अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का कठिन जापान दौरा

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obama1राजनामा.कॉम (साईं फीचर्स) पता नहीं था कि एशियाई दौरे पर अमेरिकी नेता इतनी बार जाएंगे? बराक ओबामा की नई एशियाई यात्रा उन दशकों की याद दिलाती है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति प्रायरू विदेश दौरे पर होते थे। हालांकि, इस दौरे का कारण यह नहीं है कि एशिया एक बड़ा महादेश है, यहां कूटनीतिक सक्रियता सबसे अधिक है या कई मायने में यह जोखिम से भरा क्षेत्र है, बल्कि वजह यह है कि अमेरिका इकलौता देश है, जो समान मूल्यों के इर्द-गिर्द इस क्षेत्र में शांति और एकता स्थापित कर सकता है।

यूरोप और लैटिन अमेरिका ने कमोबेश अपने तईं ही शांति व समृद्धि सुनिश्चित करने की कोशिश की और अपने देशों में क्षेत्रीय एकता स्थापित की। लेकिन, एशिया महादेश आज भी गहरी प्रतिद्वंद्विता, क्षेत्रीय तनावों और अनसुलझे युद्ध के इतिहास से जूझ रहा है। इसलिए उसे बाहरी मदद की आवश्यकता है। अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों की तरह बराक ओबामा इस दायित्व के निर्वाह को आतुर हैं। हालांकि, उनकी इस इच्छा में निरंतरता नहीं दिखती, पर जितनी भी है, पर्याप्त है।

यहां कुछ उदाहरण हैं कि बीते पांच वर्षों में ओबामा प्रशासन ने वहां क्या-क्या किया? सबसे पहले इस पर सहमति बनी कि अमेरिका और चीन आपसी संबंधों का नया मॉडल पेश करेंगे, ताकि वैश्विक परिदृश्य में चीन के उदय को मान्यता मिले। यह भी कोशिश की गई कि जापान व दक्षिण कोरिया के बीच पुराने युद्ध विवाद खत्म हों।

अमेरिका ने म्यांमार को लोकतंत्र का रास्ता दिखाया। उसने दक्षिण चीन सागर में विवादित द्वीपों का मसला शांतिपूर्ण व बहुपक्षीय बातचीत से सुलझाने पर जोर दिया। अमेरिकी संसाधनों को यूरोप से हटाकर एशिया में लगाने का काम शुरू हुआ। शायद इनके केंद्र में ओबामा का मुक्त व्यापार क्षेत्र के निर्माण का प्रयास है, जो ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप कहलाता है।

यूरोपीय संघ की तरह, यह समझौता एशिया के अंदर आर्थिक सहयोग को तेज करेगा और कूटनीतिक विभाजन में लचीलापन लाएगा। इस व्यावसायिक-वार्ता की सफलता के लिए अमेरिका और जापान के बीच एक संधि महत्वपूर्ण है। ऐसे में, उम्मीद है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का जापान दौरा कठिन द्विपक्षीय मुद्दों के लिए सुखद साबित होगा। 

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