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    Monday, June 17, 2024
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      Meaning of Godi Media in India : भारत में गोदी मीडिया के मायने, समझें हकीकत

      राजनामा.कॉम। गोदी मीडिया शब्द का उपयोग भारतीय मीडिया के उस हिस्से के लिए किया जाता है जो सरकार के समर्थन में काम करता है और सरकारी नीतियों की आलोचना करने से बचता है। यह शब्द व्यापक रूप से 2014 के बाद लोकप्रिय हुआ, जब भारतीय मीडिया के एक हिस्से पर यह आरोप लगाया गया कि वे सत्तारूढ़ सरकार के अनुकूल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। ‘गोदी’ शब्द का तात्पर्य ‘गोद में बैठना’ से है, जिसका अर्थ है कि ये मीडिया संस्थान सरकार के संरक्षण में हैं और उनकी नीतियों के प्रति पक्षपाती हैं।

      इस शब्द का उपयोग मुख्यतः उन मीडिया हाउसों के लिए होता है जो अपनी रिपोर्टिंग में निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता के बजाय सरकार के पक्ष में झुकाव दिखाते हैं। गोदी मीडिया का उद्देश्य सरकार की सकारात्मक छवि प्रस्तुत करना और आलोचनात्मक समाचारों को कम महत्व देना होता है। इसके परिणामस्वरूप, कई बार महत्वपूर्ण मुद्दों और विरोधाभासी विचारधाराओं को उचित मंच नहीं मिल पाता।

      गोदी मीडिया की उत्पत्ति का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन आधुनिक संदर्भ में इसे समझने के लिए 2014 का समय महत्वपूर्ण है। इस समय भारतीय मीडिया में एक बदलाव देखा गया, जहां कई मीडिया संस्थानों ने सरकार के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया। सामाजिक मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफार्मों के उदय के साथ, गोदी मीडिया का प्रभाव और भी बढ़ गया।

      गोदी मीडिया की जरूरतें और इसकी प्रासंगिकता को समझने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम मीडिया के कार्य और उसकी जिम्मेदारियों को समझें। मीडिया का मूल कार्य जनमत का निर्माण करना और सच्चाई को उजागर करना है। लेकिन, जब मीडिया किसी विशेष पक्ष के समर्थन में कार्य करता है, तो यह उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

      गोदी मीडिया के लक्षणों को पहचानना महत्वपूर्ण है ताकि हम स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को समझ सकें। गोदी मीडिया का प्रमुख लक्षण यह है कि यह अक्सर सरकारी नीतियों और निर्णयों की पक्षधरता करता है। चाहे वह आर्थिक सुधार हों, सामाजिक नीतियाँ हों या फिर अंतर्राष्ट्रीय मामलों से संबंधित कोई निर्णय हो, गोदी मीडिया इन सभी को सकारात्मक रूप से प्रस्तुत करता है, जिससे सरकार की छवि को बढ़ावा मिलता है।

      दूसरा महत्वपूर्ण लक्षण है विपक्ष की आलोचना को दबाना। गोदी मीडिया अक्सर विपक्षी दलों और उनके नेताओं की आलोचनाओं को या तो नजरअंदाज करता है या फिर उन्हें नकारात्मक रूप से प्रस्तुत करता है। इसके परिणामस्वरूप, जनता के सामने विपक्ष की आवाज़ कमजोर पड़ जाती है और उनकी वैध चिंताओं और आलोचनाओं को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जाता।

      तीसरा लक्षण है अपारदर्शी समाचार कवरेज। गोदी मीडिया अक्सर समाज में हो रहे महत्वपूर्ण मुद्दों और घटनाओं को या तो पूरी तरह से नजरअंदाज करता है या फिर उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि उनकी वास्तविकता धुंधली हो जाती है। इसका सीधा प्रभाव यह होता है कि जनता को सही और सटीक जानकारी नहीं मिल पाती, जिससे उनकी समझ और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है।

      इन तीन प्रमुख लक्षणों के अलावा, गोदी मीडिया की एक और खासियत यह है कि यह अक्सर ट्रोल आर्मी और सोशल मीडिया के माध्यम से सरकारी नीतियों और नेताओं का समर्थन करता है। यह समर्थन कभी-कभी अतिरेक में बदल जाता है, जिससे ट्रोलिंग और फेक न्यूज़ का प्रसार भी होता है।

      गोदी मीडिया के इन लक्षणों को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि हम समझ सकें कि मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता कितनी आवश्यक है और किस तरह से मीडिया का गलत उपयोग समाज पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

      गोदी मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता

      भारत में मीडिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा “गोदी मीडिया” के रूप में जाना जाता है, जो कि स्वतंत्र पत्रकारिता से काफी अलग है। स्वतंत्र पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य तथ्य-आधारित और निष्पक्ष खबरें प्रस्तुत करना होता है। ऐसी पत्रकारिता में पत्रकार अपने पेशेवर मानदंडों का पालन करते हुए खबरों को जनता तक पहुंचाते हैं और किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव या पक्षपात से दूर रहते हैं। वे अपनी रिपोर्टिंग में निष्पक्षता और सटीकता को प्राथमिकता देते हैं, ताकि जनता को सही और प्रामाणिक जानकारी मिले।

      दूसरी ओर, गोदी मीडिया अक्सर पक्षपातपूर्ण और एकतरफा खबरें प्रस्तुत करता है। गोदी मीडिया का लक्ष्य अक्सर किसी विशेष राजनीतिक या व्यवसायिक हित को साधना होता है। इस प्रकार की मीडिया रिपोर्टिंग में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा सकता है या कुछ महत्वपूर्ण जानकारी को छुपाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में, जनता को सही जानकारी प्राप्त करने में कठिनाई होती है और वे भ्रमित हो सकते हैं।

      स्वतंत्र पत्रकारिता और गोदी मीडिया के बीच यह अंतर आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि डिजिटल युग में खबरों का प्रसार तेजी से होता है। जनता को यह समझना आवश्यक है कि वे किस प्रकार की खबरें और किस स्रोत से प्राप्त कर रहे हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता जहां लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती है, वहीं गोदी मीडिया अक्सर इस आधारशिला को कमजोर कर सकता है।

      इसलिए, यह आवश्यक है कि हम स्वतंत्र पत्रकारिता को प्रोत्साहित करें और ऐसे मीडिया स्रोतों से सावधान रहें जो गोदी मीडिया के रूप में कार्य कर रहे हों। इससे न केवल हमें सटीक और निष्पक्ष खबरें प्राप्त होंगी, बल्कि एक स्वस्थ लोकतंत्र का भी निर्माण होगा।

      गोदी मीडिया का प्रभाव

      गोदी मीडिया का भारतीय समाज और राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह मुख्यतः जनमत को प्रभावित करता है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करता है। गोदी मीडिया अक्सर सरकार के पक्ष में खबरें प्रसारित करता है, जिससे जनता के मन में एकतरफा दृष्टिकोण उत्पन्न होता है। इस प्रकार की मीडिया रिपोर्टिंग से नागरिकों के स्वतंत्र विचारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और वे सत्य जानकारी से वंचित रह जाते हैं।

      जनमत को प्रभावित करने के साथ-साथ, गोदी मीडिया लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को भी कमजोर करता है। स्वस्थ लोकतंत्र में मीडिया का महत्वपूर्ण स्थान होता है, क्योंकि यह सरकार और जनता के बीच एक सेतु का काम करता है। लेकिन जब मीडिया निष्पक्ष नहीं होती और सरकार के प्रभाव में काम करती है, तो यह सेतु कमजोर हो जाता है और लोकतंत्र का आधार हिल जाता है।

      इसके अलावा, गोदी मीडिया नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अधिकार को भी बाधित करता है। एक स्वस्थ समाज में नागरिकों का यह अधिकार होता है कि वे सटीक और निष्पक्ष जानकारी प्राप्त कर सकें। लेकिन जब मीडिया पक्षपाती होती है, तो नागरिकों को सही जानकारी नहीं मिल पाती, जिससे उनकी निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है।

      इस प्रकार, गोदी मीडिया का प्रभाव व्यापक और गहरा होता है। यह न केवल जनमत को प्रभावित करता है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर कर नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अधिकार को बाधित करता है। इस प्रभाव को समझना और इसे कम करने के उपाय खोजना आवश्यक है ताकि भारतीय समाज और लोकतंत्र मजबूत और स्वस्थ रह सके।

      गोदी मीडिया के कारण

      भारत में गोदी मीडिया के उदय के पीछे कई प्रमुख कारण हैं, जो इस प्रवृत्ति को समझने के लिए आवश्यक हैं। सबसे पहले, राजनीतिक दबाव एक महत्वपूर्ण कारक है। मीडिया संगठनों पर यह दबाव डाला जाता है कि वे सरकार की नीतियों और कार्रवाइयों का समर्थन करें। राजनीतिक दल अक्सर मीडिया को अपने पक्ष में करने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करते हैं, जिसमें सरकारी विज्ञापन का आवंटन, लाइसेंसिंग और नियामक नियंत्रण शामिल हैं। इस प्रकार, मीडिया संगठनों को अपनी स्वतंत्रता से समझौता करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

      दूसरा, विज्ञापन राजस्व पर अत्यधिक निर्भरता भी गोदी मीडिया के उदय का एक मुख्य कारण है। अधिकांश मीडिया हाउस अपने संचालन के लिए विज्ञापन आय पर निर्भर होते हैं। जब बड़ी कंपनियां और सरकारी संस्थाएं विज्ञापन देने से इनकार करती हैं या उन्हें हटाने की धमकी देती हैं, तो मीडिया संगठनों के पास सरकार या बड़े व्यापारिक घरानों के पक्ष में खबरें दिखाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इस प्रकार, वे अपनी आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने के लिए निष्पक्ष रिपोर्टिंग से समझौता कर लेते हैं।

      तीसरा, मीडिया मालिकों के व्यवसायिक हित भी गोदी मीडिया के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई मीडिया हाउस बड़े उद्योगपतियों के स्वामित्व में होते हैं, जिनके व्यवसायिक हित सरकार की नीतियों से जुड़े होते हैं। जब मीडिया मालिकों के व्यवसायिक हित सरकार की नीतियों के साथ मेल खाते हैं, तो वे अपने मीडिया आउटलेट्स का उपयोग सरकार के पक्ष में प्रचार करने के लिए करते हैं। इस प्रकार, मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है।

      इन तीन प्रमुख कारणों — राजनीतिक दबाव, विज्ञापन राजस्व पर निर्भरता, और मीडिया मालिकों के व्यवसायिक हित — के परिणामस्वरूप, भारत में गोदी मीडिया का उदय हुआ है। यह प्रवृत्ति न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता को खतरे में डालती है, बल्कि लोकतंत्र की नींव को भी कमजोर करती है।

      भारत में गोदी मीडिया के खिलाफ आवाजें लगातार उठती रही हैं, और यह आवाजें पत्रकारों, संगठनों, और नागरिकों के विभिन्न समूहों से आ रही हैं। ये लोग विभिन्न मंचों पर अपनी असहमति और विरोध दर्ज कराते हैं, और गोदी मीडिया के प्रभाव को कम करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

      कई वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया हाउसेस गोदी मीडिया के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। वे अपनी रिपोर्टिंग और लेखों के माध्यम से सरकार और बड़े कारपोरेट्स के प्रभाव से मुक्त पत्रकारिता को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे पत्रकार अक्सर सोशल मीडिया और स्वतंत्र न्यूज़ पोर्टल्स का सहारा लेकर सत्य और निष्पक्षता के साथ सार्वजनिक मुद्दों को उठाते हैं।

      इसके अतिरिक्त, नागरिक संगठन और एनजीओ भी गोदी मीडिया के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। ये संगठन मीडिया साक्षरता अभियान चलाते हैं, ताकि आम जनता को यह समझ में आ सके कि मीडिया किस प्रकार से उनके विचारों को प्रभावित करने का प्रयास कर रही है। इन संगठनों का उद्देश्य है कि लोगों को सही और गलत जानकारी के बीच अंतर समझाने में मदद करना।

      सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी वर्ग भी गोदी मीडिया के खिलाफ संघर्ष में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ये लोग विभिन्न प्लेटफार्म्स पर डिबेट्स, पब्लिक फोरम्स और लेखों के माध्यम से इस मुद्दे पर चर्चा करते हैं और गोदी मीडिया के दुष्प्रभावों से जनता को अवगत कराते हैं।

      गोदी मीडिया की समस्या को हल करने के लिए, कुछ लोग मीडिया सुधार के लिए कानूनी और नियामक कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। वे पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने के लिए कड़े कानूनों की वकालत कर रहे हैं, ताकि मीडिया संस्थान स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्टिंग कर सकें।

      कुल मिलाकर, गोदी मीडिया के खिलाफ आवाजें लगातार बढ़ रही हैं और यह समाज के विभिन्न वर्गों से आ रही हैं। इन आवाजों का उद्देश्य है एक निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया को बढ़ावा देना, जो सच को जनता तक पहुंचा सके।

      विदेशी मीडिया के मुकाबले गोदी मीडिया

      भारत में गोदी मीडिया की स्थिति की तुलना अगर विदेशी मीडिया से की जाए, तो कई महत्वपूर्ण अंतर सामने आते हैं। विदेशी मीडिया का एक प्रमुख गुण उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता है। विभिन्न पश्चिमी देशों, जैसे अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी में, मीडिया आउटलेट्स को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रखते हुए एक स्वायत्त इकाई के रूप में कार्य करने की अनुमति होती है। ये मीडिया संस्थाएं अपने रिपोर्टर और पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने और सच को उजागर करने की स्वतंत्रता देती हैं।

      वहीं दूसरी ओर, भारतीय गोदी मीडिया अक्सर राजनीति और सत्ता के प्रभाव में काम करती दिखती है। भारतीय मीडिया के कई हिस्से सरकार की नीतियों और कार्यों की आलोचना करने से बचते हैं और इसके बजाय सरकार की प्रशंसा में लीन रहते हैं। यह स्थिति मीडिया की निष्पक्षता को प्रभावित करती है और जनता को पूर्ण सत्य से वंचित रखती है।

      विदेशी मीडिया में पत्रकारिता एक संवेदनशील और जिम्मेदार पेशा माना जाता है, जहां पत्रकारों को उच्च नैतिक मानकों का पालन करना होता है। वे तथ्यों को प्रस्तुत करने और जनता को सही सूचना देने के प्रति जिम्मेदार होते हैं। दूसरी ओर, भारतीय गोदी मीडिया में अक्सर सनसनीखेज खबरें और पक्षपाती रिपोर्टिंग देखने को मिलती है, जो दर्शकों का ध्यान खींचने और टीआरपी बढ़ाने के उद्देश्य से की जाती हैं।

      अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों के पास धन और संसाधनों की भी अधिकता होती है, जो उन्हें विस्तृत और गहन रिपोर्टिंग करने में सक्षम बनाते हैं। इसके विपरीत, भारतीय गोदी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर है और उसे सरकार या बड़े कॉर्पोरेट घरानों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह निर्भरता उनकी स्वतंत्रता को सीमित करती है और उनकी रिपोर्टिंग की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।

      अंततः, स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का महत्व अनदेखा नहीं किया जा सकता। विदेशी मीडिया की तुलना में भारतीय गोदी मीडिया में सुधार की आवश्यकता है ताकि जनता को सच्ची और निष्पक्ष जानकारी प्राप्त हो सके।

      भविष्य की दिशा

      भारत में गोदी मीडिया की वर्तमान स्थिति ने पत्रकारिता के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। भविष्य में, गोदी मीडिया के प्रभाव को कम करने और स्वतंत्र पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाने की आवश्यकता है। सबसे पहले, मीडिया संगठनों को अपनी संपादकीय स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। इसके लिए विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल को बढ़ावा देना आवश्यक हो सकता है, जिससे उनकी आय का स्रोत विविधीकृत हो सके।

      दूसरा महत्वपूर्ण कदम मीडिया साक्षरता को बढ़ावा देना होगा। एक जागरूक और सूचित जनसमूह गोदी मीडिया के प्रभाव से बच सकता है और सही सूचनाओं तक पहुंच बना सकता है। इसके लिए शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा, जिससे लोगों को सही और गलत जानकारी के बीच अंतर समझ में आ सके।

      इसके अलावा, मीडिया नियामक संस्थाओं को मजबूत और स्वतंत्र बनाने की दिशा में भी प्रयास करने होंगे। एक सशक्त नियामक संस्था मीडिया की जवाबदेही सुनिश्चित कर सकती है और उसे जनहित में काम करने के लिए प्रेरित कर सकती है। इसके तहत फेक न्यूज और प्रोपेगेंडा फैलाने वाले मीडिया चैनलों पर कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।

      स्वतंत्र पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए पत्रकारों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा भी महत्वपूर्ण है। इसके लिए सरकार और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है, ताकि पत्रकार निर्भीक होकर अपने कार्य कर सकें। साथ ही, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी अधिक जिम्मेदार बनाना होगा, ताकि वे फेक न्यूज और गलत सूचनाओं को फैलाने वाले स्रोतों को नियंत्रित कर सकें।

      इस प्रकार, गोदी मीडिया से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें आर्थिक, सामाजिक, और नियामक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। 

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