…..और यूं 4 माह बाद जेल से बाहर निकले पत्रकार वीरेंद्र मंडल व उनके पिता

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“वीरेंद्र जैसे ही मंडल कारा से बाहर निकला, उसकी आंखों में खुशी के आंसू साफ देखे गए। अपने परिवार वालों से 4 महीनों के बाद मिलकर काफी खुश दिख रहा था। जैसे ही वीरेंद्र और उनके पिता गांव बनकटी पहुंचे तो वहां का माहौल बेहद ही बदला बदला नजर आ रहा था हर ओर लोग घरों के चौखट पर खड़े होकर निर्दोष पिता-पुत्र को बस टकटकी लगाए घूरते नजर आ रहे थे…”

राजनामा.कॉम। सरायकेला खरसावां जिला के राजनगर थाना अंतर्गत बनकाटी गांव के चर्चित मुखिया पत्रकार प्रकरण में आज पत्रकार वीरेंद्र मंडल और उनके पिता रामपद मंडल जमानत पर रिहा होकर अपने गांव पहुंच गए हैं।

वहीं गांव पहुंचते ही ग्रामीणों में खुशी का माहौल देखा गया। इधर आज सुबह जैसे ही ग्रामीणों को यह सूचना मिली कि आज विरेंद्र जमानत पर रिहा होने वाला है, सुबह से ही ग्रामीण और उसके पत्रकार साथी सराइकेला न्यायालय पहुंचने लगे। जैसे ही जमानत की प्रक्रिया पूरी हुई सभी उसे लेने मंडल कारा पहुंचे।

इस दौरान वीरेंद्र ने बताया कि बेगुनाही साबित करुंगा या जेल जाऊंगा लेकिन सच्चाई का दामन नहीं छोडूंगा। मैंने गुनाह नहीं किया है मतलब नहीं किया है। आगे कलम की लड़ाई जारी रखने की बात कही है।

वीरेंद्र ने बताया कि सरायकेला खरसावां जिला पुलिस प्रशासन ने मेरे साथ जो अमानवीय बर्ताव किए हैं एक एक पल का हिसाब कानून सम्मत तरीके से लूंगा। उसने बताया कि अपने मिथ्या सनक और झूठ को सच साबित करने के बदले पुलिस ने मेरे पूरे करियर को तबाह कर दिया है।

वीरेंद्र ने बताया कि पुलिस के इस करतूत के पीछे स्थानीय पत्रकारों ने भी भरपूर साथ दिया है पत्रकारों के खिलाफ नाराजगी प्रकट करते हुए वीरेंद्र ने कहा उनका भी हिसाब होगा। इधर मुखिया के साथ हुए विवाद को वीरेंद्र ने साजिश बताया और कहा मुखिया तो एक मोहरा है असली गुनाहगार के खिलाफ कानूनी लड़ाई अब लड़ूंगा।

वीरेंद्र ने बताया जिस गुनाह को कबूल करने के लिए पुलिस ने चार दिनों तक सितम किया उसके असली मुजरिमों से जेल में मिलकर खूब रोया।

गौरतलब है कि साल 2017 के नवम्बर महीने में राजनगर थाना इलाके के एक प्रज्ञा में लूट की घटना हुई थी। जिसमें शक के आधार पर राजनगर थाना पुलिस ने वीरेंद्र मंडल को उठाया था और अलग-अलग जगहों पर ले जाकर जुर्म कबूल करने के लिए बाध्य करते हुए जमकर अमानवीय बर्ताव किया था।

जो सिद्ध नहीं होने पर गम्भीर अवस्था में रात के 12 बजे उसके घर के पास फेंक कर छोड़ दिया था। जिसके बाद पुलिस की किरकिरी हुई थी और फिर एसपी ने तत्कालीन थाना प्रभारी विजय प्रकाश सिन्हा को निलंबित कर दिया था।

बाद में मामले के सभी पांच अपराधी गिरफ्तार हुए और जेल भी गए हैं, जिसमे दो अभी भी सरायकेला जेल में बंद है, जिससे मिलकर वीरेंद्र खूब रोया। मामले का एक अभियुक्त चाईबासा जेल में है। जबकि दो जमानत पर रिहा हो चुका है।

भारी पड़ा वीरेंद्र को पुलिस के खिलाफ लड़ाईः इधर अपने ऊपर हुए अत्याचार के खिलाफ वीरेंद्र ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में तत्कालीन डीएसपी हेडक्वार्टर 1 दीपक कुमार, तत्कालीन थाना प्रभारी विजय प्रकाश सिन्हा और एक निलंबित एएसआई मनोज कुमार सिंह के खिलाफ मामला दर्ज कराया था।

जहां राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उच्च स्तरीय जांच करा कर मामले को सही पाया था और झारखंड सरकार के सचिव को आदेश देते हुए मामले से जुड़े सभी दोषी पुलिस कर्मियों एवं पदाधिकारियों पर कठोर कार्रवाई करते हुए ₹2 लाख बतौर मुआवजा देने को कहा था। लेकिन आयोग के आदेश की कॉपी को झारखंड सरकार और सरायकेला प्रशासन ने दबा दिया।

मुखिया को मोहरा बनाकर झूठे मुकदमे में यूं फंसा पुलिस ने निकाली खुन्नसः इधर वीरेंद्र मंडल के गांव बनकाटी में मुखिया सावित्री मुर्मू द्वारा बनाए गए एक सड़क का ग्रामीण विरोध कर रहे थे।

जिसका न्यूज़ कवरेज करने के दौरान मुखिया सावित्री मुर्मू एवं उसके पति ने मुखिया प्रतिनिधि नेमबती महतो और उनके पति नरे राम महतो ने पहले तो पत्रकार वीरेंद्र मंडल के पिता राम पद मंडल की जमकर लाठी डंडे से पिटाई कर डाली। वहीं बीच-बचाव करने गए वीरेंद्र के साथ भी उलझ गए।

इधर वीरेंद्र ने सबसे पहले पूरे मामले से राजनगर थाना को अवगत कराया, लेकिन देर शाम तक थाने में ऐसी खिचड़ी पकी कि एससी एसटी एक्ट के तहत उल्टा वीरेंद्र के खिलाफ मामला दर्ज कर दिया गया और फिर 7 दिसंबर 2018 को उसके पिता के साथ गिरफ्तार कर आनन-फानन में जेल भेज दिया गया।

इस पूरे प्रकरण का ग्रामीण पुरजोर विरोध करते रहे, लेकिन प्रशासन ने ग्रामीणों की एक ना सुनी और एकतरफा कार्रवाई करते हुए वीरेंद्र और उसके पिता को जेल भेज दिया।

यहां तक कि सरायकेला प्रशासन ने मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेश को भी धत्ता बताते हुए मामले का निष्पक्ष जांच करना मुनासिब नहीं समझा और एकतरफा कार्रवाई की।

इधर ग्रामीणों ने पूरे गांव में बैनर पोस्टर लगाकर मुखिया और पुलिस प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताई थी। यहां तक कि आज भी मुखिया को ग्रामीण गांव में प्रवेश करने नहीं देते हैं ना ही मुखिया के द्वारा आयोजित किसी  कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं।

पत्रकारों के गिरोह ने पुलिस के जाल में फंसाया मुखिया और मुझको: वीरेंद्र

वीरेंद्र ने बताया कि पूरे मामले में स्थानीय पत्रकारों ने पुलिस के साथ मिलकर मुखिया को मोहरा बनाया और मुझे झूठे मुकदमे में फंसा कर जेल भेजने का काम किया।

वीरेंद्र ने बताया कि जिस दिन पुलिस उसे गिरफ्तार करने आई थी उस दिन स्थानीय पत्रकार शंकर गुप्ता उसे फोन पर ट्रैप किया और लोकेशन पुलिस को दिया। जिसके बाद पुलिस उसके गांव पहुंची और नाश्ता करने के दौरान उसे उठाकर थाना ले गई और उसके साथ मारपीट भी की।

वीरेंद्र ने बताया कि उसे अपनी बात कहने तक का मौका पुलिस ने नहीं दिया। उसने बताया कि थाना प्रभारी ने धमकी भरे लहजे में कहा हम सुधर जाएंगे या राजनगर इलाके को सुधार देंगे तुम्हें काफी दिनों से ढूंढ रहे थे।

गिरफ्तारी के वक्त जप्त समान नहीं लौटाया न ही परिवारवालों को दियाः वीरेंद्र ने बताया कि गिरफ्तारी के समय उसके पास 5 हजार नगदी के अलावे ओरिजिनल पैन कार्ड, आधार कार्ड, एटीएम कार्ड, गाड़ी का इंश्योरेंस पेपर, जिस न्यूज़ चैनल में काम करता था, उसका आईडी प्रूफ व अन्य दस्तावेज था। उस वक्त पुलिस ने जप्त कर लिया था, लेकिन जब्ती की सूची नहीं तैयार की थी।

वहीं रिहा होने के बाद जब वीरेंद्र ने राजनगर थाना प्रभारी को फोन कर जप्त सामानों के विषय में जानकारी लिया तो थाना प्रभारी ने बताया कि जांच के आईओ को सौंप दिया गया है।

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