख्यमंत्री बनने के दूसरे पखवाड़े में ही संसद भवन के निकट धरने पर बैठकर केंद्र सरकार के किले पर चढ़ाई कर दी। वह अपराधियों के खिलाफ कथित रूप से कार्रवाई न करने वाले तीन पुलिस अधिकारियों का निलंबन चाहते थे। इस दौरान राजकाज के उनके तरीके पर भी उंगलियां उठाई गईं।

केजरीवाल ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को खुले मैदान में चुनौती दी और ‘आप’ के एजेंडे में आम आदमी के हितों को केंद्र में रखकर उन्होंने दिल्ली के राजनीतिक और चुनावी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया, जब आप ने विधानसभा चुनाव में 28 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर कांग्रेस के बाहरी सहयोग से 28 दिसंबर को सरकार बना डाली।

उन्होंने जिस विश्वास के साथ तीन बार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के खिलाफ मोर्चा संभालकर अपनी सफलता के झंडे गाड़े, उसी शान से भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम में आड़े आने वाले नेताओं, मंत्रियों और उद्योगपतियों को आने वाले बुरे दिनों का आभास दे दिया।

देश के राजनैतिक क्षितिज पर नए सितारे की तरह उभरकर आम आदमी पार्टी बनाने के एक वर्ष के भीतर पहली बार में चुनावी मैदान में सफलता हासिल कर लेने वाले केजरीवाल चेहरे मोहरे से वास्तव में आम आदमी की छवि को साकार करते हैं। उन्हें देखकर कहीं यह महसूस नहीं होता कि विनम्र वाणी और सादा हावभाव वाला यह शख्स दिल्ली की सियासत का चेहरा बदलने की कुव्वत रखता है। (एनडीटीवी)

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