एक खलनायक ही फिल्म का असली हीरो होता हैः प्रमोद माउथो

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pramod-muthuअपनी खलनायिकी से परदे की दुनिया के नक्षत्र बने कलाकारों की पंक्ति में रोशी महंत के किरदार से बड़े परदे पर  सफल हुए प्रमोद माउथो आज के खलनायकों की पंक्ति में अग्रगण्य हैं। उनके अदाकारी के सफर में कई विविध मोड़ भी आए, मगर उन्होंने अपने आत्मविश्वास और मेहनत-लगन से हर लहर से मुकाबला किया।   प्रस्तुत है……… प्रमोद माउथो के फिल्मी सफर के बारे में  अनिल शर्मा से सीधी बातचीत के अंशः

 बरसों हो गए आपको अदाकारी में इस सफर में आपने क्या अनुभव और उतार-चढ़ाव महसूस किया ?

प्रमोदः   मेरे सफर की शुरूआत स्टेज आर्टिस्ट से हुई। स्टेज तो एनजेएसए गवर्मेंट कालेज कपूरथला से ही शुरू हो गया था। फ्री लांसर के रूप में पंजाब और दिल्ली में स्टेज किए। उसके बाद मुंबई शिफ्ट हुआ और यहां कुछ फिल्मों में रोल किए। उसके बाद खलनायक में  रोशी महंत के किरदार को जीवंत किया,जिसे खूब कामयाबी मिली। एक दौर था संघर्ष का जब एक छोटे से रोल के लिए काफी मेहनत करना पड़ती थी। अपनी पहचान बनाने के लिए और कामयाबी के लिए जो संघर्ष किया उसका कोई हिसाब नहीं। एक दौर था पारसी थियेटर और पारसी छाप फिल्मों का। उसके बाद समानान्तर फिल्में। एक्शन फिल्मों का दौर आया…।

pramod muthuआपका इस बारे में क्या ख्याल और अनुभव रहा है। उस दौर के कलाकारों में और आज के कलाकारों में क्या फर्क महसूस करते हैं ?

प्रमोद:   उस दौर के सिनेमा से लेकर आज तक के सिनेमा तक काफी उतार-चढ़ाव आए हैं। उस दौर में जहां टेक्निकल इतना ईजाद नहीं थी, वहीं लोगों के दिल एक-दूसरे से जुड़े थे। कोऑपरेटिव सिस्टम कुछ ज्यादा ही था। यह नहीं कहता कि आज ऐसा नहीं है, लेकिन आज इसका असर कम होता जा रहा है। पारसी थियेटर और फिल्म के दौर में मेरा दौर शुरूआती दौर था। उस दौर में की गई मेहनत आज रंग ला रही है।

आपने बतौर खलनायक लगभग सौ से भी ज्यादा फिल्में की हैं,इनमें आपको सबसे ज्यादा किस फिल्म के किरदार ने आकर्षित किया है और आप किस फिल्म के किस किरदार को सर्वश्रेष्ठ  मानते हैं ?  

pramodप्रमोदः (हंसते हुए) क्या बताऊं। जितने भी खलनायिकी के किरदार किए हैं, किसी एक को खास कहना बड़ा मुश्किल होता है। एक कलाकार के लिए तो अपने किरदारों में से किसी एक को खास कहना बड़ा मुश्किल होता है। हां ये बात है कि जब दर्शकों का उस किरदार को  लेकर तालियां या गालियां मिलती हैं तो बड़ी खुशी होती है कलाकार को यह जान कर कि दशर्शकों ने उसे कितना पसंद किया। फिर भी पर्सनली मैं चाहता हूं कि एक बार फिर खलनायक का किरदार दोहाराया जा सके।

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आपकी फिल्मों से तो अधिकांश दर्शक वाकिफ हैं, प्लीज अपने स्टेज और टीवी सीरियल्स के बारे में कुछ बताएं ?

प्रमोदः  शुरूआत तो मेरी स्टेज से हुई उसके बाद टीवी सीरियल्स भी किए। पंजाबी सीरियल सुपने ते परचावान, बुनियाद, बेबसी, जूनियर जी (2001-03), अदालत(2010), रब से सोना इश्क(2012-13) के साथ ही थियेटर में हेवर्स ऑफ कोल, क्या नंबर बदलेगा, छतरियां, नायक कथा, शुतुरमुर्ग सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक।

उस दौर के खलनायकों के मुकाबिल आपका स्थान कहां है ?

प्रमोदः  भाई, यह तो बड़ा सीरियस सबाल है। हां ये जरूर कहूंगा कि उस दौर के खलनायकों की मेहनत और लगन को मैं सलाम करता हूं। जहां तक उनसे मुकाबले का सवाल है तो ऐसी हिम्मत मुझमें नहीं है। जाहिर है कि मेरा स्थान उनकी पंक्ति के बाद ही हासिल होता है।

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कुछ फिल्मों में आपने पोजिटिव कैरेक्टर रोल किए हैं…आपके निगेटिव और पाजिटिव रोल पर फैमिली मेम्बर्स की क्या प्रतिक्रिया होती है ?

प्रमोदः  भाई, वही होती है जो दर्शकों की होती है। अच्छा काम परदे पर देखते हैं तो वेरी गुड बोलते हैं और बुरे काम पर गालियां तो नहीं देते, मगर वेरी बैड जरूर कह देते हैं। वैसे फैमिली मेम्बर्स जानते हैं कि एक कलाकार को अच्छे और बुरे रोल दोनों करने होते हैं। जहां तक मेरा मानना है कि एक खलनायक ही असली हीरो होता है। सारी कहानी उसकी मेहनत पर निर्भर होती है।

 

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