एक उलगुलान की बेचैनी है आजाद सिपाही !

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आजाद सिपाही : कलम अब बोलेगी

वह 1989 का अक्टूबर का महीना था, जब मैंने रांची की सरजमीं पर कदम रखा। ललक थी उलगुलान के नायक भगवान बिरसा की रत्नगर्भा धरती को करीब से देखने की। चाहत थी यहां के जंगल-पहाड़ों-झरनों की धड़कनों से खुद को जोड़ने की। माद्दा था पत्रकारिता में कुछ नया करने का। नमन है इस धरती को, जिसने मुझे कर्म का असली मर्म समझने की क्षमता दी। मेरी इस कर्मभूमि ने मुझे आत्मविश्वास, साहस और हौसले की जो पूंजी मुझे सौंपी है, वही मेरा एकमात्र संबल है।

harinarayan singhमुझे तब प्रभात खबर में अवसर मिला था। संघर्ष और जद्दोजहद के बीच यहां 11 साल मैंने गुजारे। तरह-तरह के अनुभवों के बीच तपते हुए मैंने सच का सफेद रंग भी देखा तो कई स्याह चेहरों से भी मे्रा साक्षात्कार हुआ।

वर्ष 2000 जून में हिन्दुस्तान रांची के साथ नई पारी शुरू की। यहां नौ साल, इसके बाद टीवी चैनल न्यूज इलेवन, छह महीने सन्मार्ग और लगभग दो साल (1 जुलाई, 2012 से 16 नवंबर 2014) तक खबर मन्त्र में रहने के बाद पिछले नौ महीनों से मैं आजाद हूं। इन तमाम जगहों पर काम करते हुए कई दफा, किसी न किसी स्तर पर जाकर कुछ ऐसी मजबूरियों का सामना करना पड़ा, जब भीतर का पत्रकार तड़फड़ाकर रह गया। कलम की धार कहीं न कहीं अवरोध झेलती रही और एक टीस कहीं न कहीं मौजूद रही मेरे भीतर आजाद होने की।

मुझे संतोष है कि 25 साल के बाद मैं उस पड़ाव पर हूं, जब खुद को पूरी तरह आजाद महसूस कर रहा हूं। मेरा मानना है कि इस आजादी के साथ पत्रकारिता की जिस नई राह पर अब मैंने अपना कदम बढ़ाया है, वहां न तो पूंजी का दबाव है, न सत्ता के लिए समझौते हैं, न ही कॉरपोरेट की मजबूरियां।

मुझे यकीन है कि पहली बार मेरी कलम पूरी तरह आजाद होकर बोलेगी। यह न रुकेगी, न झुकेगी। आजाद सिपाही मेरी इसी ललक की अभिव्यक्ति बनेगा, इसका पूर्ण विश्वास है। मैं सफल कितना होऊंगा, इसका आंकलन बेशक आप करेंगे। मैं तो आजाद सिपाही बनकर सिर्फ कुछ संकल्प कर रहा हूं।

संकल्प यह कि यह कलम अखबार के मालिक को कोल ब्लॉक दिलाने के लिए नहीं चलेगी। संकल्प यह कि यह सत्ता की किसी कुर्सी पर विराजमान होने की किसी की चाहत का माध्यम नहीं बनेगी। यह कलम पत्रकारिता की आड़ में पत्रकारों को मोहरा बना किसी बिजनेस घराने को सरकारी खजाने को खाली कराने का अवसर नहीं देगी। यह कलम न तो बिजनेस घराने को ठेका-पट्टा दिलायेगी और न ही करोड़ों करोड़ टैक्स माफ कराने का मार्ग प्रशस्त करेगी। कलम यह वादा भी करती है कि चंद शराब की बूंदों के चक्कर में गिरवी नहीं होगी।

संकल्प यह कि यह कलम किसी राजनेता के इर्द-गिर्द घूमकर अपनी धार नहीं खोयेगी। संकल्प यह भी, इस आजाद सिपाही को रेलवे का कोई गोल्डेन पास नहीं चाहिए। पत्रकारों और कर्मचारियों के पेट काटकर खुद के प्रमोशन की राह नहीं बनानी है। आजाद सिपाही को न तो महल की तमन्ना है, न ही देश के लगभग सभी महानगरों में फ्लैट और मकान की।

इस आजाद सिपाही को कलम-पत्रकारिता की आड़ में झारखंड से लेकर राजस्थान तक फ्लैट बनवाने का धंधा नहीं करना है, इसे झूठ के लबादे ओढ़कर छद्म समाजवाद का कोरस गान नहीं गाना।

इस सिपाही की कलम बेबाकी से बताएगी झारखंड की पत्रकारिता के 25 साल की सच्ची कहानी। इस सिपाही की जंग उन ताकतों से है, जो अनैतिकता और भ्रष्टाचार को कथित सदाचार के आवरण से ढंकने की कोशिश कर रही हैं।

इसकी लड़ाई उनसे है, जो कंबल ओढ़कर घी पीते हैं, जो सत्ता की दलाली कर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे अपने परिजनों को बचाने की कोशिश करते हैं। आजाद सिपाही झारखंड की पत्रकारिता में बेबाकी का एक नया अध्याय लिखने के सफर पर निकल रहा है। इसके पास बेशक पूंजी का प्रवाह नहीं है, इसके पीछे किसी धनपशु की ताकत भी नहीं है, इसके पीछे कोई तीसरा मकसद भी नहीं है।

इस आजाद सिपाही की ताकत है यहां की वो धरती, जिसके भीतर आज फिर एक उलगुलान की बेचैनी है। इस अखबार के पास अगर कोई आधार है तो वह है जनसहयोग। सहयोग के रूप में जनता खुद आगे आ रही है। वार्षिक सदस्यता शुल्क दे रही है। विज्ञापन बुक करवा रही है।

मन में यह विश्वास है कि यह आजाद सिपाही कलम की आजादी की एक नई कहानी, एक नई इबारत लिखेगा।

फिलहाल, आजाद सिपाही डॉट को डॉट इन पर आपसे नियमित मुलाकात होगी। जल्द ही इसका सुसज्जित वेब एडिशन और इसके बाद प्रिंट संस्करण भी आप तक पहुंचेगा। हमें सिर्फ आपका भरोसा चाहिए।

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वरिष्ठ पत्रकार हरिनारायण सिंह की यह संपादकीय उनकी नवोदित वेबसाइट आजाद सिपाही डॉट को डॉट इन से साभार प्रस्तुत की जा रही है।

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