अपने कुत्ते को एडिटर बुलाते थे विनोद मेहता !

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Vinod-Mehtaविनोद मेहता एक अच्छे और सच्चे पत्रकार थे। वे पैदाइशी संपादक थे। बिना किसी भय या राग -द्वेष के उन्होंने अपना काम किया। कभी किसी दबाव में नहीं आये। उनके जैसा संपादक मिलना अब के दौर में मुश्किल है। उन्होंने पत्रकारिता और पत्रकारों का मान बढ़ाया। उनके निधन पर विनम्र श्रद्धांजलि।

उनके साथ काम कर चुके राजेश जोशी ने बीबीसी में उन्हें याद करते हुए लिखा है, उसके अंश साभार उद्धृत हैं।

विनोद मेहता ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरूआत सीधे संपादक के तौर पर की और आख़िर तक संपादक ही रहे, वे साफ़गो और खरे आदमी के तौर पर जाने जाते थे. लेकिन उनके व्यक्तित्व को समझना आसान नहीं था. मसलन, वे अपने कुत्ते को एडिटर क्यों बुलाते थे?

अधनंगी औरतों की तस्वीरें छापने वाली पत्रिका डेबोनेयर में वे नेताओं के बड़े इंटरव्यू भी छापते थे, जिनकी ख़ासी चर्चा होती थी. वे कभी भी संपादक के परंपरागत खांचे में फिट नहीं हुए.

विनोद मेहता सामान्य पढ़ाई-लिखाई में फिसड्डी रहे थे, थर्ड डिवीज़न बीए पास करने वाले मेहता ने संपादक के तौर पर अपनी बारीक़ समझ का लोहा मनवाया. वे थोड़े पंजाबी थे, थोड़े लखनवी भी, उनके मिजाज़ में अंग्रेज़ियत भी थी और यूपी वाला भदेसपन भी.

vinod_dog_editorजितनी बेबाकी से विनोद मेहता ने अपने बारे में लिखा है शायद कोई और संपादक वैसे न लिख पाए – अपनी युवावस्था के खिलंदड़ेपन का ज़िक्र उन्होंने अपनी किताब ‘लखनऊ ब्वाय’ में काफ़ी दिलचस्प तरीक़े से किया है.

यहाँ तक कि उन्होंने इस किताब में बिना शादी के पैदा हुई अपनी बेटी का भी ज़िक्र किया है, जिसके बारे में सिवा उनकी पत्नी के किसी को पता नहीं था.

जब आउटलुक ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर उनके दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य के असर पर कवर स्टोरी की तो सरकार ने आउटलुक के मालिकों पर इनकम टैक्स के छापे मारकर मानो इसका जवाब दिया. पर विनोद मेहता ने समझौता नहीं किया.

इसी तरह राडिया टेप्स के मातमले में पत्रकार बरखा दत्त और रतन टाटा का नाम छापने में उन्होंने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई.

prveen bagi

…….पत्रकार प्रवीण वागी अपने फेसबुक वाल पर

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