एक बड़े फर्जीबाड़े की उपज है रांची प्रेस क्लब या द रांची प्रेस क्लब !

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राजनामा.कॉम। रांची प्रेस क्लब या द रांची प्रेस क्लब? दोनों में से कोई भी हो। इसमें बहुत ही गड़बड़झाला है। उक्त कथित संस्था के निबंधन के समय से लेकर आज तक यही हो रहा है। जो कि एक पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित बलबीर दत्त सरीखे संपादक से लेकर कथित संस्था से जुड़े अन्य सभी पत्रकार सदस्यों  के साथ बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है।

एक आरटीआई के जरिये राजनामा.कॉम के पास जो अधिकारिक कागजात उपलब्ध कराये गये हैं, उसके मुताबिक संस्था के रहनुमाओं और निबंधक की मिलीभगत से एक बड़ा फर्जीबाड़ा किया गया है।

संस्था निबंधन के प्रक्रियाओं का प्रावधानानुसार कहीं भी पालन नहीं हुआ है। सारे कागजातों की पड़ताल से साफ स्पष्ट होता है कि निबंधन में जहां यह स्पष्ट नहीं है कि कथित संस्था रांची प्रेस क्लब है या द रांची प्रेस क्लब। उसका पता जो दिया गया है, तब वह वजूद में ही नहीं था।

निबंधन प्रक्रियाओं के अनुसार कथित संस्था का आवेदन के साथ पता प्रमाण पत्र संलग्न होना आवश्यक है लेकिन, इस संबंध में ऐसा कोई दस्तावेज सलंग्न नहीं किया गया।

अध्यक्ष के वोटर आइडी और एक आम सदस्य पत्रकार को छोड़ कर किसी भी पदाधिकारी या सदस्य का कोई पहचान पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया।

 यही नहीं कथित संस्था के आवेदकों की ओर से जो नियमावली संलग्न किये गये हैं, उसी का पालन करते नजर नहीं आये।

दो अलग-अलग संलग्न दस्तावेज में जिन्हें उपाध्यक्ष बनाया गया है, वे समाजसेवा से आते हैं। जबकि संस्था निबंधन अधिनियम (21)1860 के तहत कथित संस्था का अभिप्राय पत्रकार एवं पत्रकारिता संबंधित कार्यों को बढ़ावा देना और संस्था की सदस्यता की शर्तें, जो पत्रकारिता से जुड़े हो बताया गया है।

सबसे रोचक तत्थ यह है कि कथित संस्था की कार्यकारिणी के कुल सात सदस्यों, जिनकी कार्यकाल 2 साल बताई गई, उन्हीं सदस्यों को 11 आकांक्षी सदस्यों की सूची में भी रख प्रस्तुत किया गया है।

रांची प्रेस क्लब या द रांची प्रेस क्लब नामक संस्था के कर्ताओं के साथ रांची निबंधन कार्यालय की मिलीभगत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सारी प्रक्रिया एक ही तिथि को पूरी कर दी जाती है।

कथित संस्था के महासचिव के द्वारा कागजात जमा कर संस्था निबंधन के अनुरोध आवेदन के एक माह पूर्व ही संस्था का प्रमाण पत्र निर्गत हो जाना अपने आप में अजूबा मामला है।

राजनामा.कॉम के पास उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार कथित संस्था से जुड़ी ऐसे कई रहस्य छुपे हैं, जिसकी जानकारी आप सुधी पाठकों के सामने रखी जायेगी। ताकि आप यह समझ सकें कि मीडिया के अंदरुनी मठाधीश किस तरह के कारनामें करते हैं और व्यवस्था में कैसे खुद की कमीज को सबसे अधिक सफेद होने की ढिढोंरे पीटते कोई शर्म महसूस नहीं करते।

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