अख़बारों से लुप्त होते सामाजिक सरोकार

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पिछले दो दशकों में अख़बारों का सर्कुलेशन जैसे-जैसे बढ़ा है, उनका इम्पैक्ट उसी अनुपात में कम होता गया है. अखबार अब हजारों में नहीं लाखों में बिकते हैं. खासकर हिंदी के और अन्य भारतीय भाषायों के दैनिक पत्र. उनका सर्कुलेशन इस कदर बढ़ गया है कि कोई समाचार पत्र अगर एक लाख से कम बिकता हो, तो उसे छोटा अखबार मान लिया जाता है!

Press_socialपर लाखों की संख्या में बिकने वाले अख़बारों को भी अपने यहाँ छपी ख़बरों के इम्पैक्ट के लिए मार्केटिंग गिमिक्स का सहारा लेना पड़ता है. वे टीवी और इन्टरनेट पर अपनी ख़बरों का विज्ञापन करते हैं. छपने के बाद लेख और ख़बरें फेसबुक पर डाली जाती हैं और ट्वीट कर दुनिया को उसके बारे में बताया जाता है. अगर सम्बंधित मंत्री या अफसर ने खबर न पढ़ी हो तो उसे पढवाया जाता है और कमेंट करवा कर इम्पैक्ट पैदा किया जाता है.

तीन दशक पहले मैं इंडियन एक्सप्रेस में काम किया करता था. भोपाल में उसकी केवल 1900 कापियाँ बिकती थीं. पर उसमें छपी खबर का यह असर होता था कि मंत्री तक नौकरी से हाथ धो सकते थे. विश्वास न हो तो मेरे मित्र हजारीलाल रघुवंशी से पूछ लें. वे मध्य प्रदेश के होम मिनिस्टर रह चुके हैं और विधान सभा के उपाध्यक्ष भी.

दो दशक पहले भी छपे का असर होता था. अपने इंडिया टुडे के दिनों में मैंने पाया कि उस मोटी-ताज़ी मैगज़ीन के ११२वें पेज पर छपा एक पैराग्राफ सरकार में हलचल मचा सकता था. बिना किसी कोशिश के!

पर अब कई मीडिया संस्थानों में इम्पैक्ट पैदा करने के अलग डिपार्टमेंट खुल गए हैं, जहाँ प्रोफेशनल लोग इस बात की मोटी तनखा उठाते हैं आम जनता को मालूम पड़े कि उनका अख़बार या चैनल कितना असरदार है.

मीडिया संस्थान मानते हैं कि जिसके पास जितने ज्यादा मातबर और कामकाजी युवा पाठक होंगे उन्हें उतने ही तादाद में विज्ञापन मिलेंगे. इसलिए सबके सब ए1, ए2 और ए3 केटेगरी के पाठकों के पीछे भाग रहे हैं. ऐसे पाठक जिनके पास बाज़ार में खरीदने की ताक़त सबसे ज्यादा है.

मेरे घर रोज लगभग १४-१५ दैनिक अखबार आते हैं. कुछ मैं खरीदता हूँ. पर ज्यादातर मुफ्त में आते हैं. भोपाल के जिस इलाके में रहता हूँ, उसके ज्यादातर घरों में राजनेता और सरकारी अफसर रहते हैं. उन सबों के घरों में इसी तरह मुफ्त के अख़बार आते हैं, वे भी दर्ज़नों की तादाद में. अखबार वाले मानते हैं कि अफसर या मंत्री अगर उनका लिखा पढेंगे तो उसका असर होगा. सो इम्पैक्ट की तलाश में ये सारे अखबार मुफ्त बांटे जाते हैं.

दिल्ली में कई साल पहले इंडिया टुडे ग्रुप ने ब्रिटेन के डेली मेल के साथ मिलकर मेल टुडे अख़बार चालू किया था. वह अख़बार तब केवल सेंट्रल दिल्ली और साउथ दिल्ली में बंटता था क्योंकि वहां अमीर लोगों की बस्तियां हैं. यमुना पार अख़बार के सर्कुलेशन पर साफ़ पाबन्दी लगा दी गयी थी क्योंकि वहां गरीब-गुरबे रहते थे.

किसी भी शहर से छपने वाले ज्यादातर अख़बारों को उठाईये. कंटेंट के मामले में उनमें से ज्यादातर अख़बार एक दूसरे की कार्बन कॉपी दिखते हैं. पहले पेज पर सारी ख़बरें वही मिलेंगी जो हमारे श्रेष्टि वर्ग को, अपर मिडिल क्लास के जीवन को प्रभावित करती हों और जो बढ़ते हुए भारत की सुनहरी तस्वीर दिखाती हो. या फिर आपको राजनीतिक ख़बरें मिलेंगी, जो सारे पत्रकार मानते हैं कि बोरिंग होती है और फिर भी छापते हैं क्योंकि वह सत्ता का केंद्र बिंदु होता है.

इम्पैक्ट की तलाश में मार्केटिंग विभाग ने नए-नए रास्ते ढूंढे हैं. मीडिया सामाजिक सरोकारों को लेकर बड़े-बड़े भाषण देता है. वह इस बात का ढिंढोरा पीटने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देता कि अपने पाठकों से उसका कितना जुडाव है और सामाजिक सरोकारों में वह कितना आगे है.

मीडिया के यह सामाजिक सरोकार क्या हैं?

आम तौर पर यह सामाजिक सरोकार ऐसे विषयों के इर्द गिर्द घूमते हैं जो उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग की दिलचस्पी के हों और उन्हें समाज के लिए कुछ करने करने का एहसास दिलाता हो. मसलन पानी बचाने का आन्दोलन, जो अब सूखी होली खेलने और प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की मूर्तियों पर रोक की मुहीम तक पहुँच गया है. या फिर मोबाइल टावरों से निकलने वाले रेडिएशन के खिलाफ जूही चावला की जंग. डिजिटल इंडिया का नारा लगाते-लगाते हम इन मोबाइल टावरों को अपने घरों के आस पास से उखाड़ कर जंगलों और खेतों में शिफ्ट कर देना चाहते है.

सारे बड़े शहरों में मीडिया वाले समय समय पर वायु प्रदूषण के खिलाफ झंडा उठाते रहते हैं. इसी अभिजात्य सरोकार के तहत एक पेड़ पर चली कुल्हाड़ी सीधी संपादक की छाती पर लगती है और लोगों को हेलमेट पहनाने के लिए रिपोर्टर सड़कों पर खड़े हो जाते हैं. भूकंप, बाढ़, सूखा के समय दान इकठ्ठा करने के फण्ड चालू हो जाते हैं, जिनमें अख़बार अपनी तरफ से एक लाख रूपये देकर अपने कर्मचारियों की तनख्वाह से दस लाख काट लेता है और अख़बार के मालिक चेक पकड़कर मुख्यमंत्री के साथ फोटो खिंचा लेते हैं.

पर जो सचमुच के सामाजिक सरोकारों वाले ज्वलंत विषय हैं, उनपर बिरले अख़बार ही आपको मुहीम चलाते दिखेंगे. मसलन बाल श्रमिकों की समस्या को ले लें. या फिर खेतिहर मजदूरों और सड़क बनाने, बिल्डिंग बनाने वाले कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी का कानून लागू करवाने का मामला ले लें. हमारी संवेदनशीलता का दायरा वहीँ ख़त्म होता है जहाँ वंचित तबकों के अधिकार शुरू होते हैं. गांव, आदिवासी, दलित, रोज़गार जैसे विषयों पर रिपोर्टिंग के लिए ज्यादातर अख़बार पैसे भी खर्च नहीं करना चाहते.

नतीजा? हमारे समाज में जो लोग हाशिये पर रहते हैं, उनके बारे में खबरें आपको ज्यादातर अख़बारों से नदारद मिलेंगी. भारत में लगभग 27 करोड़ लोग गरीब हैं. (भक्त मुझे गलत न समझें; कांग्रेस राज में भी यही हालत थी.) ये वे लोग हैं जो किसी अखबार के पाठक नहीं. ये वो लोग हैं जो डिजिटल डिवाइड के उस पार हैं. ये वो लोग हैं जिनका जीवन, जिनकी समस्याएं ज्यादातर ख़बारों में नहीं दिखती. टीवी की तो बात ही नहीं करें. हमारे ज्यादातर खबरिया चैनल अब मनोरंजन का एक साधन हैं.

कई संपादक इस स्थिति के लिए अपने मैनेजमेंट को जिम्मदार ठहराते हैं. वे मानते हैं कि उनके संस्थान की नीतियाँ ही ऐसी हैं कि वंचित तबकों की जिन्दगी की खबरे वे नहीं छाप पाते हैं.

मैं इससे इत्तिफाक नहीं रखता.

मैंने कभी अल्टरनेटिव जर्नलिज्म नहीं किया. जिन्दगी भर बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में ही काम किया. लगभग १३-१४ साल मैं सम्पादक रहा. भास्कर में था. इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स में काम किया. पर बाजारवाद के हावी होने के बावजूद, मुझे कभी ऐसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा. किसी भी संपादक को उतनी ही आज़ादी मिलती है जितनी वे अपने प्रबंधन से छीन सकते हैं. सामाजिक सरोकारों के लिए कम होती जगह के लिए शायद हम पत्रकार भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जितना अख़बारों का मैनेजमेंट.

नरेन्द्र कुमार सिंह

……….नरेन्द्र कुमार सिंह

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