विश्व कार्टून दिवस: अखबारों से गायब होते कार्टून

आज पत्रकारों और नेताओं की गठजोड़ ने मीडिया को कुंद कर रखा है,जिसका नतीजा यह है कि अखबारों से कार्टून सिमटती जा रही है। जबकि कार्टून किसी अखबार की आत्मा के समान है। समाज को जगाये रखने के लिए कार्टून हमेशा प्रासंगिक रहा है

INR.(जयप्रकाश नवीन)। आज विश्व कार्टून दिवस है।कार्टून अभिव्यक्ति का ऐसा सशक्त माध्यम है जिसकी सहायता से सरलता पूर्वक समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ एक रोचक तरीके से आवाज उठाई जा सकती है।कार्टून कला को समकालीन सामाजिक मुद्दों का आईना कहा जा सकता है। कार्टून किसी भौगोलिक, भाषाई व सांस्कृतिक सीमाओं में नहीं बंधी है। भारत में आजादी से पूर्व राजनीतिक कार्टून का खासा महत्व रहा है।

World Cartoon Day Cartoons Disappearing from Newspaper 3कहते हैं, एक तस्वीर एक हजार शब्दों के बराबर होती है।मगर एक कार्टून का महत्व दस हजार शब्दों के बराबर होता है।

जीवन और कार्यों की विसंगतियों को प्रकट करने या उन पर कटाक्ष या आलोचना के लिए सभ्यता के आरंभिक काल से ही मनुष्य की व्यंग्य -चित्रों में रूचि रही है।व्यंग्य चित्र कला का आदि रूप कहा जा सकता है।

आधुनिक व्यंग्य चित्र कला का जन्म 17वीं शताब्दी में इटली में चित्रों के माध्यम से पोप के प्रति विरोध प्रदर्शन के साथ माना जाता है।

इटली के एनीबेल तथा एगॉस्तिनी कारसी दो भाइयों को कार्टून के वर्तमान हास्य -व्यंग्यात्मक रूप का जनक माना जाता है।

इटली में इनके चित्रों को ‘कैरीकेचर’ नाम दिया गया। जिसे बाद में इंग्लैंड ने ले लिया और उसे ‘कार्टून’की संज्ञा दी। हालाँकि कि दोनों विधा में अंतर है।

कार्टून चुटकी लेने या सुखद परिहास पैदा करने के उद्देश्य से बनाएँ जाते हैं। जबकि कैरीकेचर किसी व्यक्ति की खिल्ली उड़ाने के लिए बनाया जाता है।

लंदन में 1841 में महारानी विक्टोरिया द्वारा आयोजित व्यंग्य-चित्र प्रतियोगिता के साथ आधुनिक कार्टून का जन्म हुआ। उसी दौरान लंदन में ‘पंच’ नाम की पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ।इसमें व्यंग्य चित्र ही हुआ करते थे।

World Cartoon Day Cartoons Disappearing from Newspaper 1आरंभ में कार्टून बिना शब्दों के बनाएँ जाते थे। शब्दों के साथ कार्टून प्रस्तुत करने का प्रचलन बहुत बाद हुआ। 1870 में पहली बार कार्टून-स्ट्रिप बनी। जिसका विचार जर्मनी के कार्टूनिस्ट विल्हैम बुश को सूझा।

उसने दो नटखट बच्चों पर ‘सेक्स एंड मोरिटज’ नामक स्ट्रिप बनाई। 1895 में चित्रकार आउटकॉल्ट ने ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ अखबार के लिए ‘यलोकिड’नाम से एक स्ट्रिप बनाई। 1901 में चित्रकार चिक यांग ने एक भूलक्कड़ लड़के को मुख पात्र बनाकर ‘ब्लौण्डी’ नाम से कार्टून स्ट्रिप तैयार की।

भारत में इंग्लैंड के ‘पंच’ की देखादेखी 19वीं सदी के अंतिम दिनों में व्यंग्य -चित्रों की पत्रिका ‘हिंदी पंच’ एक प्रकाशक बरजोर जी ने निकाली। देश के पहले चित्रकार ‘पिसेल’ माने जाते हैं।World Cartoon Day Cartoons Disappearing from Newspaper5

एक भारतीय पत्रकार के रूप में उनकी बनाई स्ट्रिप ‘खूनरो’ ‘अमृत बाजार पत्रिका’ में छपी थी।हिंदी में मोहनलाल मेहता पहले व्यंग्य चित्रकार हुए। उनके बनाये व्यंग्य इलाहाबाद से प्रकाशित ‘माधुरी’ ने 1924 में स्थान दिया।

भारत के पहले प्रतिभावान कार्टूनिस्ट शंकर थे। उन्होंने 1929 से कार्टून बनाना शुरू किया।1948 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा से उन्होंने ‘शंकर्स वीकली’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया।

पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कभी राजनीतिक कार्टून  विधा के जनक शंकर के सम्मान में कहा था-

“एक अच्छा कार्टूनिस्ट महज हास्य ही पैदा नहीं करता, बल्कि वो किसी घटना को गहराई से देखता है  और लकीरो के प्रहार से लोगो को प्रभावित करता है।”

कार्टून कभी समाचार पत्रों की जान हुआ करता था। लोग शौक से कार्टून कोना खोजकर पढ़ा करते थे। लेकिन आज कार्टून अखबारों से गायब होता जा रहा है।

World Cartoon Day Cartoons Disappearing from Newspaper 2भारत  में आज़ादी के पहले भी कार्टून सरकारी डंडे से मुक्त रहे है। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान अखबारों के  सम्पादकीय पर सरकारी  अंकुश भले रहा हो, मगर कार्टून खुली हवा में सांस लेते रहे हैं।

एक वाइसराय ने उस वक्त खुद पर छपे एक कार्टून की सराहना की और अपने एक दूत को कार्टूनिस्ट के पास भेज कर कार्टूनिस्ट को धन्यवाद कहलवाया।

आज देश में कार्टूनिस्ट पर हमेशा दोधारी तलवार लटकी रहती है। पता नहीं कब कौन नाराज हो जाए। आर के लक्ष्मण, मारियो मीराण्डा, इरफान, रंगा, कुट्टी, सुधीर डार, सुधीर तैलंग, प्राण, आबिद सुर्दी, विजयन, पुरी, काक जैसे कई नामी-गिरामी कार्टूनिस्ट रहे हैं। जिन्होंने कार्टून को एक पहचान दी।

कार्टूनिस्ट शंकर ने कोई डेढ़ हजार सियासी कार्टून बनाए। इनमें चार सौ सिर्फ पंडित  नेहरू को निशाने पर लेकर बनाये गए। पर नेहरू कभी खफा नहीं हुए।World Cartoon Day Cartoons Disappearing from Newspaper3

बल्कि एक समारोह में शंकर को देखते ही कहा – शंकर! मुझे कभी मत बख्शना। शंकर ने नेहरू और अम्बेडकर दोनों को अपनी कूंची के निशाने पर रखा।

शंकर ने जब 27 पुरानी पत्रिका ‘शंकर्स वीकली’ का प्रकाशन बंद किया तो इंदिरा गाँधी ने उन्हें बहुत मार्मिक खत लिखा। कहा हम इस उम्दा सामग्री से  वंचित रहेंगे। पर क्या करे ? यह फैसला आपका है।

आपातकाल में आर के लक्ष्मण के कार्टूनों पर सरकारी अंकुश का डंडा चला। लक्ष्मण के अमेरिकन राष्ट्रपति गेराल्ड फोर्ड पर बनाये गए कार्टून को सरकार ने जब्त कर लिया।

लक्ष्मण ने राजीव गाँधी पर बहुत तीखे कार्टून बनाये। लक्ष्मण ने लालकृष्ण अडवाणी पर बहुत करारे कार्टून बनाये। लेकिन इन्होंने कभी बुरा नहीं माना न नाराज हुए। लेकिन एक बार मोरारजी देसाई अपने उपर बने कार्टून पर भड़क उठे थे।

World Cartoon Day Cartoons Disappearing from Newspaper4लक्ष्मण का आम आदमी आमतौर पर एक कोने में खड़ा दर्शक होता है। जिसके होश उड़े होते हैं, घबराहट से बाल खड़े होते हैं, लेकिन वह फिर भी कुछ नहीं कर पता, क्योंकि वह आम  आदमी है जो चुप रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता।

भारत में प्राय नेता और सरकार कार्टूनिस्टों के प्रति हमेशा सौहार्द और लचीला रूख अपनाया। अबू अब्रहाम ने इंदिरा गाँधी पर खूब करारे कार्टून बनाए। लेकिन इंदिरा गांधी ने कभी नाराजगी प्रकट नहीं की, बल्कि उन्हें राज्य सभा में भेजा।

कंधार विमान अपहरण के दौरान जब विदेश मंत्री जसवंत सिंह को अफगानिस्तान भेजा गया तो सुधीर तैलंग ने जसवंत सिंह की तालिबानी लिबास में कार्टून बनाएं। विदेश मंत्री श्री जसंवंत सिंह ने फोन कर उन्होंने धन्यवाद दिया।

पहले के राजनीतिक नेता खुद पर हंसना पसंद करते थे। लेकिन अब वे खुद पर हंसने का सलीका खोते जा रहें हैं। उन्हें अपना आलोचना और अपने उपर व्यंग्य शायद पसंद नहीं आता है।

तभी तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक कार्टून को लेकर कार्टूनिस्ट पर काफी नाराज हुई और कार्टूनिस्ट को जेल की हवा खानी पड़ी।

World Cartoon Day Cartoons Disappearing from Newspaper2लोकतांत्रिक परिवेश में कार्टून सत्ता का गुणगान नही करते, बल्कि पूरे वातावरण में पनप रही व्यवस्था की विसंगतियों को अपनी वक्र दृष्टि से खोजकर तीखा प्रहार करते हैं।

खबर के पीछे झांकने का प्रयास एक कार्टूनिस्ट ही करता है। आमजन की हताशा-निराशा, क्रोध और असमर्थता को अपनी कूची के बलबूते हास्य-परिहास में बदलकर प्रस्तुत करता है।

आज देश में कार्टूनिस्टों के लिए बहुत सारे बिषय हैं। लेकिन उन्हें अब डर है पता नहीं कौन हुक्मरान कब नाराज हो जाए। उनका कोप भाजन बनना पड़ जाए। सता में बैठे लोगों को अब कार्टून समझ में  नहीं आता है। सियासत इसे सहन नहीं कर पाती है।

सता का प्रभाव इस कदर हावी होने लगा है कि कई मीडिया हाउस आलोचना से बचने का रास्ता चुन रहे हैं। कार्टून के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति खत्म होती जा रही है।

पहले नेता एक कार्टूनिस्ट को देखते ही कहते थे- तुम मुझे मत बख्शना! अब इतना ही फर्क आया है,वे अब कहते है -उस कार्टूनिस्ट को नहीं छोड़ना!

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