एग्जिट पोल पर बिना रोक निष्पक्ष चुनाव बेईमानी

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वेशक लोकतंत्र में सुधार केवल सरकार, सत्ता और राजनीति में बदलाव से नहीं आएगा। लोकतंत्र के एक और स्तंभ यानी मीडिया में सुधार का एक मौका दुसरो को देता है।  खुद अपने पर उठे सवालों पर कन्नी काटता है। आखिर इन ‘स्वतंत्र’ मीडिया पर पिछले दरवाज़े से कब्ज़ा किनका है ?

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सच पुछिये तो ‘स्वतंत्र’ मीडिया पर कब्ज़ा राजनेताओ या पूंजीपतियों का है।  कई आर्थिक अख़बारों ने कंपनियों के हक़ में ख़बरें छापने के बाक़ायदा लिखित क़रार कर रखे हैं।

दूसरी तरफ तमाम राज्य सरकारें अख़बारों पर न्यूज़प्रिंट, विज्ञापन और प्रलोभन के ज़रिए दबाव बनाती हैं।  प्रत्येक चुनाव अनेक अख़बारों ने चुनाव में पार्टियों और उम्मीदवारों के पक्ष में खबरें छापने के दाम वसूले जाते हैं।

यह दाम विज्ञापन के नाम पर होती है, जो उम्मीदवार ज्यादा विज्ञापन देता है।  अख़बार की नजर में चुनाव प्रतियोगिता में आगे दिखाया जाता है।

पिछले लोकसभा चुनाव में कई संस्थागत पहलू का ख़ुलासा हुआ, जिसमे भाजपा द्वारा एक विज्ञापन एजेंसी के मार्फ़त १०००० करोड़ रूपये की लागत खर्च से चुनाव प्रचार कराया गया। जिसमें प्रिंट मिडिया ,सोशल मिडिया और कई संस्थागत मिडिया शामिल थे।

 इस तरह भाजपा और मिडिया की सांठ गांठ ने भ्रष्ट्राचार को जन्म दिया। आने वाले दिन भयावक होगें। क्योंकि किसी भी छोटी पार्टी या क्षेत्रीय पार्टी को अब मिडिया और प्रचार प्रसार के लिए करोड़ो का बजट अलग से बनाना पड़ेगा।

चुनाव आयोग भी धृषराष्ट्र है ,इन्हे राष्ट्रीय पार्टी पर प्रचार प्रसार के नाम पर खर्च दिखाई नहीं देती। आयोग को स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव का ढिढोरा नहीं पीटना चाहिए।

स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव तभी संभव है, जब किसी भी पार्टी के प्रचार प्रसार का खर्च को समानुपाती दर से उन सभी उम्मीदवार के खर्च में जोड़ना चाहिए, जिसे अमुक पार्टी ने खर्च किये हो। इस तरह मीडिया और पूँजी के इस नापाक रिश्ते पर कुछ बंदिशे लगनी जरूरी हैं!

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