आदिवासी भी इसी मुल्क के हैं न

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अजादी के इतने समय बाद भी यह सोचना पड़े कि आदिवासी भी इसी मुल्क के हैं न ? इससे बड़ी बिडंबना क्या हो सकती है ? प्रकृति ने वनक्षेत्रों में अकूत संपदा दी है। इस संपदा की लूट मची है। विकास के नाम पर चल रहे इस युग में आदिवासी दो तरफा मार झेल रहे है। एक ओर विकास के नाम पर इनको उजाड़ने की और दूसरी ओर उन्हें उजाड़ने की जो कोशिशे कर रहें है उसमें यह समुदाय बुरी तरह पिस रहा है। जहां जंगल है,वहीं खनिज है, वहीं पहाड़ है, वहीं आदिवासी है।

उन क्षेत्र में विकास योजनाओं को ले जाने के लिए रास्ते तक नहीं है। देश के विकास के नाम पर उन इलाकों में माइनिंग हो रही है। कारखाने लग रहे है। और इसके लिए आदिवासी उजाड़े जा रहे है। उन्हें बचाने के लिए दो दशक पहले सुप्रीम कोर्ट ने समता जजमेंट दिया था। जिसे आज तक सरकारों ने नहीं माना। उन इलाकों और वहां निवासियों को बचाने के लिए भारतीय संविधान में विशेष प्रावधान है, उसके लिए विशेष कानून है। पांचवीं और छठी अनुसूची है। जमीन के कानून अलग है। इसके बावजूद उनपर बूलडोजर चल रहा है। उनकी जमीन पर कब्जा दिलाने के लिए सरकारों ने अपने अर्द्धसैनिक बलों को लगा रखा है।

इन इलाकों में उग्रवाद और नक्सलवाद भी है। देश का यहीं भू-भाग रेड कोरिडोर कहलाता है। इस रेड कोरिडोर कहे जाने वाले इलाके में जब आदिवासी बसे होंगे, तो उनके पूर्वजों को भी नहीं मालूम होगा कि उसके नीचे अकूत सम्पदा है। यही सम्पदा उनके जान की दुश्मन बन गयी है। इसके लिए उन्हें उजाड़ा जा रहा है। वे दर-दर के मोहताज हो जा रहे है। सरकार उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के नाम पर उजाड़ रही है, विस्थापित कर रही है। उग्रवादी उन्हें बचाने के नाम पर अपने बंदूकों के भय से उन्हें अपने साथ जोड़ना चाह रहे है। साथ नहीं देनेवालों को वैसे ही बंदूक से उड़ा दे रहे है, जैसे पुलिस उड़ा देती है।

अहम सवाल यह है कि आदिवासी भी इसी मुल्क के वाशिंदे है, तो उन्हें भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत संगरक्षण क्यों नहीं दिया जा रहा है। उन इलाकों में विकास के लिए समता जजमेंट के फार्मूला का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है ? तथाकथित मुख्यधारा में लाने के लिए उन्हें मन से तैयार क्यों नहीं किया जा रहा है। पुलिस भी मार रही है, नक्सली भी मार रहे है। आखिर वे किस देश में शरण लें? जब पुलिस चलीं जाती है, तो नक्सली मारते है, जब नक्सली चलीं जाती है, तो पुलिस मारती है। बड़े घराने उन्हें उजाड़कर खनिजों से देश-दुनिया का मालिक बनने में लगे हुए है। कोई बताये उन्हें अपनी तरह से जिने का अधिकार है की नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार मधुकर जी अपने फेसबुक वाल पर

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