और संजय सहाय ‘हंस’ के संपादक बन गये

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जयप्रकाश नारायन की शिष्यों मे एक थी सुशीला सहाय । दयानंद सहाय के साथ उनका विवाह जयप्रकाश नारायन की इच्छा से हुआ था। सुशीला सहाय एक समाजवादी सोच की महिला थी जबकि दयानंद सहाय पूर्णत: व्यवसायिक सोच के। जयप्रकाश नारायन की नजदीकी और शादी के बाद आये पैसे ने दयानंद सहाय को राजनीति मे पांव जमाने में मदद की।

वैसे कहा तो यह जाता है कि दयानंद सहाय के पास दलाई लामा का दिया हुआ धन था जिसकी बदौलत वे आगे बढे। जुगाड की राजनीति के माहिर दयानंद सहाय दौलत की बदौलत राज्यसभा मे पहुंचते रहे। जब दौलत आ जाती है तब बहुत सारी खामियां ढक जाती है।

दयानंद सहाय ने रेलवे के लाईन पर बिछानेवाले सिमेंट के स्लीपर की फ़ैक्टरी लगाई, दौलत मे इजाफ़ा होने लगा । उनके पुत्र है संजय सहाय। कला एवं साहित्य अक्सर धनकुबेरो के लिये खुद को प्रतिष्ठित करने या समाज मे स्थापित करने का माध्यम साबित हुआ है भले ही उनके नाम पर छपनेवाली पुस्तक कोई गरीब फ़क्कड क्यो न लिखे।

संजय सहाय के यहां देश के मानिंदा साहित्यकार, ले्खक, फ़िल्मकारो का जमावडा लगने लगा , लगे भी क्यो न आखिर मुफ़्त मे उम्दा किस्म की शराब, लजीज भोजन और मस्ती के लिये पंचसितारा व्यवस्था , सर्वहारा के लिये कलम की स्याही सुखानेवालो को इससे अच्छी व्यवस्था कहां मिल सकती है । संजय सहाय के दो चेहरे है। एक जो खुद को बुद्धिजिवी दिखाने के लिये उपयोग करते है , दुसरा जिसका उपयोग अपने व्यवसाय की रक्षा , दुश्मनो को रास्ते से हटाने के लिये करते है जिसके बारे मे कलम के बहादुर जानते हुये भी नही लिखेंगें।

संजय सहाय जी के पिता दयानंद सहाय की दुर्घटना मे मौत हो गई। अपना कोई राजनितिक कद था नही , एक बार कांग्रेस ने टिकट दिया अच्छा-खासा वोट आया परन्तु इनके आंतरिक ग्रूप के लोगो के कारण वोट कम मिला । शहर के अधिकांश अपराधी इनके साथ थे , इनके कार्यालय मे जमे रहते थे। संजय सहाय जब अपनी स्लीपर फ़ैक्टरी का जिम्मा संभाले हुये थे , उस समय वहां मजदूर संगठन ने अपनी कुछ मांगो के लिये हड़ताल कर दी। उस संगठन के नेता की हत्या के लिये संजय सहाय ने अपने खासमखास लोगो को जिन्हे ये अमेरिका तक घुमा चुके है लगाया , हमला भी हुआ , वह बच गया ।

संजय सहाय का नाम भी नही आया । आजतक लोगो को नही पता है। यह है संजय सहाय जी कि असली सुरत। संजय सहाय जब प्रत्यक्ष चुनाव नही जीत पायें तो उन्होने पिछला दरवाजा चुना और राज्यसभा की तैयारी करने लगे। राजेन्द्र यादव हंस के संपादक रहे। अच्छे साहित्यकार , बहुत सारी पुस्तके लिखी . ।लेकिन आज उनकी पहचान हंस के संपादक के रुप मे है। . उपन्यास सम्राट प्रेमचंद द्वारा स्थापित और संपादित हंस अपने समय की अत्यन्त महत्वपूर्ण पत्रिका रही है। महात्मा गांधी और कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी दो वर्ष तक हंस के सम्पादक मंडल में रहे।

मुंशी प्रेमचंद की मृत्यु के बाद हंस का संपादन उनके पुत्र प्रसिद्ध कथाकार अमृतराय ने किया। इधर अनेक वर्षों से हंस का प्रकाशन बंद था। वर्ष १९८६ मे राजेन्द्र यादव ने हंस को पुन: शुरु किया । प्रेमचंद का नाम जुडा होने का लाभ मिला। पत्रिका को पहचान की जरुरत नही पडी साथ हीं साथ रा्जेन्द्र यादव की भी पहचान बढी। संजय सहाय के मित्रो मे थे राजेन्द्र यादव। दोनो को एक दुजे की जरुरत थी।

राजेन्द्र यादव को पैसा चाहिये था और संजय सहाय को साहित्यजगत मे स्थान ताकि राज्यसभा मे पहुचने का रास्ता निकले। सौदा तय हो गया । राजेन्द्र यादव ने दसियो लाख कमा लिये और संजय सहाय हंस के संपादक बन गये। यहि है किस्सा जिसको सुनना चाहते थे मेरे फ़ेसबुक मित्रगण।

madan

…… वरिष्ठ अधिवक्ता पत्रकार मदन तिवारी जी अपने फेसबुक वाल पर

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