कुछ तो शर्म करो ‘बाप-राज’ के पुलिस वाले

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राजनामा.कॉम (मुकेश भारतीय)।  पुलिस लोगों से जन सहयोग की अपील करती है। लेकिन वह ये भूल जाती है कि लोग पालतु जानवरों से लगाव रख सकते हैं लेकिन जंगली पशुओं से नहीं। आज समाज में पुलिस के जिस तरह के व्यवहार सामने आ रहे हैं,वह गुंडों की करतूतों से भी खतरनाक है।

सबसे बड़ी बात कि  उसका यह घिनौना खेल देश के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी (आइपीएस और आइएएस) की जानकारी में सत्ता-तंत्र के संरक्षण में हो रहा है। यह बात किसी से भी छुपी हुई नहीं है। सब सिर्फ माफियाओं-दलालों की हड्डियां चबाने में लगे हैं।

अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि अदालतों में बैठे माननीय जजों की फौज भी अपने आंखों के सामने हो रहे कानून के साथ पुलिसिया बलात्कार को कहीं अधिक मौन सहमति ही देते दिखते हैं।

jail_jan_andolanउत्तर प्रदेश प्रांत के बरेली में बड़ा बाईपास के मसले को लेकर किसान आंदोलित हैं। उन किसानों को भड़काने के आरोप में रुहेलखंड यूनिवर्सिटि के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफसर डॉ. इसरार खान पुलिस ने गिरफ्तार किया और उन्हें रस्सियों में बांध कर जज के सामने पेश किया। मानो प्रोफेसर खान कोई चोर, उच्चके या उग्रवादी, आतंकवादी,या कुख्यात क्रिमिनल हों।

क्या समाजवादी आंदोलन की उपज सपा नेता मुलायम सिंह यादव के दुलारे बेटे अखिलेश सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में जंगल राज बना रखा है या बंदर के हाथ में नारियल वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। क्योंकि उनके शासन के दौरान पुलिस की जाहिलता व गुंडागर्दी के मामले दिन दूगनी और रात चौगुनी रफ्तार में सामने आ रहे हैं।

जाहिर है कि रुहेलखंड यूनिवर्सिटि के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफसर डॉ. इसरार खान भी जनता के बीच से आते हैं और इस हैसियत से उनका किसानों, मजदूरों, गरीबों की समस्याओं, दिक्कतों, आंदोलनों में शरीक होना लाजमि है।

ऐसे में किसी आंदोलनकारी या उसके समर्थक के साथ कानूनी प्रावधान से इतर पुलिस का पशुवत व्यवहार का कड़ा प्रतिकार होना चाहिये।

अदालतों में बैठे माननीय जजों को भी ऐसा नहीं हैं  कि वे कोदो रचकर न्याय की कुर्सी पर बैठे हैं। रस्सी में बंधे आरोपी या आसपास हो रहे घटनाओं से वाकिफ होते हैं।

फिर भी वे पुलिस की गलत और वेतुकी धाराओं पर विचार किये बिना सीधे जेल भेज कर पुलिस का मनोबल बढ़ाने के  ही कार्य करते देखे जा रहे हैं। 

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